29 January, 2015

येलो ब्लू बस तोस्का

सुनो, मुझे एक बार प्यार से तोस्का बुलाओगे? जाने कैसे तो तुमसे बात करते हुए बात निकल गयी...कि मुझे भी अपने किरदारों के नाम रखने में सबसे ज्यादा दिक्कत होती है. फिर जब तुम मुझे तोस्का बुलाओगे तो मुझे लगेगा मैं तुम्हारी कहानियों का कोई किरदार हूँ और अपने मन का कुछ भी कर देने के पहले तुम्हारे आर्डर का वेट करूंगी. यूँ एक बार पुरानी कहानी लिखी थी जिसमें किरदार का नाम था तोश्का...बड़ी जहीन सी लड़की थी...अल्हड़...उड़ती थी...मगर जाने क्यूँ तुम्हारी आवाज़ में अपने लिए तोस्का ही सुनने का मन है...लगता है जैसे ये शब्द बना ही था इसलिए कि तुम कभी मुझे इस नाम से बुला सको. तुम्हारी आवाज़ में एक अधिकार उभरता है. जैसे कुछ हूँ मैं तुम्हारी. जैसे कोई कभी नहीं थी तुम्हारी कभी. तुम मुझे तोस्का बुलाओगे तो मैं तुम्हारी कहानी में उतर जाउंगी...तुम्हारी भाषा बोलूंगी...मेरी आँखें भी तुम्हारी आँखों जैसी हो जायेंगी न? लाईट ब्राउन.

तुम मुझे तोस्का बुलाओगे तो मैं अपना असली नाम भूल जाउंगी...मैं कोई और होने लगूंगी सिर्फ तुम्हारे लिए...मेरी बनायी पहचान के कांटे तुम्हारी यादों में नहीं चुभेंगे. हम एक जिंदगी में कई पैरलल जिंदगियां जियेंगे. फिर मैं एकदम पजेसिव हो जाउंगी और जिद मचा दूँगी कि तुम्हारी कहानियों में तोस्का के अलावा कोई और किरदार हो ही नहीं सकता. तुम्हारा दम घुटने लगेगा. तुम इस नाम से भागोगे. इस फीलिंग से भागोगे. तुम मुझसे दूर जाने के लिए दम तनहा हो जाना चाहोगे. इस दरमयान तुम अपनेआप को बेहतर पहचानोगे कि उस दूर पहाड़ी गाँव में कोई आइना नहीं होगा. तुम मुझे पूरा लिख नहीं पाओगे कि पूरा होना मेरी किस्मत में नहीं बदा है. तुम मुझे जरा सा बचा कर रखना चाहोगे अपने सीने में...अफ़सोस की तरह...तकलीफ की तरह...फिर बहुत सालों बाद दिल्ली में पड़ेगी बर्फ और तुम बेतरह रूस को मिस करोगे...मुझसे बस जरा सा ही कम. मैं इत्तिफाकन अपने रेड स्कार्फ में गिरहें लगाती गुजरूंगी उसी रास्ते से जहाँ तुम ठिठक कर खड़े हुए हो. तुम्हारी आँखें यूँ चमक उट्ठेंगी कि बरबस मेरे मुंह से निकल जाएगा बहुत साल पुराना, तुम्हारा प्यार का नाम 'सोंयिसको'. 
---होना था 'धूप'...और लगनी थी 'प्यास'
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एक पैरलल दुनिया होगी जिसमें इस दुनिया की कोई बंदिश नहीं होगी. सब कुछ अपनी मर्जी का. सब कुछ. उस दुनिया में मुझे बेहतरीन डांस करना आएगा और मैं तुम्हारे साथ क्लोज डांस करूंगी...इतने करीब कि तुम्हारी सांस मुझमें उतर जाए. सर्द सर्द बर्फ़बारी के किसी मौसम में.
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'बट आई हैव नेवर बीन टू रशिया. '
'तो अच्छा है न. जो शहर खुलेंगे उनके नाम असली होंगे बस...बाकी नक्शा सारा का सारा हम साथ मिल कर बना लेंगे...मौसम वही होगा जो गूगल दिखाएगा लेकिन हम अपनी मर्ज़ी से वहां अमलतास के पेड़ रोप आयेंगे. तुम्हें अमलतास पसंद तो है न या कुछ और?'
'अरे लेकिन ऑथेंटिक तो होना चाहिए.'
'ऑथेंटिक. मने रियल. तुम्हारा प्यार है ऑथेंटिक? कह सकते हो सीने पे हाथ रख के...एकदम खालिस...बिना मिलावट का? ऐसा नहीं है जान...कुछ भी रियल नहीं होता. हम भी किसी की काल्पनिक दुनिया में जी रहे हैं न...तो इस तिलिस्म के अन्दर एक और तिलिस्म हमारा. '
'मगर तोस्का!'
'हाय! तुम ये नाम लेते हो न तो बस सारे तानेबाने बुनना छोड़ कर तुम्हें किस करने का मन करने लगता है. कैसे तो लेते हो तुम ये नाम...जैसे मैं सदियों इसी नाम से सुनती आई हूँ खुद को...तुम हमेशा से तो यहाँ नहीं थे न?

गूगल ट्रांसलेट तोस्का का मतलब हिंदी में एक ही शब्द लिखता है 'तड़प'...अंग्रेजी में 'यर्निंग' मगर जब तक तुमने पुकारा नहीं था ये सिर्फ एक शब्द था...अब इस शब्द में जान आ गयी है. ये शब्द हमारे रिश्ते को भी तो परिभाषित करता है न...कुछ भी तो और नहीं है हमारे बीच...इस खिंचाव...इस तड़प के सिवा...सुबह से शाम की ये हरारत...ये इंतज़ार...फोन से व्हाट्सएप्प से लेकर फेसबुक तक...तुम्हारी एक झलक का...तुम्हारे एक स्माइली का...आवाज़ के ज़रा से एक कतरे का...कि बस यही है न. वरना कौन करता है किसी से यूँ निंदाये बात कि बाद में पूछो...'हम सुबह तुमसे क्या बात किये...नींद में थे...कुछ याद नहीं है'. कोई तो है इगोर इबोनोव...सोचो न...जाने कैसा होगा...कैसा दिखता होगा...स्क्रीनशॉट लेकर रखा है. हम जायेंगे यहाँ कभी. और इगोर को थैंक यू बोलेंगे.'
'तुम एकदम ही पागल हो. गूगल मैप पर किसी ने तस्वीर डाली है तो अब मिल लोगी जा कर उससे!'
'न रे...सोचो इगोर एकदम प्योर वोडका पीता होगा. खालिस. असली. जैसे हमारे यहाँ ताड़ी होता है वैसा कोई लोकल ड्रिंक वहां भी मिलेगा. उसके साथ बैठ के पीने में कितना मज़ा आएगा.'
'ए. तोस्का की बच्ची. अब मुझे जलन हो रही इगोर से...तुझे कोई भी अच्छा लग जाता है...किसी के भी साथ दारू पीने बैठ जायेगी कमबख्त. कोई पसंद नापसंद है कि नहीं तेरी?'
'माहौल होता है बस...पानी देख रहे हो कितना नीला है...जो ऐसी जगह रहता होगा...अच्छा ही इंसान होगा. इसमें सोचना क्या है. दोस्त, परिवार और कलीग्स से बढ़ कर हम हमारे शहर के होते हैं...बहुत बहुत बहुत. तुम भी तो बहुत पहाड़ घूमे हो, किसी बुरे पहाड़ी से मिले हो कभी? नहीं न...वे इतने साफ़ और निर्मल इसलिए होते हैं कि कि उनका माहौल ऐसा होता है.'
'तू बहुत जिद्दी है रे. अच्छा चल. तेरे इगोर के साथ वोडका पी लूँगा. खुश.' 

'सच्ची. तुम मुझे ले चलोगे ये जगह? मैंने यहाँ के कौरडिनेट्स नोट कर लिए हैं. बस जीपिएस में डाल देने की बात है. आजकल तो सिंपल है एकदम. सुनो, तुम्हारी म्यूजिक पर पकड़ तो अच्छी है न? जिनको कोई एक इंस्ट्रूमेंट बजाना आता है वो अक्सर कोई और भी बजा लेते हैं...तुम तो गिटार जानते हो...जरा सा बलालाइका से कुछ धुन निकाल पाओगे क्या?'

'तुमने कहा कि ये मेरी कहानी है...तुम तोस्का हो...अगर यहाँ अमलतास का पेड़ उग सकता है तो मैं बलालाईका तो बजा ही लूँगा.' 
'अब मेरा कुछ करने को जी नहीं कर रहा...मैं थक गयी.'
'ya lyublyu vas toska'
'येलो ब्लू बस...क्या क्या बोल रहे हो तुम अब.'
'पगली...मैंने तुझे राशियन में आई लव यू कहा. ठीक से प्रैक्टिस कर...जब मिलूंगा तो सुनूंगा तुमसे.'
'किस पर प्रैक्टिस करूँ? 'टी' को बोलूं? येल्लो ब्लू बस.'
'कमबख्त की बच्ची...किसी को बोल कर प्रैक्टिस करने की जरूरत नहीं है. यहाँ हम आई लव यू बोल रहे हैं और मैडम को खुराफात सूझ रहा है.'
'तोस्का मेरी जान...मेरा नाम तोस्का है...मैं तड़प हूँ...उँगलियों में सुलगती...आँखों में हहराती हुयी...मैं तुम्हारी जिंदगी में पा लेने का सुकून नहीं खो जाने का खौफ़ लेकर आई हूँ...लौन्गिंग...तड़प...आह...तकलीफ...कि मैं नहीं करती तुमसे प्यार'
'सुनो...तोस्का...मेरी तोस्का...'
'सुनो...सोंयिसको...'
'आहा...तुम सीख रही हो...जरा जरा...तुम्हारे इस टूटे फूटे उच्चारण से कैसी गुदगुदी सी होती है कि उफ़.'
'हाँ...मेरी जिंदगी की धूप हो तुम...मेरी आँखों का रंग...मेरी हथेलियों की सूखती लकीरें...छत पर पसारे हुए कपास के दुपट्टे में खनखनाती धूप हो तुम...सोंयिसको. सनशाइन. मेरा अपना सूर्य.'
'तुम प्यार करती हो ना मुझसे?'
'मालूम नहीं. तुम्हें क्या लगता है?'
'तोस्का...मेरी तोस्का...मेरी हो. इतना लगता है. बस.'

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मैं वोल्गा किनारे हूँ सुबह से. तुम्हारे साथ. तुम्हारी बांहों में. बहुत सी वोडका पी रखी है. झूम रही हूँ. कोई राशियन लोकगीत बज रहा है. शायद कोई चरवाहों का झुण्ड होगा दूर के किसी पहाड़ पर. हवा पर पैर धरते बलालाइका की धुन आई है. तुम्हारे होठों का स्वाद चेरी फ्लेवर्ड सिगार जैसा है.
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वोडका की बोटल शिकायत मोड में है. ये कैसी रात है कि सील तक नहीं तोड़ी है. चेरी जूस भी वैसा का वैसा धरा है फ्रिज में. फिर ये सब क्या था? उफ्फ्फ...तुम न. जान ले लो मेरी.

28 January, 2015

उसकी नाभि से नाभिकीय विखंडन की शुरूआत होती थी



हाई बाउंसिंग बॉल होती है न...वैसे ही छोटे छोटे गोले हैं. मेटल के. उनकी परिधि पर छोटी छोटी आरियाँ लगी हुयी हैं. बचपन में एक प्रोजेक्ट हुआ करता था जिसमें रबर की गेंद के हर इंच पर पिनें चुभायीं जाती थीं न...बस समझ लो उल्टा केस है. छोटी छोटी गेंदें हैं. बेहद खतरनाक. त्वचा से जिस्म में अन्दर उतर आई हैं और अन्दर से मिक्सी के ब्लेड्स की तरह चलती जा रही हैं...दिमाग...चेहरा...गर्दन...सीना...नाभि...बदन में अन्दर बिलकुल तेजी से रिवोल्व करती जा रही हैं. कुछ नहीं बचता है. जहाँ ह्रदय हुआ करता था...लंग्स...किडनी...जिगर...सारे पुर्जे कटते जा रहे हैं...जिस्म सिर्फ एक आवरण रह गया है...अन्दर का सब कुछ जैसे महीन पीस दिया गया है...दर्द दर्द दर्द...इतना कि मैं चीख नहीं सकती कि जुबान भी कहाँ बची है. और अब मैं खून की उल्टी करना चाहती हूँ...कि जिसमें मैं जितनी हूँ पूरी की पूरी बाहर निकल जाऊं. सिर्फ खोल बचे बाहर. त्वचा. चाँद रंग की त्वचा. संगमरमरी.

अन्दर का सब कुछ यूँ निकलने के बाद भी रूह का क्या होता है? रूह क्या कोशिकाओं में छुप कर रहती है नाभिकीय ऊर्जा की तरह? मेरे अणु आपस में टकरायेंगे तो कितनी ऊर्जा निकलेगी? 

मैं पूरी तरह खाली होने के बावजूद शब्दों से कैसी भरी हूँ. शब्द भी क्या रूह की तरह अणुओं में रहते हैं? चारों तरफ सिर्फ खून ही खून बिखरा देखती हूँ...कुछ पता नहीं चलता इसमें दिल का हिस्सा किधर है और दिमाग का किधर. मुझे खून से वितृष्णा नहीं होती है. मगर इस तरह खाली होने के बाद मैं ज्यादा देर बची रह पाऊँगी इस पर भरोसा नहीं है. ऊपरवाला इस सिस्टम रीहौल के बाद कुछ नया भरने के लिए रचेगा क्या या फिर हंसेगा मेरे ऊपर सिर्फ कि शब्द बहुत पसंद हैं न तुझे. अब शब्दों से ही बना अपनेआप को दुबारा. रच अक्षर अक्षर खुद को. मैं कर सकती हूँ ऐसा. मगर सवाल ये होगा कि क्या मैं ऐसा करना चाहती हूँ. यूँ सिर्फ जिस्म का छिलका रह गया है तो जल्द ही मर भी जाउंगी. शब्दों से खुद को रच लिया तो सदियों अभिशप्त हो जाउंगी कि शब्द कभी नहीं मरते. मुझे नश्वर जिंदगी चाहिए. मुझे खुदा नहीं बनना. 

होता है न...सारा कुछ उल्टी हो जाने के बावजूद भी लगता है कुछ बचा रह गया है...अगली बार कोशिश करने पर आँतों में मरोड़ होती है बस...चक्कर आता है...मैं भी वैसी ही बैठी हूँ. बदन से सारा कुछ निकल गया है. कोई धड़कन नहीं...सांस आने पर कोई ऊपर नीचे होते फेफड़े नहीं...सब स्थिर है. शांत. मगर इस खोखलेपन के बावजूद मौत आसपास क्यूँ नहीं दिखती. मेरी त्वचा क्या जिजीविषा से बनी है? 

इस खून में उँगलियाँ डुबो कर लोग कविता क्यूँ लिखना चाहते हैं. इस खून में उँगलियाँ डुबो कर तुम मेरा नाम लिखना चाहते हो कि मेरा नाम भर रह जाए. खून का कतरा कतरा रेडियोएक्टिव है. बेहद संक्रामक. जिधर जाएगा. जिसे छुएगा बर्बाद करेगा. या खुदा. तुझे ऐसा कोई काण्ड कहीं दूर थार के रेगिस्तान में करना था या बहुत गहरे समंदर में. मेरा कतरा कतरा जमीन में ज़ज्ब होना चाहता है. हवा में घुलना चाहता है. बिखरना चाहता है. बर्बाद करना चाहता है. नाम लिखना चाहता है. चीखना चाहता है. इश्क़ इश्क़ इश्क़.
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रात से रुलाई अटकी है सीने में. मगर अकेले रोने में डर लगता है. लगना भी चाहिये.

21 January, 2015

इश्क़ सियाही है और मेरा बदन कलम...जरा थाम अपनी उँगलियों में जानम...जरा करार की दरकार है

लिखना. पागलपन है.

मैं वो कहानियां नहीं लिखतीं जो मेरे रीडर्स सुनना चाहते हैं...नहीं...कोई नहीं जानता कि वो कैसी कहानियां सुनना चाहते हैं...मैं वो लिखती हूँ जो मैं लिखना चाहती हूँ...मैं वैसी कहानियां लिखती हूँ जो मेरे अन्दर उथल पुथल मचाये रहती हैं...वैसे किरदार जो चलते फिरते जिंदगी में दाखिल हो जाते हैं और जिद पकड़ के बैठ जाते हैं कि हमारी कहानी लिखो. मैं जब उस अजीब से ट्रांस में होती हूँ तो ना मुझे सामने कुछ दिखता है, न कुछ और सूझता है...कोई खिड़की खुलती है और मैं उस पूरे सीन में उतर जाती हूँ. वहां के रंग, धूप...खुशबुयें...सब महसूस होती हैं. मैं वैसे में फिर और कुछ नहीं कर सकती लिखने के सिवा कि अगर लिखा नहीं तो मेरा माथा फट जाएगा. 

हाँ...मुझे लगता है कि मैं इश्वर की कलम हूँ...वरना मेरे अन्दर इतना सारा कुछ लिखने को और कहने को क्यूँ है? मुझे क्यूँ हर हमेशा इतनी बात करनी होती है? मैं फोन पर बात करती हूँ...लोग जो मिलते हैं उनसे बात करती हूँ...मेरे अन्दर शब्द जैसे हमेशा ओवरफ्लो करते रहते हैं कि बहुत कुछ कह देने के बावजूद भी मुझे बहुत कुछ लिखना होता है. IIMC में एक बार पोएट्री कम्पटीशन में हिस्सा लिया था तो दोस्तों ने आश्चर्य किया था कि इतना बोलने के बाद भी तुम्हारे पास लिखने को शब्द कैसे बच जाते हैं. मैं शब्दों की बनी हूँ...पूरी की पूरी? और क्या है मेरे अन्दर...खंगालती हूँ तो कुछ नहीं मिलता. गुनगुनाहट है...गीत हैं...सीटियाँ हैं...सब कुछ कहने को...आवाजें...खिलखिलाहटें...शोर...बहुत सारा केओस. 

मैंने बहुत कम पढ़ा है...अक्सर मैं इतनी छलकी हुयी होती हूँ कि पैमाने में और कुछ डालने को जगह ही नहीं बचती. किसी और से भी बात करती हूँ तो देखती हूँ कि लोग कितना कुछ पढ़ रहे हैं...कितना कुछ गुन रहे हैं...सीख रहे हैं. मैं फिल्में फिर भी बहुत सारी देख जाती हूँ मगर वो भी मूड होने पर. मेरे लिए कुछ भी बस गुज़र जाने जैसा नहीं होता आजकल...हर कुछ बसता जाता है मेरे अन्दर. कोई सीन. कोई डायलाग. कोई बैकग्राउंड स्कोर. मैं चाहती हूँ कि पढूं...मैं चाहती हूँ कि कुछ नए शब्द, कुछ नए राइटर्स को पसंद करूँ, कुछ क्लासिक्स में तलाशूँ किसी और समय के चिन्ह...मगर हो नहीं पाता...एक तो मुझे बहुत कम चीज़ें बाँध के रख पाती हैं. मेरे अच्छे बुरे के अपने पैमाने हैं...अगर नहीं पसंद आ रही है तो मैं मेहनत करके नहीं पढ़ सकती. शायद मेरे में यही कमी है. सब कुछ नैचुरली नहीं होता. लिखना भी मेहनत का काम है. इसके लिए बैकग्राउंड वर्क करना चाहिए. अच्छे राइटर्स को पढ़ना आदत होनी चाहिए. 

अब मैं क्या करूँ. एक समय था कि बिना रात को एक किताब ख़त्म किये नींद नहीं आती थी. एक समय मैं सिर्फ तीन घंटे सोती थी लेकिन रोज़ की एक किताब का कोटा हमेशा ख़त्म करती थी. एक समय मुझे पढ़ने से ज्यादा अच्छा कुछ नहीं लगता था. एक समय मेरे लिए अच्छा दिन का मतलब होता था ख़ूब सारी धूप...भीगे हुए बाल...गले में लिपटा स्कार्फ और एक अच्छी किताब. एक समय मुझे वे लोग बहुत आकर्षित करते थे जिन्होंने बहुत पढ़ रखा हो...जो घड़ी घड़ी रेफरेंस दे सकते थे. उन दिनों मैं भी तो वैसी ही हुआ करती थी...कितने कवि...कितने सारे नोवेल्स के कोट्स याद हुआ करते थे. उन दिनों गूगल नहीं था. किसी को लवलेटर लिखना है तो याद से लिखना होता था. तभी तो मैं दोस्तों की फेवरिट हुआ करती थी चिट्ठियां लिखने के मामले में. ये और बदनसीबी रही कि कमबख्त जिंदगी में एक भी...एक भी...लव लेटर किसी को भी नहीं लिखा. इस हादसे पे साला, डूब मरने को जी चाहता है. बहरहाल...जिंदगी बाकी है. 

एक समय मेरे लिए परफेक्ट जगह सिर्फ लाइब्रेरी हुआ करती थी. मैं अपने आइडियल घर में एक ऊंची सी लाइब्रेरी बनाना चाहती थी जिस तक पहुँचने के लिए सीढ़ी हो और मैं अपने दिन किसी कम्फर्टेबल सोफे में धंसी हुयी किताबें पढ़ती रहूँ. किताबों को पढ़ना भी मजाक नहीं था...मुझे आज तक की पढ़ी हुए फेवरिट किताबों के पन्ने पन्ने फोटोग्राफ की तरह याद हैं कुछ यूँ भी कि उन्हें कहाँ पढ़ा था...किस समय पढ़ा था. लालटेन में पढ़ा था या ट्यूबलाईट में पढ़ा था. वगैरह. नयी किताब के पन्नों की खुशबू पागल कर देती थी उन दिनों. मगर अब बदल गयी हैं चीज़ें. 

अब मुझे किताबों से वैसा पागलपन वाला प्यार नहीं रहा...अब मुझे जिंदगी से प्यार है. अब मैं लाइब्रेरी में बैठ कर पढ़ना नहीं बाईक लेकर घूमना चाहती हूँ. अब मैं संगीत लाइव सुनना चाहती हूँ. अब मैं लोगों को ख़त नहीं लिखना चाहती. मिलना चाहती हूँ उनसे. गले लगाना चाहती हूँ उनको. उनके साथ शहर शहर भटकना चाहती हूँ. अब मुझे वो लोग अच्छे लगते हैं जिनकी जिंदगी किसी कहानी जैसी इंट्रेस्टिंग है. जो मुझे अपनी बातों में बाँध के रख सकते हैं. मुझे. जो मुझे चुप करा सकते हैं. जो मुझे हंसा और रुला सकते हैं. अब मुझे वे लोग अच्छे लगते हैं जो अलाव के इर्द गिर्द बैठे हुए मुझे अपनी जिंदगी के छोटे छोटे वाकये सुना सकते हैं कि सबकी जिंदगी एकदम अलग होती है. एकदम अलग. अब मेरे ख्वाबों के घर में किताबें ही नहीं बहुत सी रोड ट्रिप्स के फोटोग्राफ्स भी होते हैं. बहुत से अनजान सिंगर्स के कैसेट्स भी होते हैं. बहुत से महबूब लोगों के हाथों साइन की हुयी पर्चियां भी होती हैं. मैं जिन्दा हूँ. जिंदगी को सांस सांस खींचती हूँ अन्दर और लफ्ज़ लफ्ज़ बिखेरती हूँ बाहर. अब मैं हवाओं में चीखती हूँ उसका नाम कि मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हिचकियों से उसका जीना मुहाल हो जायेगा. 

देखा जाए तो इश्क़ बहुत कुछ सिखा देता है आपको बहुत बार. बस डूबने की दरकार होनी चाहिए. तबियत से. इश्क़ हर चीज़ से होना चाहिए. कर्ट कोबेन से. गुरुदत्त से. मंटो से. शहर के मौसम से. दिलरुबा दिल्ली से. रॉयल एनफील्ड बुलेट से. हर चीज़ से इश्क़ होना चाहिए...ये क्या कि छू के गुज़र गए. मुझे जब भी होता है इश्क़ मुझे उसकी हर बात से इश्क़ होता है. उसके शहर. उसकी किताबों. उसकी कविताओं. उसकी पुरानी प्रेमिकाओं. उसकी माँ के पसंदीदा हरे रंग की साड़ी...उसकी बीवी के कानों में अटके गुलाबी बूंदे...सबसे इश्क़ हो जाता है मुझे. इस डूबने में कितना कुछ नया मिलता है. मैं जानती हूँ उसे चाय पसंद है तो जिंदगी में पहली बार चाय पीती हूँ...वो जानता है कि मुझे ब्लैक कॉफ़ी पसंद है तो वो ब्लैक कॉफ़ी पीता है. अब जनाब चाय सिर्फ एक दूध, चीनी, चायपत्ती वाली चीज़ नहीं रह जाती...चाय उस अहसास को कहते हैं कि सिप मारते हुए उसके होठों का स्वाद आये. तीखी बिना चीनी वाली ब्लैक कॉफ़ी पीते हुए कोई सोचे कि लड़की इतनी मीठी और टेस्ट इतना कड़वा...खुदा तेरी कायनात अजीब है. इश्क हो तो उसके बालों की चांदी से कान से झुमके बनवा लेना चाहे लड़की तो कभी गूगल मैप पर ज़ूम इन करके थ्री डी व्यू में देखे कि उसके शहर की जिन गलियों से वो गुज़रता है वहां के मकान किस रंग के हैं. इश्क़ होता है तो हर बार नए बिम्ब मिलते हैं...क्रॉसफेड होता है वो हर लम्हा...घुलता है रूह में...शब्द में ...सांस में.

I am my eternal muse. मुझे muse के लिए दूसरा शब्द नहीं आता. मेरे लिए हर बार इश्क़ में पड़ना खुद को उस दूसरे की नज़र से देखना और फिर से अपने ही प्यार में पड़ना है. मैं पूरी तरह सेल्फ ओब्सेस्स्ड हूँ. मुझे खुद के सिवा कुछ नहीं सूझता. मैं तेज़ कार चलाती हूँ...DDLJ के गाने सुनती हूँ. इस उदास फीकी धूप वाले शहर पर अपने मुस्कुराहटों की धूप बुरकती हूँ. आते जाते लोगों से बेखबर. खुद को देखती हूँ आईने में तो खुद पे प्यार आता है. हंसती हूँ. पागलों की तरह. सांस लेती हूँ गहरी. इतनी गहरी कि उसके हिस्से की ऑक्सीजन कम पड़ जाए और वो छटपटा कर मुझे फोन करे...जानम...मेरी सांस अटक रही है. तुम हो न कहीं आसपास. मैं फिर खिलखिलाते हुए उसके शहर में उड़ाती हूँ अपना नीला दुपट्टा और कहती हूँ उससे...तुम्हारे शहर में हूँ जानम...आ के मिल लो. मैं बुनती हूँ सुनहरी कल्पनाएँ और सतरंगी ख्वाब. मैं इश्क़ को सियाही की तरह इस्तेमाल करती हूँ. खुद को पूरा डुबो कर लिखती हूँ जिंदगी के सफ़ेद कागज़ पर एक ही महबूब का नाम. दास्तान हर बार नयी. शहर नया. सिगरेट नयी. परफ्यूम नया. ड्रिंक नयी. मिजाज़ नया. 

इश्क़. एक आदत है. बुरी आदत. मगर मेरा खुदा आसमान में नहीं, नीचे जहन्नुम में रहता है. मेरे गुनाहों की इबादत को क़ुबूल करता है. मैं जब भी इश्क़ में जान देने को उतारू हो जाती हूँ वो खुद आता है मुझे बांहों में थामने...सांस रुक जाने तक चूमता है और कहता है 'पुनः पुनर्नवा भवति:'. 

***

PS: मैं हर बार इश्वर से शुरू होकर शैतान तक कैसे पहुँच जाती हूँ मुझे नहीं मालूम. शायद मुझे दोनों से इश्क़ है.

20 January, 2015

टूट जाने का हासिल होना भी क्या था...

उसका सारा बदन बना है शीशे का
काँच के होठ, काँच बाँहें 
उससे बेहद सम्हल के मिलती हूँ
फिर भी चुभ ही जाता है 
माथे पर कोई आवारा बोसा

कभी काँधे पे टूट जाती हैं 
उसकी नश्तर निगाहें 
और उंगलियों में फँसी रह जाती हैं 
उसकी काँच उंगलियाँ
फिर कितने दिन नहीं लिख पाती कोई भी कविता

उसके कमरे में सब कुछ है काँच का
वो उगाता है काँच के फूल
जिन्हें बालों में गूँथती हूँ
तो ख्वाब किरिच किरिच हो जाते हैं

ये जानते हुये कि एक दिन
मुझसे टूट जायेगा उसका काँच दिल
मैं करती हूँ उससे टूट कर प्यार
धीरे धीरे होने लगा है
मेरा दिल भी काँच का।

शायद हम दोनों के नसीब में
साथ टूटना लिखा हो।

18 January, 2015

जिंदगी एक टर्मिनल इलनेस है मेरी जान

वो एक कलपा हुआ बच्चा है जिसकी माँ उसे छोड़ कर कुछ देर के लिए पड़ोसी के यहाँ गयी है शायद...दौड़ते हुए आया है...चूड़ी की आहट हुयी है या कि गंध उड़ी है कोई कि बच्चे को लगता है कि मम्मी लौट आई वापस...जहाँ है वहां से दौड़ा है जोर से...डगमग क़दमों से मगर रफ़्तार बहुत तेज़ है...सोफा के पाए में पैर फंसा है और भटाक से गिरा है...मोजैक के फर्श पर इस ठंढ में माथा में चोट लगा है जोर से...वो चीखा है...इतनी जोर से चीखा है जितनी जोर से चीखने में उसको यकीन है कि मम्मी जहाँ भी है सब छोड़ कर दौड़ी आएगी और गोदी में उठा लेगी...माथा रगड़ेगी अपनी हथेली से...उस गर्मी और माँ के आँचल की गंध में घुलमिल कर दर्द कम लगने लगेगा. लेकिन मम्मी अभी तक आई नहीं है. उसको लगता है कि अभी देर है आने में. वो रोने के लिए सारा आँसू रोक के रखता है कि जब मम्मी आएगी तो रोयेगा. 

मैं उसकी अबडब आँखें देखती हूँ. ये भी जानती हूँ कि दिदिया का जिद्दी बेटा है. मेरे पास नहीं रोयेगा. उसी के पास रोयेगा. मैं फिर भी पास जा के देखना चाहती हूँ कि माथे पे ज्यादा चोट तो नहीं आई...अगर आई होगी तो बर्फ लगाना होगा. एक मिनट के लिए ध्यान हटा था. इसको इतना जोर से भागने का क्या जरूरत था...थोड़ा धीरे नहीं चल सकता. इतनी गो का है लेकिन एकदम्मे बदमाश है. दिदिया आएगी तो दिखा दिखा के रोयेगा...सब रोक के बैठा है. एक ठो आँसू नहीं बर्बाद किया हम पर. जानता है कि मौसी जरा सा पुचकार के चुप करा देगी...देर तक छाती से सटा कर पूरे घर में झुला झुला देने का काम नहीं करेगी...मौसी सोफा को डांटेगी नहीं कि बाबू को काहे मारा रे. मौसी का डांट से सोफा को कोई फर्क भी नहीं पड़ेगा. मौसी तो अभी खुद बच्ची है. उसका डांट तो दूध-भात हो जाता है. मौसी का डांट तो हम भी नहीं सुनते. मम्मी का डांट में असर होता है. मम्मी डांटते हुए कितनी सुन्दर लगती है. दीदी से जब गुलमोहर का छड़ी तुड़वाती है तब भी. 

तुमको पढ़े.
मन किया कि दुपट्टा का फुक्का बना के उसमें खूब सारा मुंह से गर्म हवा मारें और तुम्हारे सर पर जो चोट लगी है उसमें फुक्का दें...देर तक रगड़ें कि दर्द चला जाए. लेकिन ये मेरा हक नहीं है. तुमको पढ़े और देर देर तक अन्दर ही अन्दर कलप कलप के रोना चाहे. लेकिन हमको भी चुप कराने के लिए मम्मी का दरकार है. वो आएगी नहीं. 

हमको क्या बांधता है जानते हो? दुःख. ये जो बहुत सारा दुःख जो हम अपने अन्दर किसी बक्से में तरी लगा लगा के जमाते जाते है वो दुःख. मालूम है न हीरा कैसे बनता है? बहुत ज्यादा प्रेशर में. पूरी धरती के प्रेशर में. और फिर कभी कभी लगता है तुमको धुनाई की जरूरत है बस. तुम पुरानी रजाई की तरह होते जा रहे हो. तुम्हारे सारे टाँके खोल के...ऊपर की सारी परतें हटा कर सारी रुई धुन दी जाए...तुम्हारी रूह बाकी लोगों से अलग है...उसको कुटाई चाहिए होता है. मगर तुम्हारी रूह को मेरे सिवा और कोई छू भी तो नहीं सकता है. इतनी तबियत से बदन का पैराहन उतारना सबको कहाँ आता है. सब तुम्हारे जिस्म के कटावों में उलझ जायेंगे...ये डॉक्टर की तरह सर्जरी का मामला है...बदन की खूबसूरती से ऊपर उठ कर अन्दर लगे हुए कैंसर को देखना होता है.

हम तुमसे कभी नहीं मिलेंगे. तुम्हारे बदन पर पड़े नील के निशान अब लोगों को मॉडर्न आर्ट जैसे लगने लगे हैं. जल्दी ही तुम्हारा तमाशा बना कर तुम पर टिकट लगा देंगे लोग. हम तब भी तुमसे नहीं मिलेंगे. दिल्ली में बहार लौटेगी. गुलाबों के बाग़ देखने लोग दूर दराज से आयेंगे और उनकी खुशबू अपने साथ बाँध ले जायेंगे. मैं कभी तुम्हारे किचन में तुम्हारे लिए हल्दी-चूना का लेप बनाने का सोचूंगी. मैं तुम्हारे ज़ख्मों को साफ़ करने के लिए स्कल्पेल और डिटोल लिए आउंगी. तुम्हें जाने कौन सी शर्म आएगी मुझसे. मेरे सामने तुम कपड़े उतारने से इनकार कर दोगे...बंद कमरे में चीखोगे...नर्स. नर्स. सिस्टर प्लीज इनको बाहर ले जाइए. मैं फफक फफक के रोउंगी. तुम हंसोगे. 'तुमको हमसे प्यार हो रहा है'. 

इस दर्द में. इस टर्मिनल इलनेस में तुम्हारा माथा ख़राब हो गया है या कि इश्क हो गया है तुमको. जिंदगी एक टर्मिनल इलनेस है मेरी जान. हम सब एक न एक दिन मर जायेंगे. मैं तुम्हारे कमरे के दरवाजे के आगे बैठी हूँ...तुम्हें जिलाने को एक ही महामृत्युंजय मन्त्र बुदबुदा रही हूँ 'आई लव यू...आई लव यू...आई लव यू'. तुम कोमा से थोड़ी देर को बाहर आते हो. डॉक्टर्स ने मोर्फिन पम्प कर रखी है. कहते हैं शायद तुम दर्द में नहीं हो. मैं तुम्हारी रूह में थर्मामीटर लगाना क्यूँ जानती हूँ? तुम मरणासन्न अपने बेड पर रोते हो. मैं तुम्हारे कमरे के बंद दरवाज़े के आगे. तुम पूछते हो मुझसे. 'बताओ अगर जो मैं मर गया तो?'. 

मेरी दुनिया बर्बाद होती है...अक्षर अक्षर अक्षर...मुझे कहने में जरा भी हिचक नहीं होती. 'तुम अगर मर गए, तो हम लिखना छोड़ देंगे'. 

पुनःश्च
'हम' लिखना छोड़ देंगे...अलग रहे हैं क्या मैं और तुम? मेरे लिखे में कब नहीं रहे हो तुम...या कि मेरे जीने में ही.
सुनो. हमको इन तीन शब्दों के मायने नहीं पता...लेकिन तुमसे कहना चाहते हैं.
आई लव यू.

15 January, 2015

तुम्हारी जुबां पे चाय है, हमारी जुबां पे इश्क़


लोगों के सीखने का तरीका अलग अलग होता है. कुछ लोग किताबों से सीखते हैं...कुछ फिल्मों से तो कुछ अपनी तरह का रिसर्च करते हैं. मैं सोचती हूँ कि मैं क्या क्या कैसे कैसे सीखती हूँ...तो अब तक देखा है कि जिंदगी में इश्क से बहुत कुछ सीखा जा सकता है. हर बार जब इस मुसीबत से सामना होता है तो जिंदगी अलग रंग में नज़र आती है. सब कुछ बदल जाता है...सिगरेट की ब्रैंड...पसंद की ड्रिंक...पसंद का परफ्यूम...इश्क हमें हर कुछ दिन में पुनर्नवा कर देता है. हम कोई और ही हो जाते हैं...और अक्सर पहले से न्यू इम्प्रूव्ड वर्शन ही बनते हैं.

इश्क में होने पर महबूब की सारी चीज़ें अच्छी लगती हैं...तो हम धीरे धीरे सब जानना शुरू करते हैं...उसका परिवेश...उसके शौक़...उसकी पसंद की ड्रिंक्स...चाय कैसी पसंद है उसे...आलम यहाँ तक हुआ है कि मुहब्बत में हमने चाय तक पीनी शुरू की है...बतलाइये, लोग देवदास को गाली देते हैं कि दारू पी के मर गया...हमारे लिए चाय दारू से ज्यादा बड़ी चीज़ थी. कसम से. बचपन से लेकर अब तक, जिंदगी में सिर्फ तीन कप चाय पिए थे. पहली बार कॉलेज के सेकंड इयर में एजुकेशनल ट्रिप पर गए थे...वहां सब को चाय सर्व की गयी, तो बोला गया कि न पीना बदतमीजी होगी. तो बड़ी मुश्किल से आधा कप गटके. वो था जिंदगी का पहला चाय का कप. दूसरी बार दिल्ली में एक दोस्त ने जिद करके पिलाई थी...सर्दियों के कमबख्त से दिन थे खांसी हो रखी थी...गला दर्द. उसने कहा अदरक डाल के चाय बना रही हूँ, चुप चाप पी...मेरे हाथ की चाय को कोई मना नहीं करता. तीसरी बार एक्स-बॉयफ्रेंड ने पिलाई थी. ब्रेक ऑफ के कई सालों बाद मिला था. उसकी जिद थी, मेरे हाथ की चाय पियो...बहुत अच्छी बनाता हूँ. उसके सामने जिद करने का मन नहीं किया. याद कर रही हूँ तो जाने क्यूँ लग रहा है कि इतना रोना आ रहा था कि चाय नमकीन लगने लगी थी. आखिरी बार मिल भी तो रही थी उससे. 

मुझे भी क्या क्या न जानना होता है उसके बारे में. तुम्हें चाय कैसी पसंद है? 'कड़क...बहुत कड़क'. मैं कहीं याद में घूमती भटकती इस शब्द के साथ कुछ तलाशने की कोशिश करती. कुछ हाथ नहीं आता. क्या कमज़र्फ शय है ये मुहब्बत भी कसम से. जिस चीज़ को कभी कॉलेज में हाथ नहीं लगाया...पीयर प्रेशर के सामने नहीं झुके...सो उसने बस बताया कि उसे चाय बहुत पसंद है और हम हो गए चाय के मुरीद. कॉफ़ी से पाला बदल लिया. 

चाय की पहली याद है दार्जलिंग की...चाय बागानों में जाने के लिए एक रोपवे होता है...उस छोटे से झूलते केबिन में खिड़कियाँ थीं...बीच में यूँ लग रहा था जैसे स्वर्ग में आ गए हों...चारों तरफ बादल ही बादल...नीचे ऊपर...सब ओर. बहुत बहुत दूर तक चाय के बगान...चाय के प्लांट्स में सूखती चाय की पत्तियां...चाय बनाने का पूरा प्रोसेस...वो तीखी मीठी गंध याद रही थी बहुत दिन तक. घर पर लोगों को मेरे हाथ की चाय बहुत पसंद थी. फरमाइशी चाय हुआ करती थी हमारी...कभी अदरक, कभी इलायची, कभी दालचीनी...जो मूड में आया वो डाल दिए. खुशबू से जानते थे कि चाय बनी है कि नहीं. मालूम, अपने हाथ की चाय खुद कभी नहीं टेस्ट किये हैं. आज तक भी. 

फिर सोच ही रही थी कि चाय के साथ ऐसा सौतेला व्यवहार ठीक नहीं. एक तो साउथ इंडिया में रहने के कारण सब जगह कॉफ़ी मिल जाता है तो कौन मगजमारी करे. लेकिन जाने क्यूँ उसने चाय के लिए कुछ तो ऐसा कहा था कि कलेजा जल मरा था. चाय न हुयी, सौत हो गयी. चख के देखना है स्वाद कैसा है उसका. समन्दरों वाला एक शहर था...बहुत तेज़ भागता...बहुत तेज़. उसके नमक से होटों पर जलन होती थी. मैं समंदर किनारे टहलते हुए पहाड़ों के बारे में सोच रही थी कि हम जहाँ होते हैं वहां के अलावा कहीं भी और होना चाहते हैं. जैसे मैं अभी सिर्फ उसके पास होना चाहती हूँ. मेरा न प्रोजेक्ट में मन लगेगा न किसी चिट-चैट में. सोचा थोड़ा टहल लूं...मन बहल जाएगा. वहां साइकिल पर चाय बेचता एक छोटा सा लड़का था 'दीदी चाय पियोगी?' मैं इस इसरार पर तुम्हें भी भूल गयी. फिर जाने कितनी कप चाय पी और उस छोटू के कितने किस्से सुने. वापस होटल आई तो चाय की तलब लग रही थी. तलब तुम्हारी भी लग रही थी. चाय आर्डर की और बेड पर पड़ गयी...टीवी पर मेरा पसंदीदा एनरिके का गाना आ रहा था 'आई कुड बी योर हीरो बेबी...आई कुड किस अवे द पेन'

तब से बस, ओकेज्नली पी लेते हैं चाय. ओकेजन बोले तो तुम्हारी याद तुम्हारे इश्क से ज्यादा हो जाए वैसा ओकेजन.

'व्हाट?...तुमने चाय पीनी छोड़ दी है...कि मैं नहीं पीती इस लिए...ब्लडी इडियट...डैम इट...इश्क़ साला फिर से हमसे बाज़ी मार ले गया!'

14 January, 2015

एक रोज़ वो खरीद लाता मेरे लिए गुलाबी चूड़ियाँ

उससे बात करते हुए उगने लगता है एक नया शहर
जिसमें हम दोनों के शहरों से उठ कर आये कुछ रस्ते हैं
कुछ गलियां, कुछ पगडंडियां और कुछ पुराने बाज़ार भी

उसके शहर का डाकिया मुझसे पूछता है उसकी गली का पता
मेरे मोहल्ले के मोड़ पर शिफ्ट हो जाता है उसकी सिगरेट का खोमचा
फेरीवाला उसके यहाँ से खरीदता है पुराना कबाड़
और मुझे बेच देता है उसकी लिखी सारी डायरियां
मैं देर देर रात भटकती रहती हूँ बैंगलोर में
यहाँ गंध आती है उसके गाँव की
उसके लड़कपन की...
उसके आवारागर्दी के किस्सों की

हम दोनों निकाल लाते हैं अपनी अपनी स्ट्रीट कैट
और उसके काले हैंडल पर फ़िदा होते हैं एक साथ ही
मुझे यकीन नहीं होता कि हमारे पास हुआ करती थी एक ही साइकिल
सुबहों पर मेरा नाम लिखा होता था, शामों पर उसका
हम किसी दोपहर उसी एक साईकिल पर बैठ कर निकल जाते किसी भुट्टे के खेत में

मैं उसे सिखाती गुलेल से निशाना लगाना
और वो मुझे तोड़ के देता मोहन अंकल के बगान से कच्चा टिकोरा
मैं हाफ पैंट की जेब में रखती नमक के ढेले
हम लौट कर आते तो पीते एक ही घैला से निकाला ठंढा पानी

उसे बार बार लगता मैं मैथ के एक्जाम में फेल हो जाउंगी
मुझे लगता वो सारे एक्जाम में फेल हो जाएगा
जब कि हम क्लास में फर्स्ट और सेकंड आते, बारी बारी से

एक रोज़ वो खरीद लाता मेरे लिए गुलाबी चूड़ियाँ
मैं अपने दुपट्टे से पोछ देती उसके माथे पर बहता पसीना
वो मुझे वसंत पंचमी के दिन एक गाल पर लगा देता लाल अबीर
मैं इतने में हो जाती पूरी की पूरी उसकी

मगर फिर ख़त्म हो जाते उसकी डायरी के पन्ने
और मुझे लिखनी होती एक पूरी किताब
सिर्फ इसलिए कि उसके नाम से रच सकूं एक किरदार
और कह सकूं दुनिया से 'कहानी के सारे पात्र काल्पनिक हैं'

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