24 July, 2014

लूसिफर. तुकबन्दियाँ और ब्लैक कॉफ़ी.

जरा जरा खुमार है. रात के जाने कितने बज रहे हैं. अब सिर्फ कहीं भाग जाना बचा है. मैं हसरतों से पोंडिचेरी नाम के छोटे से शहर को देखती हूँ. इस शहर में कुछ सफ़ेद इमारतें हैं छोटी छोटी, ऐसा मुझे लगता है कि फ़्रांस होता होगा कुछ ऐसा ही...यहाँ का आर्किटेक्चर फ्रेंच है. मैंने फ़्रांस को देखा नहीं है...सिवाए सपनों के. दुनिया में इकलौता ये शहर भी है जहाँ औरबिन्दो आश्रम में एक दुपहर श्री माँ के पदचिन्हों के पास खड़े होकर महसूस किया था कि माँ कहीं गयी नहीं है. मेरे साथ है. तब से बाएँ हाथ में एक चांदी की अंगूठी पहनती हूँ...उनके होने का सबूत. खुद को यकीन दिलाने का सबूत कि मैं अकेली नहीं हूँ.

सब होने पर भी प्यार कम पड़ जाता है मेरे लिए. हर किसी को जीने के लिए अलग अलग चीज़ों की जरूरत होती है. मुझे लोग चाहिए होते हैं. कभी कभी धूप, सफ़र और मुस्कुराहटें चाहिए होती हैं तो कभी सिर्फ हग्स चाहिए होते हैं. जीने के लिए छोटे छोटे बहानों की तलाश जारी रहती है. आज दो लोगों से मिली. जाने कैसे लोग थे कि उनसे कभी पहले बात की ही नहीं थी...साथ एक ऑफिस में काम करने के बावजूद. नॉर्मली मुझे कॉफ़ी पी कर नशा नहीं होता है मगर कुछ दिनों की बात कुछ और होती है. मैंने कहा कि मैं तुम्हें हमेशा लूसिफ़ेर के नाम से सोचती हूँ...उसने पूछा 'डू यू नो हू लूसिफ़ेर इज?' मैंने कहा कि शैतान का नाम है...फिर मैंने कहा कि कभी उसके नाम का कोई किरदार रखूंगी तो उसका नाम लूसिफ़ेर ही लिखूंगी. उसने मुझे बताया कि लूसिफ़ेर शैतान का बेटा है. मैंने कहा कि जब सच में कहानी लिखूंगी तो रिसर्च करके लिखूंगी. चिंता न करे. उसने बताया कि लूसिफ़ेर शैतान का बेटा है. मुझे कुछ तो ध्यान है कहानी के बारे में...पर ठीक ठीक मालूम नहीं है. मुझे वो अच्छा लगता है. जैसे कि मुझे शैतान अच्छा लगता है. शैतान के पास अच्छा होने की और दुनिया के हिसाब से चलने की मजबूरी नहीं होती है.

मैं जो लिखती हूँ और मैं जो होती हूँ उसमें बहुत अंतर नहीं होता है...होना चाहिए न? लिखना एक ऐसी दुनिया रचना है जो मैं जी नहीं सकती. एक तरह की अल्टरनेट रियलिटी जहाँ पर मैं खुदा हूँ और मेरे हिसाब से दुनिया चलती है.

बहरहाल बात कर रही थी इन दो लोगों की जिनसे मैं आज मिली. मैंने उनके साथ कभी काम नहीं किया था. उनके लिए मैंने एक गीत लिखा था. यूँ मैंने दुनिया में कुछ खास अच्छे काम नहीं किये हैं मगर ये छोटा सा गीत लिख कर अच्छा सा लगा. जैसे दुनिया जरा सी अच्छी हो गयी है...जरा सी बेहतर. मैं आजकल कवितायें भी नहीं लिखती हूँ. ऑफिस में कुछ कॉर्पोरेट गीत देखे तो वो इतने ख़राब थे कि देख कर सरदर्द होने लगा. और दुनिया में कुछ भी नापसंद होता है तो उसे बदलने की कोशिश करती हूँ...इसी सिलसिले में दो गीत लिखे थे...दोनों बाकी लोगों को बहुत पसंद आये...मेरे हिसाब से कुछ खास नहीं थे. मगर बाकियों को पसंद आये तो ठीक है. जैसे गीत हमें कोई बाहरी गीतकार ३० हज़ार रुपये में लिख कर दे रहा था उससे तो मेरे ये फ्री के गीत कहीं ज्यादा बेहतर थे. इतना तो सुकून था. तो थोड़ा सा इम्प्रैशन बन गया था कि मैं गीत अच्छा लिखती हूँ. गीत आज पढ़ कर सुनाया...ऐसा कभी कभार होता है कि अपना लिखा हुआ किसी को डाइरेक्ट सुनाने मिले...गीत सुनते हुए उनमें से एक की आँखों में चमक आ गयी...उसकी ख़ुशी उसके चेहरे पर दिख रही थी. उसे बहुत अच्छा लगा था. शब्दों से किसी के चेहरे पर एक मुस्कान आ जाए इतना काफी होता है...यहाँ तो आँखों तक मुस्कराहट पहुँच रही थी. इतना काफी था. मैंने उसके साथ कभी काम नहीं किया था...उसे अपनी लिखी एक कहानी भी सुनाई...और जाने क्या क्या गप्पें. जाते हुए उसने हाथ मिलाया और कहा 'इट वाज नाईस नोविंग यू'. बात छोटी सी थी...पर बेहद अच्छा सा लगा.

दोनों खुश थे. बहुत. उसका हग बहुत वार्म था...बहुत अपना सा. बहुत सच्चा सा. अच्छाई पर से टूटा हुआ विश्वास जुड़ने लगा है. शुक्रिया. मुझे अहसास दिलाने के लिए कि दुनिया बहुत खूबसूरत है...कि मुझमें कुछ अच्छा करने की काबिलियत है. नीम नींद और नशे में लिख रही हूँ. इस फितूर की गलतियां माफ़ की जाएं.

In healing others we heal ourselves.

22 June, 2014

दुख के बाजार में सट्टा


मन क्या क्या ना दुख पाले रहता है। तुम सुनोगे तो हँसोगे मुझपर वाकई। अक्सर देखा है किसी से बहुत दिन हो जाये बात करते हुये तो जिनसे तुम, ताम, बे, तबे सब हुआ करता था उन्हें आप कह के बुलाने लगोगे। वो जो सदियों की पहचान थी खत्म हो जाती है। सब कुछ फिर से शुरू करना होता है। लेकिन ऐसा हमारे बीच क्या इतना मजबूत सा बना हुआ है कि आजतक कभी तुम्हें चोट्टा बोलने में कभी सोचना नहीं पड़ा इन फैक्ट तुम्हारे बारे में सोचती भी हूँ तो तुम्हें इन्ही विषेशणों से नवाज़े बिना नहीं सोच सकती। लतखोर, हरपट्टी…वगैरह। 

तकलीफ किस बात की है मालूम…बहुत दिन हो गये किसी नाम के साथ ‘वा’ लगाये हुये। अब देखो ना पब्लिक फोरम में तुम्हारा नाम कैसे लिख दें…तुम जो इतना इज्जत कमाये हो इतने साल साल में उसका तो धज्जी उड़ जायेगा जब लोग जानेंगे कि हम तुमको तुम्हारे घर के नाम से बुलाते हैं और उसपर भी तोड़ कर। पर डब्बू भी कोई नाम हुआ भला, इससे बढ़िया कलछुल रख देते। हम जो तुमको डबरवा बोलते हैं तो कितना तो क्यूट लगता है। डाबर दंत मंजन वाली फील आती है। वैसे भी तुम जैसे करकुट्ठे हो कि खाली दांते दिखता है और आँख। 

किसी को तुम्हारे जैसे बुलाया नहीं जबकि ये स्पेशियालिटी बिहारी लोग सब को बिना भेदभाव के प्रोवाइड करते हैं। हम सबको ऐसे बुलाते तो भी क्या फर्क पड़ जाता। तुम जानते हो कि तुम्हारा नाम लेते हैं तो एक कोमलता आ जाता है चेहरे पर…जैसे किसी माँ का जो सबसे बिगड़ैल बच्चा होता है उसके प्रति वो थोड़ा सा ज्यादा लीनीयेंट होती है। उसके सौ गुनाह माफ, लेकिन सबसे ज्यादा प्रेशर भी उस पर ही होता है, क्योंकि बाकी लोग तो किसी तरह बन ही जायेंगे मगर इस खुराफाती के बर्बाद होने का सारा इल्जाम माँ पर आयेगा और फिर मौसियां, भाभियाँ, फुफ्फियाँ ताने दे दे कर जीना मुहाल कर देंगी। किसी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि बाकी बच्चे अच्छा खा कमा रहे हैं। अब सारे लोग अगर शहर ही चले जायेंगे तो गाँव में फसल की देखभाल कौन करेगा। लेकिन जैसा कि दस्तूर है, बाहर जाने वाले को हमेशा बेहतर मान लिया जाता है। उनकी कितनी तो इज्जत की जाती है। 

मगर तुम चिंता मत करो, तुम मेरे सबसे फेवरिट रहोगे। जितने लड़के मेरी जिन्दगी में आये उनसे भी ज्यादा। मुझे किसी ने सबसे ज्यादा समझा है तो वो तुम हो। मेरे उलूल जुलूल दुनिया के फंडे तुम्हारे सिवा कौन समझता। तो जितनी शामें मैंने तुमसे गपियाते बितायी हैं किसी और के साथ तो क्या ही बिताये होंगे। मगर तुम्हें एक बार मुझसे मिलना चाहिये था। कभी तो मंटो की कोई किताब वाकई फेंक कर मारती तुमको। सर में गुम्मड़ होता तो कितने दिन याद रखते हमको। याद में क्या क्या आता है रे। मालूम नहीं कैसे। ये ब्रेन की वायरिंग कैसी तो है। एकदम मेरी समझ से बाहर। एक दिन सपना देखे कि सब बच्चा लोग के साथ कबड्डी खेल रहे हैं, तुम लाइन के एकदम पास हो कि पैर में गुदगुदी लगाने लगते हैं। फिर दिन का सारा खेल ही गड्डमड्ड है। सब लोग मिल कर खाली एक दूसरे को गुदगुदी लगा रहे हैं, इस चक्कर में नया टाली लगा हुआ पुआल पर जो धांगड़मस्ती शुरू हुआ कि अभी तक देह लहर रहा है। घर में सबका बराबर कुटाई हुआ था वापस आने के बाद। 

मालगाड़ी गुजर रहा था, स्टेशन पर। तुम्हारा याद क्यों आया मालूम नहीं। एक बार वो वाला गाना सुन रहे थे…शम्मी कपूर वाला, मुझको देखे बिना करार न था, एक ऐसा भी दौर गुजरा है। वाकई कैसे भूलना मुमकिन है। याद है एक वक्त तुम्हारे शहर में बारिश होती थी तो मुझे बताते थे। दिल्ली कभी भीगी होगी वैसे कभी…शायद नहीं। मेरे तुम्हारे बाद शहर भी कितना खाली हो गया होगा ना। इंटरनेट से दूर हो अच्छा कर रहे हो…सच के लोग होते हैं। यहाँ तो सब माया है बाबू। तुम जाने क्यों लगता है कि सच में होगे कहीं…मेरे ख्यालों, मेरी कहानियों से इतर भी कहीं। कभी सोचते हैं कि फिल्म बनायेंगे तो डायलोग तुम्हारे सिवा कोई नहीं लिख पायेगा, कि तुम मेरे किरदारों को समझोगे, जैसे मुझे समझते आये हो अभी तक।

भगवान जाने कौन दुनिया में रहते हो, और मुहब्बत किस शय का नाम है। तुम्हारे मेरे बीच क्या है ये भी मालूम नहीं…तुम कभी थे नहीं तो क्या है जिसकी इतनी कमी महसूस होती है। तुम्हारी उलट पुलट मात्राओं में अपना हँसना क्युं दिखायी देता है। किसी लड़की से झापड़ खा के आते हो तो किसको बताते हो आजकल…मेरे जैसी कोई ढँूढे हो क्या? तुम तो बड़े हीरो हो, बड़के साहित्तकार भी बनोगे जल्दी…ए गो शब्द दो ना, हमारे तुम्हारे बीच में चलता क्या है?

जैसा कि तुम कहते हो…हमरा तो जिन्दगी गुजर जायेगा ई झगड़ा करते कि दुन्नो को प्यार था कि नहीं था। 

17 May, 2014

इश्क रंग


इत्ती सी मुस्कुराहट
इजहार जैसा कुछ
कलाईयों पे इत्र तुम्हारा
मनुहार जैसा कुछ

ख्वाबों में तेरे रतजगे
विस्की में तेरा नाम
उनींदी आँखों में तुम
पुराने प्यार जैसा कुछ

तेरे सीने पे सर रख के
तेरी धड़कनों को सुनना
मन के आंगन में खिलता
कचनार जैसा कुछ

बाँहों में तोड़ डालो
तुमने कहा था जिस दिन
रंगरेज ने रंगा मन
खुमार जैसा कुछ

खटमिट्ठे से तेरे लब
चक्खे हैं जब से जानां
दिल तब से हो रहा है
दिलदार जैसा कुछ

कलमें लगा दीं तुमने
मेरी तुम्हारीं जब से
लगता है आसमां भी
गुलजार जैसा कुछ

03 May, 2014

ये मौसम का खुमार है या तुम हो?

याद रंग का आसमान था
ओस रंग की नाव
नीला रंग खिला था सूरज
नदी किनारे गाँव

तुम चलते पानी में छप छप
दिल मेरा धकधक करता
मन में रटती पूरा ककहरा
फिर भी ध्यान नहीं बँटता

जानम ये सब तेरी गलती
तुमने ही बादल बुलवाये
बारिश में मुझको अटकाया
खुद सरगत होके घर आये

दरवाजे से मेरे दिल तक
पूरे घर में कादो किच किच
चूमंू या चूल्हे में डालूं
तुम्हें देख के हर मन हिचकिच

उसपे तुम्हारी साँसें पागल
मेरा नाम लिये जायें
इनको जरा समझाओ ना तुम
कितना शोर किये जायें

जाहिल ही हो एकदम से तुम
ऐसे कसो न बाँहें उफ़
आग दौड़ने लगी नसों में
ऐसे भरो ना आँहें उफ़

कच्चे आँगन की मिट्टी में
फुसला कर के बातों में
प्यार टूट कर करना तुमसे
बेमौसम बरसातों में

कुछ बोसों सा भीगा भीगा
कुछ बेमौसम की बारिश सा
मुझ सा भोला, तुम सा शातिर
है ईश्क खुदा की साजिश सा 

09 April, 2014

उसकी गर्दन का नीला आर्किड आँसुओं के इंतज़ार में प्यासा था

वे शब्द बड़े जिद्दी थे. उस लड़की की ही तरह. अपनी ही चाल चलते, मनमानी। कलम की निब के साथ भी दिक्कत थी थोड़ी, जरा सी बस उत्तर अक्षांश की ओर झुकी थी, जैसे धरती चलती है न डगमग डगमग, वैसे ही कलम भी चलती थी उसकी, जरा सी नशे में झूमती। कलम में समंदर का पानी भरा हुआ था कि जिससे लड़की कहानियां लिखा करती थी. लिखते हुए उसे कुछ मालूम न होता कि वो क्या लिख रही है. कई दिनों बाद सूखे हुए कागज़ पर ब्रेल लिपि जैसा कुछ लिखा रहता जिसे बस वो लड़का पढ़ सकता था जिसकी कलम से पहली बार लड़की ने कहानी लिखी थी.

लड़का भी जिद्दी था अजीब, ये नहीं कि रोज मिल कर कहानियां पूरी कर जाए. कभी सदियों में एक बार आता. लड़की भी वैसी ही पागल, इंतज़ार के आँसुओं को बचा कर रखती। लड़की की गर्दन के पास फूलों की बेल उगने लगती जिसमें वॉयलेट रंग के ऑर्किड खिलते। लड़के को आर्किड बहुत पसंद थे, वो जाने के पहले लड़की को गले लगाता तो खुश्बू में डूबे ऑर्किड्स उसके होटों को छू जाते। लेकिन ऑर्किड्स में खुद की कोई खुशबू नहीं होती, वे लड़की की गंध से पलते बढ़ते थे. लड़के को मालूम नहीं था कि आर्किड परजीवी होते हैं, उनका स्वतंत्र कोई वजूद नहीं होता। इश्क़ भी ऐसा ही होता है न कुछ.

पिछली बरसातों में जब लड़का उससे मिलने आया था तो खपरैल वाली छत से पानी लगातार बह रहा था. लड़की के लिखे हुए कागज़ों में सीलन लगने लगी थी. नमक यूँ भी पानी बहुत सोखता है.  लड़की को वैसे तो कहानियां सुनाना पसंद नहीं था और वो अक्सर लिख कर भूल भी जाती थी किरदारों को. लड़का इस बार लैपटॉप लेकर आया था कि ये लिखने पढ़ने के झमेले से हमेशा के लिए निजात मिल जाए. लड़की की कहानियां मगर हुस्नबानो को टक्कर देतीं। हर रात उसकी कहानी के किरदार बदल जाते। कभी कोई नया किरदार उग आता. लड़का एकदम हैरान परेशान हो जाता कि उसे कोई उपाय ही नहीं सूझता। लड़की बंजारन थी, हवाओं पर थिरकती, लड़का उसके साथ देश देश घूमता। हर  किस्सा लिखता। उसे मालूम नहीं चला कब लड़की उसका हाथ  पकड़ कर सड़कों पर चलने लगी, कब लड़की की कलम ने लड़के की आँखों के काले रंग से किरदार रचने शुरू कर दिए. ये किरदार मायावी होते थे, लड़के के जानी दुश्मन। ईर्ष्या और डाह में जलते हुए ये नित काला जादू करते थे. उनका उद्देश्य था लड़के की कलम में इत्र भर देना कि वो जो भी लिखे लड़की की खुश्बू में डूबा लिखे। वे चाहते थे वो लड़की का गुलाम बन कर ताउम्र उनके साथ समंदर किनारे उस छोटे से एक कमरे के घर में रहे. एक तरह से देखा जाए तो उनका डाह प्यार का ही एक रूप था. उस प्यार का जो लड़की कभी उससे कर नहीं पायी, कह नहीं पायी। ये अधूरे, प्यासे किरदार थे मगर उनमें लेशमात्र भी डर नहीं था. 

लड़के की घड़ी में वक्त और दिन दोनों दिखते थे मगर लड़का भूल गया था कि उसने दाहिने हाथ में घड़ी पहन ली है. इक शाम साथ टहलते हुए उनके हाथ हौले से आपस में छू जा रहे थे. लड़की दाहिने हाथ में घड़ी पहनती थी, लड़का बाएं। हाथ टकराने से घड़ियों के ख़राब हो जाने का अंदेशा था. उस लम्हे से लड़का वक्त की सारी गिनती भूल गया था. उसकी सुबहें लड़की की मुस्कुराहटों से होती और शामें गुमे हुए पन्नों से धुंधलाये शब्द तलाशते गुजरतीं। लड़की की कहानियां लिखते लिखते उसकी उँगलियों में भी आर्किड उगने लगे थे. उसके नाखून नीले पड़ने लगे और आँखों का रंग भी काले से नीले में परावर्तित होने लगा.

उसे मालूम नहीं चला कब वो नीले रंग के आर्किड में पूरी तरह परिवर्तित हो गया. लड़की के लिखे में अब इश्क़ नहीं होता, उसके आंसू जब गालों से ढुलक कर कभी गर्दन पर गिर पड़ते तो उस इकलौते नीले आर्किड से समंदर की खुशबू आती.

06 April, 2014

समंदर की बाँहों में - डे २- पटाया

रात थी भी क्या? सुबह उठी तो लगा कि कोई सपना देखा है। सपने में बहुत सारा पानी था। समंदर था। डूबता सूरज था। फिर बालकनी में गयी तो दूर तक फैला नीला-हरा समंदर दिखा। ख्वाब नहीं था। नेहा उठ गयी थी। बगल वाले बालकनी से भी आवाज आ रही थी। नेहा ने तब तक मार्क को कौल कर लिया था। जौर्ज और मार्क का रूम हमारे रूम के नीचे वाले फ्लोर पर था। फोन किया तो मार्क  तैयार होकर नाश्ता कर चुका था और कमबख्त ने जौर्ज को उठाया तक नहीं था। हम दोनों पहले बौस को उठाने का शुभ काम निपटाये, कौफी पी थी या नहीं अब याद नहीं। मेरी आवाज अच्छी खासी लाउड है, उस पर नेहा साथ हो तो बस। पूरी बिल्डिंग न उठ गयी गनीमत है।

सब लोग फटाफट रेडी हो कर खाने पहुंच गये। शेरटन का ब्रेकफास्ट बढ़िया था एकदम। आज का प्लान था कोरल आईलैंड जाने का। बस टाईम पर आ गयी थी। लोगों ने शौर्टस वगैरह खरीदीं, कुछ ने टोपी भी लीं। फिर हम स्पीडबोट पर बैठ कर आइलैंड की तरफ चल दिए. समंदर में स्पीडबोट ऐसे चलती है जैसे बैंगलोर की सड़कों पर मेरी बाइक, कसम से क्या स्पीडब्रेकर थे समंदर में. लहर लहर पर उछलती स्पीडबोट। बहुत सारा पानी उड़ता हुआ. नमक का खारा पानी। दूर तक दिखता खूबसूरत समंदर। कैमरा वैगेरह मैंने बैग में ही डाल दिया था. कभी कभी जीना रिकॉर्ड करने से ज्यादा जरूरी और खूबसूरत होता है. बीच समंदर में कहीं एक बड़ी सी बोट पार्क थी. वहाँ पर लोग पैरासेलिंग कर रहे थे. टीम में सबने पैरासेलिंग की. नेहा। जॉर्ज। बग्स। अनिशा। मैंने नहीं की :( वो जो पैराशूट को पानी में डुबाते हैं वो देख कर मेरी जान सूखती है.


वहाँ से आइलैंड के पास एक और बोट पार्क थी. वहाँ आप मछलियों को देखने पानी के अंदर जा सकते थे. मुझे क्लौस्ट्रफ़ोबिया है. बंद जगहों से डर लगता है. उस पर पानी से तो और भी डर लगता है. यहाँ पर दोनों का कॉम्बिनेशन था. एकदम किलर। एक हेलमेट पहनना होता है, जैसे स्पेस ट्रैवेलर पहनते हैं न, वैसा और फिर आप पानी में नीचे चल सकते हैं. कुल मिला कर बीस मिनट का प्रोग्राम था. पहले तो मैंने सोचा नहीं जाउंगी पर देखा कि सब जा रहे हैं. तो बस ज्यादा सोचे बिना भाग के गयी कि मैं भी जाउंगी। इंस्ट्रक्टर ने बताया कि नीचे पानी के दबाव के कारण कान में दर्द हो सकता है, ऐसे में हेलमेट के नीचे से हाथ डाल कर नाक बंद करनी होती है और तेजी से सांस बाहर निकालनी होती है ताकि कान से हवा निकले। ऐसा करने के बाद दर्द बंद हो जाएगा। किसी भी हाल में घबराने की जरूरत नहीं है. लोग आसपास ही रहेंगे। अगर सब ठीक है तो ओके का साइन नहीं तो तर्जनी से ऊपर की ओर इशारा करने पर ऊपर ले कर आ जायेंगे। फिर सबने समझाया कि घबराना मत, सारे मेरे साथ हैं. मेरा सफ़ेद हुआ चेहरा शायद दिख रहा होगा सबको। पानी में पैर डालते ही मेरे होश फाख्ता होने लगे. मगर मैंने खुद को कहा कि मैं कर सकती हूँ. मुझे बस गहरी सांस लेनी है, बाहर छोड़नी है. बस. हेलमेट पहनाया गया तभी लगने लगा कि बड़ी आफत  मोल ली है, मुझसे नहीं होगा। पानी के अंदर बोट की सीढ़ियां उतर कर गहरे पानी में जाना था. कोई बहुत सी सीढ़ियों के बाद इंस्ट्रक्टर ने पैर पकड़ कर नीचे गहराई में खींच लिया। जाने कितने फीट नीचे थे हम पानी में. कानों में बहुत तेज़ दर्द हुआ और बहुत डर लगा. जैसे कि दम घुट रहा है और जान चली जायेगी। इंस्ट्रक्टर बार बार ओके का साइन बना के पूछ रहा था कि सब ठीक है और मुझे कुछ ठीक लग ही नहीं रहा था. जॉर्ज भी सामने, कितनी बार उसने भी ओके का साइन बना के पूछा। मगर मुझे इतनी घबराहट हो रही थी कि लगा जान चली जायेगी। मुझे आज तक उतना डर कभी नहीं लगा था. ऊपर जाने कितना गहरा पानी था. हम पानी में जाने कितनी दूर और कितनी देर तक चलने वाले थे. सब कुछ स्लो मोशन में था। मुझे लगा मुझसे नहीं होगा। मैंने ऊपर जाने का सिग्नल दिया। इंस्ट्रक्टर मुझे लेकर ऊपर आ आया.

जैसे ही पानी से बाहर आयी जान में जान आयी. फिर मालूम चला कि नहीं जाने पर भी जो ढाई हज़ार रुपये लगाए हैं वो वापस नहीं मिलेंगे। फिर ये भी लगा कि डर गयी तो हमेशा डर लगता रहेगा। अपनी बहादुरी का झंडा जहाँ तहां गाड़ते आये हैं यहाँ कैसे हार मान जाएँ। एक बार ये भी लगा कि सब चिढ़ाएगा बहुत। उस वक्त ऑफिस की टीम का कोई भी नहीं था बोट पर, सब लोग नीचे थे पानी में. एक थाई लड़की थी, उसने समझाया कि पांच मिनट में सब नॉर्मल हो जाएगा, बस गहरी सांस लेते रखना...याद रखना कि पानी में सांस लेना भी एक काम होता है. हिम्मत करके चली जाओ. उस वक्त लग रहा था कि इश्क़ के बारे में भी तो ऐसे ही कुछ नेक ख्याल हैं मेरे। फिर जब इतना खतरा वाला तूफानी काम करने में कभी डर नहीं लगा कि तो ये अंडरवाटर वॉक क्या है. मैं कर लूंगी। मैंने कहा कि मैं फिर से अंदर जाना चाहती हूँ. बोट पर जितने क्रू मेंबर थे सबसे खूब तालियां बजा कर मेरा उत्साह बढ़ाया। मैं फिर पानी में उतरी। वापस बहुत सी सीढ़ियां और नीचे। नीचे बग्स और जॉर्ज थे सामने। उनके चेहरे पर 'यु हैव डन इट गर्ल' वाला भाव था. मैंने गहरी गहरी सांसें लीं और जैसा कि इंस्ट्रक्टर ने कहा था चुविंगम चबाती रही. सारा ध्यान सांस लेने पर. थोड़ी देर में सब नॉर्मल लगने लगा. सारे लोग एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए थे. मेरे एक तरफ जॉर्ज और एक तरफ बग्स  था. एक आधी बार लगा कि कहीं बेचारों का हाथ फ्रैक्चर न हो जाए मैंने डर के मारे इतनी जोर से पकड़ रखा था. फिर सामने बहुत सारी मछलियां आयीं। ये किसी बड़े अक्वेरियम में होने जैसा था. सब कुछ एकदम साफ़ दिख रहा था. मछलियां जैसे स्लो मोशन में सामने तैरती थीं. चटक पीले रंग की मछलियां, गहरे नीले रंग की मछलियां, कोरल, सी स्पंज और बहुत सारा कुछ. इंस्ट्रक्टर हमें ब्रेड का एक टुकड़ा देता था हाथ में और मछलियां ठीक आँखों के सामने आकर उसे खाने लगती थीं. मुझे पिरान्हा याद आने लगी थी. हम जाने कितनी देर तक समंदर के अंदर चलते रहे. ये सब सपने जैसा था. सब कुछ एकदम ठहरा हुआ. कोई फ़ास्ट मोवमेंट नहीं। धीमे धीमे चलना। आसपास की खूबसूरती को देखना। महसूसना। जीना।

वक्त ख़त्म हुआ तो हम बोट पर वापस आ गए. सबने शब्बाशी दी कि मैंने डर पर काबू पा लिया। कि मैंने हिम्मत की. डर के आगे जीत है :) फिर हम स्पीडबोट से आइलैंड पर गए. बैग वैग धर कर सारे लोग समंदर की ओर दौड़े। मुझे तैरने का एक स्टेप आता है बस तो मैं बस पानी में चल रही थी. जॉर्ज और नेहा फ्लोट कर रहे थे. उन्हें देख कर मुझे बहुत रश्क हो रहा था कि काश और कुछ भी न आये स्विमिंग करने में बस फ्लोट करना आ जाए किसी तरह. जॉर्ज बहुत अच्छा टीचर है, सिखाने की बात पर एकदम एंथु में आ जाता है. उसने कहा खुद को पानी में छोड़ के देखो, नहीं डूबोगी और कमर भर पानी में कोई डूबता है भला और उसके भी आगे मैं हूँ बचने के लिए. मैंने एक आध बार कोशिश की और हर बार डूबने लगती थी. फिर मुझे लगा कि नहीं होगा मुझसे। सब लोग फिर पानी में नॉर्मल बदमाशी कर रहे थे. तैरना बहुत कम लोगों को आता था. मैं थोडा और गहरे पानी में गयी कि घुटने भर पानी में तो फ्लोट नहीं ही होगा। समंदर एकदम शांत है वहाँ। कोई लहरें नहीं। उसपर पानी गर्म। जैसे गीजर से आ रहा हो. चूँकि बहुत सारे लोग थे आसपास तो डूबने का डर नहीं लग रहा था।  मैंने गहरी सांस ली और रोक ली. खुद को पानी में छोड़ दिया। बाँहें खोल लीं और पैरों के बीच लगभग डेढ़ फुट का फासला बना लिया। मैं पानी में ऊपर थी. एकदम फ्लैट। कान पानी के नीचे थे. पानी का लेवल चेहरे के पास था. बस नाक ऊपर थी पानी में. मैंने आँखें भींच रखी थीं. यकीं नहीं हो रहा था लेकिन आई वाज फ्लोटिंग। मैंने आँखें बंद रखीं और जोर से चीखी 'जॉर्ज आई एम फ्लोटिंग'. इसके थोड़ी देर बाद मैं पानी में वापस खड़ी हो गयी. इतना अच्छा लग रहा था कि क्या बताएं। फिर मैंने देखा कि ऑफिस के सारे लोगों ने नोटिस किया कि मैं वाकई फ्लोट कर रही थी. बस फिर क्या था सारे लोग जॉर्ज के पीछे कि मुझे भी सिखाओ। जॉर्ज ने लगभग सबको फ्लोटिंग सिखायी। कुछ देर बाद तो इतना मजा आ रहा था जैसे फ्लोटिंग क्लास चल रही हो. मैंने अनिशा और प्रदीप को फ्लोटिंग सिखायी। अनिशा ने कर लिया मगर प्रदीप के लिए जॉर्ज की जरूरत पड़ी. वो डूबता तो उसे मैं बचा भी नहीं पाती ;) बेसिकली पानी में सबसे डर सर नीचे करने में लगता है. सब एक बार उस डर से उबर गए तो फ्लोटिंग बहुत आसान है.

मुझे वो पहली बार फ्लोटिंग जिंदगी भर याद रहेगी। पहले बहुत सा शोर था. बहुत से लोग. फिर बाहें फैला कर पानी में पीठ की और हौले से गिरना होता है, ऐसा भरोसा कर के कि कोई है जो बाँहों में थाम लेगा, जैसे समंदर पानी का कोई मखमली गद्दा हो. साँस रोके हुए. फिर पहली सांस छोड़ते हुए महसूस होता है कि सब कुछ शांत हो गया है. कहीं कोई आवाज नहीं है. कहीं कुछ भी नहीं है. बहुत शांति का अनुभव होता है. इस शोर भरी दुनिया में जैसे अचानक से पॉज आ जाता है. पानी चारो तरफ होता है. जैसे समंदर चूम रहा हो. जिस्म का पोर पोर. Its like a giant hug by the sea. समंदर की बाँहों में जैसे बहुत सा सुकून है. जिंदगी भर का सुकून।

श्रीकांत -पैरासेलिंग के बाद
किसी का वापस जाने का मन ही ना करे. मगर लंच का टाइम हो रहा था. वापस तो जाना ही था. सब झख मार के वापस आये. कपड़े बदलने की जगह नहीं थी और वक्त भी नहीं। किसी जगह शायद ४० बाथ (लगभग ८० रुपये) देने थे तो सर्वसम्मति से निर्णय हुआ कि बोट पर चलते हैं. लंच करके होटल चले जायेंगे और वहीं कपड़े बदल लेंगे। मौसम गर्म था तो कपड़े सूख भी जाते। अब मेरी चप्पल ही न मिले। भारी दुखी हुयी मैं. अभी कुछ दिन पहले क्रॉक्स खरीदी थी, ढाई हज़ार की चप्पल का चूना लग गया. बहरहाल हम किनारे लौटे। हमारी बस नहीं आयी थी. धूप के कारण जमीन बहुत तप रही थी और पैर रखना पौसिबल नहीं था।  जॉर्ज ने कहा जब तक बस आती है चलो तुमको चप्पल दिलाता हूँ नहीं तो यहीं भंगड़ा करती रहोगी। हम भागे भागे आये चप्पल लेने। जब जो चाहिए होता है उसके अलावा सब कुछ मिलता है दुनिया में. समुद्र किनारे घड़ी घड़ी लोग चप्पल बेच रहे थे और हम खरीदने चले तो चप्पलचोर सारे नदारद। कुछ दूर जाके फाइनली चप्पल मिली तो हम खरीद के वापस आये. अब ऑफिस के सारे लोग गायब। फोन करो तो कोई फोन न उठाये। मैं, जॉर्ज, रवि और श्रीकांत थे. वहाँ एक मॉल था और सबका वहीं अंदर जाने का प्रोग्राम था. मैंने देखा कि ऊपर फूड कोर्ट है. अब चूँकि ऑफिस में सब तरह के लोग हैं तो मुझे लगा कि लोग फूड कोर्ट ही गए होंगे खाने के लिए कि सबको अपनी पसंद का खाना मिल जाए तो जॉर्ज और मैं ऊपर देखने बढ़े. ऊपर गए तब भी कोई नहीं दिखा और तब तक भूख के मारे जान जाने लगी. तैरने के बाद एक तो वैसे ही किलर भूख लगती है उसपर मुझे भूख बर्दाश्त नहीं होती। हमें एक इन्डियन जगह दिख गयी. वहाँ छोले भटोरे थे. बस हिंदी में आर्डर किया मजे से और एक ग्लास अमरुद का जूस. मेरा बैग चूँकि मेरे पास था तो पैसे, कपड़े सब थे पास में. जब तक खाना आया मैंने चेंज भी कर लिया वाशरूम में जा के. कसम से क्या कातिल छोले भटोरे थे, मैंने आज तक वैसे छोले भटोरे भारत में नहीं खाये कभी. खाना खा रहे थे तो रहमान का कॉल आया जॉर्ज को, वो लोग इसी मॉल में दूसरे फ्लोर के रेस्टोरेंट में खाना खा रहे थे. बस के आने में डेढ़ घंटे का टाइम था. खाना खाते, गप्पें मारते कब वक्त निकल गया मालूम ही नहीं चला. बाकी लोगों का खाना हो गया तो नेहा और बग्स भी ऊपर आ गए. कुछ देर हम सब समंदर निहारते रहे. फ़ोटो खींचते रहे और जाने क्या क्या बतियाते रहे. टीम में मेरे आलावा सिर्फ बाला वेजिटेरियन है. बस में उसको खूब चिढ़ाये कि हम तो छोला भटूरा खाये, तुम क्या खाये ;) ;)

रात को ऐलकजार शो था, बेहतरीन म्यूजिक, कॉस्चुम और सेट डिजाइन। मैंने उतना खूबसूरत शो नहीं देखा है आज तक. सब कुछ बेहतरीन था वहाँ।  फिर समंदर किनारे एक रेस्टोरेंट में खाना। ग्रीन सलाद। वेज आदमी को और क्या मिलेगा। बहुत सी कहानियां कहीं, कुछ सुनीं। थोड़ा भटकी। दिवाकर रास्ता खो गया था उसको उठाये और फिर होटल वापस। हम ऑफिस में जिनके साथ काम करते हैं और घूमने जिनके साथ जाते हैं उनमें कितना अंतर होता है. इतना अच्छा लगा सबको ऐसे जानना। हमेशा किसी नए से बात करना। कोई नया किस्सा सुनना। हिंदी में सवाल करना, तमिल में जवाब सुनना, मलयालम में लोगों का बतियाना। उफ्फ्फ्फ़ ही था बस.

पटाया में आखिरी दिन था. अगले दिन बैंगकॉक के लिए निकलना था. हम स्विमिंग पूल में पैर डाले बैठे रहे. बतियाते। हँसते। दिल भर सा आया था. मुझ सी को ऐसे पूरा का पूरा ऐक्सेप्ट करना थोड़ा मुश्किल है. मेरा शोर. मेरा पागलपन। सब कुछ. मगर सब ऐसे थे जैसे एक बड़ा सा परिवार, जिसमें शामिल होने की कोई शर्त नहीं होती। बहुत अच्छा सा लगा. सुकून सा.
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समंदर था कि आसमान था कि समंदर में पिघलता हुआ आसमान था. जमीन कहाँ ख़त्म होती है आसमान कहाँ शुरू। समंदर से पूछूं उसे मेरा नाम याद रहेगा? सितारे हैं या कि आँखों में यादों का जखीरा।

शुक्रिया जिंदगी। इन मेहरबान दो दिनों के लिए. 

04 April, 2014

स्मोकिंग। इश्क़

लड़की थी। सिगरेट का आखिरी कश। तलब। इंतजार का चुभता स्वाद। ऐब्सिन्थ विद शुगर। टकीला शॉट। नीट स्कॉच विदाउट आईस। प्योर ड्रग। 
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आधी भरी डिब्बी से सिगरेट निकाली, बहुत देर तक उसे यकीन नहीं हुआ कि खुदा ऐसी गलती भी कर सकता है। दरगाह के बाहर के फकीर ने उसके माथे पर हाथ रख कर दुआ दी थी, तुम्हारी रूह को तुम्हारे जिस्म से आजाद करता हूँ। चाहे कितनी भी खरोंचें आ जाएं जिस्म पर, तुम्हारी रूह हमेशा यूँ ही रहेगी, दुआओं की खुश्बू से सराबोर, इश्क़ से लबालब। बांटने में कभी तुम्हारा हाथ तंग नहीं होगा। फिर कैसे हो गया था ऐसा, जिस्म पर खरोंच का एक निशान भी नहीं...दर्द इतना गहरा कि लगता था रूह में ज़ख्म हों। झूठा फकीर था या कि इश्क़? 

इस न समझ आने वाली दुनिया में उसकी सुरक्षा के लिए सिर्फ चुप्पी थी। ख़ामोशी से उसे सारी जद्दोजहद महसूस करनी थी। उसके सारे ख़त उसके सीने में दफ़न होने वाले थे। सिगरेट की डिब्बी पड़ी हुयी थी। उसने पहली सिगरेट निकाली और गहरी सियाही वाली कलम से ऊपर लिखा 'आई लव यू'। कितना कुछ कहना चाहती थी उससे मगर इससे ज्यादा तकलीफ होती तो मर जाती वो। सेल्फ प्रिजर्वेशन भी जरूरी है। लाइटर की लौ उसकी आँखों में इस तरह लपकती जैसे सब कुछ ख़ाक करना का माद्दा रखती हो। हर स्पर्श, हर चुम्बन, मुस्कराहट का हर लम्हा जो रूह पर छाप छोड़ गया है जलता जाता। उसका नाम लेना चाहती मगर हर कश के साथ होंठ जल उठते। 'ही लव्स मी'। हर दूसरी सिगरेट के साथ दुनिया एक गहरा समंदर बन जाती जिसमें उसके पैर जमीन से बहुत ऊपर थे। किनारा बहुत दूर। सांस एक ही थी। गहरी। डूबने के जरा सा पहले। 'ही लव्स मी नॉट'। 

चेन स्मोकिंग। इश्क़ जैसा ही है न। एक ख़त्म होते ही दूसरे की तलब लगती है। 

पहला पैकेट ख़त्म होने पर भी होश बाकी थे। जबकि ऐसा कोई वादा नहीं था, फिर भी लड़की को धोखा होता था कि इश्क़ कहीं होगा आसपास ही, छुपा हुआ। इश्क़ को होना चाहिए था। इतनी तकलीफ में वो उसे अकेला कैसे छोड़ सकता है। कहीं तो छुप के बैठा होगा। आखिरी सिगरेट के आखिरी कश में शायद। बाकी सिगरेटों में उसकी तलाश जारी रही। 'ही लव्स मी, ही लव्स मी नॉट'। 

लिक्विड आँखें थी उसकी। गहरी सियाह। लड़की ने घूँट घूँट उतारा है उन आँखों को खुद के अंदर। कितनी मुखर। कितने सारे कवियों की भाषा समझतीं। उसकी आँखें कुछ कहने नहीं देती लड़की को। सिर्फ चूमते हुए चुप होतीं...मगर उस वक्त लड़की के शब्द खो जाते। उन आँखों को देख कर उसका ब्लैक इंक से लिखने को जी चाहता। 

गहरे ज़ख्म थे। खुले हुए। यूँ भरने में बहुत वक्त लगता। सिगरेट पर उसने लिखा था 'यू टच्ड मी हियर'। सिगरेट सुई थी, धुएँ का धागा और सारे ज़ख्मों पर टाँके लगाने थे। धुआँ बहुत रहमदिल था। चूमता जाता जैसे कि जादू हो। हर टाँके के साथ लड़की का यकीन कुछ और पक्का होता जाता कि आँसुओं के खारे पानी में एक दिन गोता लगाने का हुनर सीख लेगी। जिद्दी थी बहुत। अपनी तकलीफों से कहीं ज्यादा। 

समंदर ने लड़की की साँसें अपने पास जमा रखी थीं। उसे मालूम था कि बिना तैरना जाने, बिना किसी ऑक्सीजन मास्क के, पगली फिर से डीप डाइव मारने आएगी। उसके क़त्ल का इल्ज़ाम समंदर अपने सर नहीं चाहता था। उसने लहरों के हाथ संदेशे भेजे। लड़की की आँखों का खारा पानी समंदर को पागल किये जा रहा था। समंदर पूरी दुनिया को बाँहों में भर कर तोड़ देना चाहता था। डुबा देना चाहता था वो टापू जिसके किनारे लड़की ने उसके होंठ चूमे थे और अब जान देने की जिद किये बैठी थी। समंदर के पास कोई चाँद वाली बुढ़िया भी नहीं थी जो लड़की को समझाती कि ईश्क़ को वोलंटरी रिटायरमेंट लिए बहुत वक़्त हुआ। डांट का असर लड़की पर होना नहीं था। 


मजबूर समंदर के पास कोई चारा नहीं बचा था। उसकी लहरों ने लड़की की सिगरेट पैकेट से सारे लफ्ज़ मिटा दिए। उसकी यादों से वो सारे लम्हे धुल गये कि जो उसकी साँस में अटक रहे थे। लिक्विड आँखें। सीली मुस्कुराहटें। उसकी बाँहों का कसाव। उसकी आवाज में पुकारा गया नाम। बस आखिरी सिगरेट पर का आखिरी लफ्ज़ मिटाते हुए समंदर भी रो पड़ा...बेहोश लड़की की उँगलियों में फँसी हुयी आखिरी सूखी सिगरेट थी...उसपर लिखा हुआ था 'ही लव्स मी नॉट'। 

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