20 February, 2015

उन्निस फरवरी सन् दो हजार पंद्रह। दिल्ली।

जिंदगी की अपनी हैरतें हैं. आड़ी तिरछी गलियों से गुज़रती हुयी लड़की अक्सर सोचती कि इन मकानों में कैसे लोग रहते होंगे. इन जाली लगी खिड़कियों के पीछे वो कौन सा खजाना छुपा रहता होगा कि दिन भर खोजी आँखें रखने वाली बूढ़ी औरतें इन खिड़कियों से सटे हुए बरामदों में ताक झाँक करती रहती हैं. वहां की बालकनियों में दम घुटता था. लड़की अब इन सब से दूर खुली हवा वाले अपने शहर तक लौट जाना चाहती थी. 

उसे कहीं जाना न था. न किसी शहर. न किसी की बांहों में. फिर भी जब वो पास होता तो एक शहर उगने लगता उसकी आँखों में. इस शहर का तिलिस्म सब लड़की के दिल में था. लड़की की कल्पनाओं में बड़े चमकीले रंग थे. बड़े सुहाने लोग. यहाँ इंतज़ार सी रातें नहीं थीं. सब चाहना पर मिल जाने वाला हुआ करता था. इस शहर में कभी बिछड़ना नहीं होता था. मगर ये शहर दुनिया को रास नहीं आता था. जब भी वे इस शहर की निशानियाँ पाते, वहां दंगा करवा देने की साजिशें बुनते. सटे हुए मकानों में चुपके चुपके बनाये हुए घरेलू बम फेंका करते. सिर्फ जरा से केरोसीन और कुछ और तत्वों को मिला कर एक शीशे की बोतल में डाल देना होता था बस. ये वो बोतलें हुआ करती थीं जिनमें आला दर्जे की शराब रखी होती थी. लड़की की ख्वाहिशों में इन खाली बोतलों में लिखने को चिट्ठियां थीं. दंगे में लगी आग में सारी चिट्ठियों के पते जल गए थे. आग बुझाने के लिए नदी से पानी लाना पड़ता था मगर नदी का सारा पानी लड़की की आँखों ने सोख लिया था. यूँ आग तो रेत से भी मिट जाती मगर उसमें बहुत वक़्त लग जाता. लड़की ने किताब बंद की और शहर को हमेशा के लिए भुला दिया. 

मगर जिंदगी. घेर कर मारने की साजिशें रचती है. इक रोज़ इक सादा सी दिखने वाली किताब में उस शहर का दरवाजा खुल गया. लड़की बेख्याली में चल रही थी उसने ठीक ठीक देखा नहीं कि वो किस शहर में दाखिल हो रही है. यूँ भी ख़त्म तो कुछ भी कभी भी नहीं होता. अब शहर में कुछ नहीं बचा था. लेकिन फिर भी धुआं बदस्तूर उठ रहा था. फूलों की क्यारियों में किसी के जले हुए दिल की गंध उग रही थी. चाह से आ जाने वाले लोगों के पैर काट दिए गए थे और वे घिसट रहे थे. राहों में चीखें थीं मगर हवा में बिखरती हुयी नहीं हेडफोन से सीधे कान और दिल में उतरती हुयी. लड़की के इर्द गिर्द शोर एकदम नहीं था इसलिए उसे साफ़ सुनाई पड़ता था जब वो देर रात के नशे में उसका नाम पुकारता. लड़की उसके लिखे हर शब्द, हर वाक्य, हर किरदार को तोड़ कर अपना नाम ढूंढती और जब उसे नहीं मिलता कोई भी दिलासा तो वो कान से हेड फोन निकाल देती और बहुत तेज़ तेज़ स्केटिंग करती. रोलर ब्लेड्स वाले स्केट्स काले रंग के हुआ करते और खुदा के सिवा किसी को दिखाई नहीं पड़ता कि वो क्या कर रही है. खुदा के क्लोज्ड सर्किट कैमरा में हाई ऐंगिल शॉट में दिखता कि वो फिर से उसका नाम लिख रही है...नृत्य की हर थाप में...तेज़ और तेज़ गुज़रते हुए शहर के मलबे को विभक्त करती लड़की खुद नहीं जानती थी कि उसे क्या चाहिए. 

उसके सिरहाने सूखे गुलाबों की किरमिच किरमिच गंध थी जो पीले रंग के इत्र में डूबे हुए थे. लड़की का दिल मगर खाली था कि उसे सारे दोस्त उसे ठुकरा के चले गए थे इश्क वाले किसी शहर. वो रोना चाहती थी बहुत तेज़ तेज़ मगर उसे अकेले रोने से डर लगता था. 

वो उसे सिर्फ एक बार देखना चाहती थी. मगर खुदा के स्पाईकैम से दूर...वो ये भी चाहती थी कि उससे मिलना कुछ ऐसे हो कि वो खुदा को उलाहना दे सके कि ये मुलाकात तुमने नहीं मैंने खुद लिखी है. लड़की जब भी क्वाइन टॉस करती तो हमेशा हेड्स चुनती कि हेड्स पर लिखा होता 'सत्यमेव जयते'. उसे लगा जिंदगी मे न सही कमसे कम किस्मत में तो सच की जीत हो. तो उसने कहा हेड्स और सिक्के को उछाल दिया. सिक्का गिरा तो उसपर १ लिखा हुआ था और थम्स अप का निशान था. लड़की ने भी ऊपर वाले को ठेंगा दिखाया और उससे मिलने चली गयी. 

तकलीफों को गले लगाने वाले लोग होते हैं. बेचैनियों से इश्क करने वाले भी. घबराहट में डूबे. साँस साँस अटकते. किसी शहर के इश्क में पागल होते. उनकी आँखों में सियाह मौसम रहते हैं. बस उनकी हँसी बड़ी बेपरवाह होती है. वे दिन भर खुद को बाँट देते हैं पूरे शहर शहर...घर लौटते हुए रीत जाते हैं. फिर उनकी सुनसान रातों में ऐसा ही संगीत होता है कि खुद को जान देने से बचा लेना हर दिन का अचीवमेंट होता है. 

लड़की सुबह के नीम अँधेरे में बहुत फूट फूट कर रोना चाहती है कि उसे डर लगता है. सियाह अँधेरे से. खालीपन से. इश्क से. नीम बेहोशी से. उसके नाम से. उसकी आँखों से. उसके हाथों से. उसके काँधे में गुमसी हुयी खुशबू से. उसकी जेब में अटकी रह आई आपनी साँसों से. उसकी बांहों में रहते हुए कहे झूठमूठ के आई लव यू से. सियाह रंग से. उससे मिलने से. अलविदा कहने से. डरती है वो. बहुत. बहुत. बहुत. न तो खुदा न शैतान ही उसे अपनी बांहों में भर कर कहता है कि सब ठीक हो जाएगा. 

हम जी कहीं भी सकते हैं मगर हम कहाँ जिन्दा रहते हैं वो शहर हमें खुद चुनना पड़ता है और जब ये शहर मौजूद नहीं होता तो इस शहर को हमें खुद बनाना पड़ता है. कतरा कतरा जोड़ कर मकान. नदी. समंदर. लोग. दोस्तियाँ. मुहब्बत. मयखाने. जाम. बारिश. सब.

जब ये सब बन जाता है और वो शहर हमारे लिए परफेक्ट हो जाता है. तब हम किसी अजनबी शहर में जा कर आत्महत्या करना चाहते हैं. 

उसने मेरी आँखों में देख कर कहा मुझसे. ही नेवर लव्ड मी. मुझे उसके सच कहने की अदा पर उससे फिर से प्यार हो आया.
 
शहर खतरनाक था. उस तक लौट कर जाना भी. बुरी आदतों की तरह. सिगरेट का कश उसने अन्दर खींचा तो रूह का कतरा कतरा सुलग उठा. लड़की तड़प उठी. तकलीफों की आदत ख़त्म हो गयी थी पिछले कई सालों में. 

जाते हुए लड़की ने शहर के दरवाजे पर पासवर्ड लगा दिया और खुद को भरोसा दिलाया कि पासवर्ड भूल जायेगी. नाइंटीन फेब्रुअरी टू थाउजेंड फिफ्टीन. 

उसने खुद को कहीं भुला देना चाहा. कई सारे नक्शों को फाड़ देने के बाद उसे याद आया कि सब बेमानी है कि उसे उसका फोन नंबर याद था. 

उसका सुसाइड नोट उसके स्वभाव से एकदम इतर था. छोटा सा. सिर्फ एक लाइन का.  'तुम कोई अपराध बोध मत पालना. मैंने तुम्हें सिर्फ अपने लिए चाहा था'. 

12 February, 2015

किसकी हँसी का अबरख है...मेरी शामों को चमकाता हुआ


उसकी ख़ुशी लोगों की आँखों में चुभती थी जैसे जेठ की धूप. वे उमस और पसीने से भरे दिन थे कि जिसे मेहनतकश लोग अपने अपने वातानुकूलित दफ्तरों में बैठ कर बड़ी मुश्किल काटा करते थे. वे बॉस के डांट खा कर खिसियाये हुए घर लौटने के दिन थे. उन दिनों उनकी महँगी कारों में धूप से बचने के लिए परदे नहीं लगे थे. उसपर वो लड़की की चौंधियाने वाली हंसी जैसे हाई बीम पर हाइवे में आती गाड़ी...आँखें बंद बंद हुयी जाती थीं कि नहीं देखा जाता था इस तरह किसी का सुख.

उसमें शर्म नाम की कोई चीज़ नहीं थी...उसे बचपन में नहीं सिखाया गया था कि लड़कियों को ठहाके नहीं मारने चाहिए. बचपन में उसे ये भी नहीं बताया गया था कि दिलों से खेलना एक बुरा खेल है. इस खेल के खतरनाक खतरे हैं. वो बेपरवाह थी. अल्हड़ और बेलौस. छत पर बैठ जाती हाथों में आइना लिए और गली से जाते सारे लड़कों की आँखों में चौंधती रहती धूप. ऐसे ही में एक दिन वो लड़का मोड़ पर तेज़ रफ़्तार बाईक उड़ाता आ रहा था कि टर्न पर जैसे ही बाईक घूमी कि धूप के टुकड़े से उसकी आंखें बंद हो गयीं...तीखे मुड़ कर बाइक गिरी और स्किड करती हुयी ठीक उसके घर के दरवाजे पर जा टकराई. शोर बहुत ज्यादा था मगर लड़की का ठहाका इस सब के बावजूद सबके कानों में चुभ रहा था. वे उसके हँसते चेहरे पर एसिड फ़ेंक देना चाहते थे कि लड़की के जिंदगी के इसी हिस्से पर उनकी पकड़ थी...उसका शरीर...उसकी रूह तक वे पहुँचने की सोच भी नहीं सकते थे. मोहल्ले के लड़के उसे घेर कर रगेद देने के दुस्वप्नों में जीते थे. मोहल्ले के अधेड़ उसे किसी अँधेरे कोने में फुसला कर घर ले आने के बहकावे में. बची मोहल्ले की औरतें. वे बस चाहती थीं कि जल्दी से किसी ऊपर से रईस दिखने वाले घर में इसका ब्याह हो जाए, मगर असल में उसका ससुराल इतना गरीब हो कि उससे बर्तन मंजवाये जायें, चादरें धुलवाई जायें और सुबह शाम कमसे कम सौ रोटियां गिन कर बनवाई जायें. फिर वे उसके मायके की हमदर्द बन कर उसे संदेसा भेजें..क्या हुआ पारो अब तुम्हारी हंसी नहीं गूंजती. सारी औरतें मन्नत मांगें कि ससुराल वाले उसे आग लगा कर मार डालें ताकि उसके पति की दूसरी शादी में भर भर प्लेट खाना खाते हुए वे उस मरी हुयी को कुलच्छनी और बाँझ कहते हुए अपने कलेजे की आग को ठंढा कर सकें. किसी की बेख़ौफ़ हंसी में बहुत धाह होती है. उससे पड़े हुए छाले ऐसे ही फ्री की शादी की पार्टी में खाए अनगिनत आइसक्रीम के कप्स से ठंढक पाते हैं.

गड़बड़ ये थी कि उसके पूरे मोहल्ले में किसी ने पिछले कई सारे जन्मों तक कोई पुण्य नहीं किया था कि उनके ऐसे भाग खुलते. ऐसे लड़की तो जिस मिट्टी में पैदा होती है वहाँ अगले पच्चीस सालों तक कुछ ढंग का नहीं उगता. खलिहानों में पाला पड़ जाता है. उसके लड़कपन तक पहुँचते पहुँचते गाँव मोहल्ले के लड़के उसके इश्क में पागल हो कर एक दूसरे को मार काट डालते हैं मगर उसकी हँसी तक लहू का एक कतरा भी नहीं पहुँचता. दुखियारी माएँ उसे सरापते सरापते उम्र से पहले बुड्ढी खूसट हो जाती हैं.

वो कोरी सड़कों पर अपनी हंसी बिखेरती चलती. उसके अल्हड़पने पर सिर्फ सड़क और पेड़ों को प्यार आता. आता जाता हर कोई उसे कौतुहल से देखता था. उदास चेहरों वाली इस दुनिया में इस तरह बेवजह खिलखिलाने वाले लोगों को पागल कहा जाता था. सब उसके चेहरे पर से ये हँसी मटियामेट कर देना चाहते थे. मगर उसकी हँसी में धाह थी इसलिए सब डरते थे उससे. लड़की अपनी ही दुनिया में रहती. न किसी की सुनती...न कुछ देखती जिससे तकलीफ हो. शाम के रंग चुनती और टांक लेती दुपट्टे में उसके नाम का शीशा कोई...देखती चाँद को और भेजती फ्लाइंग किस...छत पर खड़े लड़के खुद को चाँद समझते. अमावस की रात को कोसते. उसकी हँसी की चांदनी में भीगते हुए भी वे उसकी हँसी छीन कर अपने होठों पर चिपका लेना चाहते थे...किसी तस्वीर में धर देना चाहते थे...किसी रेडियो के ऐड में बजा देना चाहते थे. उसकी हँसी कहीं और होनी चाहिए थी. उसके होटों पर नहीं. कोई इतना सारा बेवजह हंसता है भला.

तो क्या हुआ अगर उसे मुहब्बत हुयी थी. तो क्या हुआ अगर महबूब की आवाज़ सुन कर उसे गुदगुदी होती थी. बात बस इतनी ही तो नहीं थी. वो क्यूँ छलकी छलकी पड़ती थी. वो क्यूँ खुद को बिखेरती चलती थी. वो सिमट कर क्यूँ नहीं रहती थी? आखिर उसका दुपट्टा किसी बाजारू औरत की आबरू तो नहीं था कि कोई भी हाथ दे...फिर वो राह चलते दुपट्टा क्यूँ लहराती थी...बाकी लड़कियों की तरह कानी ऊँगली में एक कोना लपेट कर जमीन की ओर ताकती हुयी...करीने से दुपट्टे को सीने के इर्द गिर्द कस कर लपेटे हुए क्यूँ नहीं चलती थी. गले में इतनी बेपरवाही से डालते हैं दुपट्टा? उसपर उसकी हंसी का अबरख...किरमिच किरमिच आँखों में चुभता था. उसके उड़ते दुपट्टे से जरा जरा गिरती अबरख और सड़क दुल्हन की चूनर जैसी चमकती. आँखें तरेरती हर लड़के को उसे यूँ देखता जाता था जैसे आँखें कान हो गयी हों और उसकी हंसी को रिकोर्ड कर लेंगी. बार बार प्ले कर के घिस देने के लिए.

आइना उसे बार बार समझाता. इतना हँसना अच्छी बात नहीं है. मान लो हँसना ही है तो अकेले में हँस लो. ऐसे सबके सामने हँसोगी तो नज़र लग जायेगी सबकी. चुपचाप एक कोने में बैठो और जितना जी करे ठहाके लगाओ. यूँ हँसने का वक़्त तय करो. नियत समय पर हँसो. चूरन की तरह दो चम्मच सुबह, दो चम्मच शाम. जिंदगी में बस गिन के मिलती हैं मुस्कुराहटें. तुम जो इतनी हंसती हो, लोगों को लगता है तुम उनके हिस्से की हँसी चुरा कर हँस रही हो. तुम्हें वे जेल में डाल देंगे. ज़माने से डरो री लड़की. 

पहले सारी लड़कियां ऐसी ही हुआ करती थीं...बेपरवाह....खुल कर हंसने वालीं...फिर उनकी जिंदगी में इश्क दाखिल होता था...बड़े हौले से...नन्हे नन्हे कदम बढ़ाता...और बस, लड़कियां हँसना छोड़ कर इंतज़ार करना शुरू कर देतीं...उनकी हंसी खुद के लिए न होकर सिर्फ उस एक महबूब के लिए होने लगतीं...वे अपनी हँसी से ज्यादा उसकी आँखों का ख्वाब बनना चाहतीं. फिर आँखों का ख्वाब कब बरसातों में घुलने लगता कोई नहीं जानता. और दुनिया की नज़र तो होती ही इतनी बुरी है कि चुभनी ही थी एक न एक रोज़.

बस तब से चुप है लड़की...अब नियम से हंसती है. एक छटांक सुबह. एक छटांक शाम. शहर. मोहल्ले. के लोग चैन से सोते हैं. मगर बूढी औरतों के सीने में उसकी चुप्पी चुभती है और वे रात रात उसकी हँसी वापस लौट आने की दुआएँ मांगती हैं. 

आमीन.

02 February, 2015

जंग लगी हुयी कलम से तो धमनी भी नहीं काटी जा सकती...



सुनो कवि,

अकेले में तुम्हें समझाते समझाते थक गयी हूँ इसलिए ये खुला ख़त लिख रही हूँ तुम्हें. तुम ऐसे थेत्थर हो कि तुमपर न लाड़ का असर होता है न गाली का. कितना उपाय किये. हर तरह से समझाए. पूरा पूरा शाम तुम्हारे ही लिखे से गुजरते रहे...तुम्हें ही दिखाने के लिए कि देखो...तुम ही देखो. एक ज़माने में तुम ही ऐसा लिखा करते थे. ये तुम्हारे ही शब्द हैं. लिखने वाले लोग कभी किसी का लिखा पढ़ कर 'बहुत अच्छा' जैसा बेसिरपैर का जुमला नहीं फेंकते. अच्छा को डिफाइन करना हमारा फ़र्ज़ है कि हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा. 

तो सुनो. मैं तुमसे लिखने क्यूँ कहती हूँ. किसी छोटे शहर से आकर बड़े शहर में बसे हम विस्थापितों का समय है ये. हमारे समय की कहानियां या तो चकाचौंध में दबा दी जा रही हैं या मन के राग, द्वेष और कुंठा से निकली गालियों में छुपा दी जा रही हैं. हमारे समयकाल का दस्तावेज लिखने के लिए दो चीज़ें बेहद आवश्यक हैं...एक तो वो नज़र कि बारीकी से चीज़ों को देख सके...बिना उद्वेलित हुए उनकी जांच पड़ताल कर सके. गहराई में चीज़ों को समझे न कि सिर्फ ऊपर ऊपर की कहानी बयान करे. दूसरी जो चीज़ जरूरी है वो है इस मुश्किल समय को लिखने का हुनर. तलवार की धार पर चलना ऐसे कि चीज़ों की तस्वीर भी रहे मगर ऐसे ऐंगिल से चीज़ें दिखें भी और रोचक भी हों. कि समझो डौक्यूमेंटरी बनानी है. सीधे सीधे रिपोर्ट नहीं लिखना है दोस्त, फीचर लिखना है. तुम तो जानते हो रिपोर्ट अख़बार में छपती है और अगले दिन फ़ेंक दी जाती है. फीचर की उम्र लम्बी होती है. अभी तुमपर ज्यादा दबाव डालूंगी तो तुम मेरी चिट्ठी भी नहीं पढ़ोगे इसलिए धीमे धीमे कहेंगे कि फिर लिखना शुरू करो. रेगुलर लिखना शुरू करो. इस बात को समझो कि निरंतर बेहतरीन लिखना जरूरी नहीं है. ख़राब लिखने से उपजने वाले गिल्ट से खुद को मुक्त करो. तुम पाओगे कि जब तुममें अपराधबोध नहीं होता या यूं कहूं कि अपराधबोध का डर नहीं होता तो तुम खुद से बेहतरीन लिखते हो. 

राइटर्स ब्लॉक से हर लेखक का सामना होता है. तुम भी गुज़र रहे हो इसको मैं समझ सकती हूँ. मगर इस ठहरे हुए समय के दरमयान भी लिखने की जरूरत है. मान लो ओरिजिनल नहीं लिख पा रहे तो लिखने की आदत बरक़रार रखने के लिए समीक्षाएं लिखो. तुम आजकल क्या पढ़ रहे हो...कौन सी फिल्में देख रहे हो...कैसा संगीत सुन रहे हो. घर से दफ्तर आते जाते कितनी चीज़ों को सहेज देना चाहते होगे. लिखने को उस तरह से ट्रीट कर लो. ये क्या जिद है कि ख़राब लिखने में डर लगता है. ख़राब कुछ नहीं होता. जो तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा शायद उसमें कोई और अपना अक्स देख पाए. देखो तुमसे और मुझसे बेहतर कौन जानेगा कि घटिया से घटिया चीज़ कुछ न कुछ अच्छा दे जाती है. वाहियात पौर्न फिल्म का कोई एक सीन होता है जिसमें ऐक्ट्रेस अपने अभिनय से अलग हट कर महज एक स्त्री रह जाती है...मर्द की वर्नारेबिलिटी का एक क्षण कैमरा पकड़ लेता है. पल्प फिक्शन का कोई किरदार ऐसी गूढ़ बात कह जाता है कि जिंदगी के सारे फलसफे झूठे लगते हैं.

देखो न, सही और गलत, सच और झूठ, अच्छा और बुरा के खांचे में चीज़ों को फिट करने वाले हम और तुम कौन लोग होते हैं. बताओ भला, हम किस खांचे में आते हैं? मैं और तुम किस खांचे में आते हैं? मैं क्या लगती हूँ तुम्हारी? पाठक, क्रिटिक, प्रेमिका, बहन, माँ, दोस्त...कोई पुरानी रिश्तेदार? किस किस सरहद में बाँधोगे?  ये भी तो नहीं कह सकते कि गलत है...इतना बात करना गलत है. तुम जाने कितनी सदियों से मेरी इस प्यास के लिए सोख्ता बने हुए हो. दुनिया में अगर कोई एक शख्स मुझे पूरी तरह जानता है तो वो तुम हो...शायद कई बार मुझसे भी बेहतर. मुझे कभी कभी लगता है हम पैरलल मिरर्स हैं...एक दूसरे के सामने रखे हुए आईने. एक दूसरे के एक्स्टेंशन. हममें जो उभरता है कहीं बहुत दूर दूर तक एक दूसरे में प्रतिबिंबित होता है. अनंत तक. हमारी कहानियों जैसा. क्लास में एक्जाम देते वक़्त होता था न...पेन में इंक ख़त्म हो गयी तो साथी से माँग लिया. वैसे ही कितनी बार मेरे पास लिखने को कुछ नहीं होता तो तुमसे माँग लेती हूँ...बिम्ब...डायलॉग्स...किरदार...तुम्हारी हंसी...तुम्हारी गालियाँ. कितना कुछ तो. तुम मांगने में इतना हिचकते क्यूँ हो. इतनी कृपण नहीं हूँ मैं. 

तुम्हारे शब्दों में मैंने कई बार खुद को पाया है...कई बार मरते मरते जीने का सबब तलाशा है...कई बार मुस्कुराहटें. मैं एकलौती नहीं हूँ. तुम जो लिखते हो उसमें कितनी औरतें अपने मन का वो विषाद...वो सुख...वो मरहम पाती हैं जो सिर्फ इस अहसास से आता है कि दुनिया में हम अकेले नहीं हैं. कहीं एक कवि है जो हमारे मन की ठीक ठीक बात जानता है. ये औरत तुम्हारी माँ हो सकती है, तुम्हारी बहन हो सकती है...तुम्हारी बीवी हो सकती है. इस तरह उनके मन की थाह पा लेना आसान नहीं है दोस्त. ऐसा सिर्फ इसलिए है कि तुम पर सरस्वती की कृपा है. इसे वरदान कह लो या अभिशाप मगर ये तुम्हारे साथ जिंदगी भर रहेगा. मुझे समझ नहीं आता कि तुम लिख क्यूँ नहीं रहे हो...क्या तुम्हें औरतों की कमी हो गयी है? क्या माँ से बतियाना बंद कर दिए हो...क्या बहन अपने घर बार में बहुत व्यस्त हो गयी है...क्या प्रेमिका की शादी हो गयी है(फाइनली?)...या फिर तुम्हारी दोस्तों ने भी थक कर तुमसे अपने किस्से कहने बंद कर दिए हैं? अब तुम लिखने के बजाये घुन्ना जैसा ये सब लेकर अन्दर अन्दर घुलोगे तो कौन सुनाएगा तुमको अपनी कहानी! 

देखो. अकेले कमरे में बैठ कर रोना धोना बहुत हुआ. बहुत दारू पिए. बहुत सुट्टा मारे. बहुत ताड़ लिए पड़ोस का लड़की. अब जिंदगी का कोई ठिकाना लगाओ कि बहुत बड़ी जिम्मेदारी है तुम्हारे काँधे पर. अगर तुम इस जिम्मेदारी से भागे तो कल खुद से आँख मिला नहीं पाओगे. उस दिन भी हम तुमसे सवाल करेंगे कि हम जब कह रहे थे तो सुने क्यों नहीं. हालाँकि हम जानते हैं कि जिद और अक्खड़पने में तुम हम से कहीं आगे हो लेकिन फिर भी...सोच के देखो क्या हम गलत कह रहे हैं? खुद को बर्बाद करके किसी को क्या मिला है. जंग लगी हुयी कलम से तो धमनी भी नहीं काटी जा सकती. जान देने के लिए भी कलम में तेज़ धार चाहिए. कि कट एकदम नीट लगे. मरने में भी खूबसूरती होनी चाहिए.

और सुनो. हम तुमसे बहुत बहुत प्यार करते हैं. जितना किसी और से किये हैं उससे कहीं ज्यादा. मगर इस सब में तुम्हारे लिखने से बहुत ज्यादा प्यार रहा है. तुम जब लिखते हो न तो उस आईने में हम संवरने लगते हैं. ले दे के हर व्यक्ति स्वार्थी होता है. शायद तुम्हारे लिखे में अपने होने को तलाशने के लिए ही तुमसे कह रहे हैं. मगर जरा हमारे कहने का मान रखो. इतना हक बनता है मेरा तुम पर. कोई पसंद नहीं आया तुम्हारे बाद. तुम जैसा. तुमसे बेहतर. कोई नहीं. तुम हो. तुम रहोगे. घड़ी घड़ी हमको परखना बंद करो. एक दिन उकता के चले जायेंगे तो बिसूरोगे कि इतनी शिद्दत से किसी का अक्षर अक्षर इंतज़ार कोई नहीं करता. 

हम आज के बाद तुमको लिखने के लिए कभी कुछ नहीं कहेंगे. 

तुम्हारी, 
(नाम भी लिखें अब? कि शब्दों से समझ जाओगे कि और कौन हो सकती है. )

29 January, 2015

येलो ब्लू बस तोस्का

सुनो, मुझे एक बार प्यार से तोस्का बुलाओगे? जाने कैसे तो तुमसे बात करते हुए बात निकल गयी...कि मुझे भी अपने किरदारों के नाम रखने में सबसे ज्यादा दिक्कत होती है. फिर जब तुम मुझे तोस्का बुलाओगे तो मुझे लगेगा मैं तुम्हारी कहानियों का कोई किरदार हूँ और अपने मन का कुछ भी कर देने के पहले तुम्हारे आर्डर का वेट करूंगी. यूँ एक बार पुरानी कहानी लिखी थी जिसमें किरदार का नाम था तोश्का...बड़ी जहीन सी लड़की थी...अल्हड़...उड़ती थी...मगर जाने क्यूँ तुम्हारी आवाज़ में अपने लिए तोस्का ही सुनने का मन है...लगता है जैसे ये शब्द बना ही था इसलिए कि तुम कभी मुझे इस नाम से बुला सको. तुम्हारी आवाज़ में एक अधिकार उभरता है. जैसे कुछ हूँ मैं तुम्हारी. जैसे कोई कभी नहीं थी तुम्हारी कभी. तुम मुझे तोस्का बुलाओगे तो मैं तुम्हारी कहानी में उतर जाउंगी...तुम्हारी भाषा बोलूंगी...मेरी आँखें भी तुम्हारी आँखों जैसी हो जायेंगी न? लाईट ब्राउन.

तुम मुझे तोस्का बुलाओगे तो मैं अपना असली नाम भूल जाउंगी...मैं कोई और होने लगूंगी सिर्फ तुम्हारे लिए...मेरी बनायी पहचान के कांटे तुम्हारी यादों में नहीं चुभेंगे. हम एक जिंदगी में कई पैरलल जिंदगियां जियेंगे. फिर मैं एकदम पजेसिव हो जाउंगी और जिद मचा दूँगी कि तुम्हारी कहानियों में तोस्का के अलावा कोई और किरदार हो ही नहीं सकता. तुम्हारा दम घुटने लगेगा. तुम इस नाम से भागोगे. इस फीलिंग से भागोगे. तुम मुझसे दूर जाने के लिए दम तनहा हो जाना चाहोगे. इस दरमयान तुम अपनेआप को बेहतर पहचानोगे कि उस दूर पहाड़ी गाँव में कोई आइना नहीं होगा. तुम मुझे पूरा लिख नहीं पाओगे कि पूरा होना मेरी किस्मत में नहीं बदा है. तुम मुझे जरा सा बचा कर रखना चाहोगे अपने सीने में...अफ़सोस की तरह...तकलीफ की तरह...फिर बहुत सालों बाद दिल्ली में पड़ेगी बर्फ और तुम बेतरह रूस को मिस करोगे...मुझसे बस जरा सा ही कम. मैं इत्तिफाकन अपने रेड स्कार्फ में गिरहें लगाती गुजरूंगी उसी रास्ते से जहाँ तुम ठिठक कर खड़े हुए हो. तुम्हारी आँखें यूँ चमक उट्ठेंगी कि बरबस मेरे मुंह से निकल जाएगा बहुत साल पुराना, तुम्हारा प्यार का नाम 'सोंयिसको'. 
---होना था 'धूप'...और लगनी थी 'प्यास'
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एक पैरलल दुनिया होगी जिसमें इस दुनिया की कोई बंदिश नहीं होगी. सब कुछ अपनी मर्जी का. सब कुछ. उस दुनिया में मुझे बेहतरीन डांस करना आएगा और मैं तुम्हारे साथ क्लोज डांस करूंगी...इतने करीब कि तुम्हारी सांस मुझमें उतर जाए. सर्द सर्द बर्फ़बारी के किसी मौसम में.
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'बट आई हैव नेवर बीन टू रशिया. '
'तो अच्छा है न. जो शहर खुलेंगे उनके नाम असली होंगे बस...बाकी नक्शा सारा का सारा हम साथ मिल कर बना लेंगे...मौसम वही होगा जो गूगल दिखाएगा लेकिन हम अपनी मर्ज़ी से वहां अमलतास के पेड़ रोप आयेंगे. तुम्हें अमलतास पसंद तो है न या कुछ और?'
'अरे लेकिन ऑथेंटिक तो होना चाहिए.'
'ऑथेंटिक. मने रियल. तुम्हारा प्यार है ऑथेंटिक? कह सकते हो सीने पे हाथ रख के...एकदम खालिस...बिना मिलावट का? ऐसा नहीं है जान...कुछ भी रियल नहीं होता. हम भी किसी की काल्पनिक दुनिया में जी रहे हैं न...तो इस तिलिस्म के अन्दर एक और तिलिस्म हमारा. '
'मगर तोस्का!'
'हाय! तुम ये नाम लेते हो न तो बस सारे तानेबाने बुनना छोड़ कर तुम्हें किस करने का मन करने लगता है. कैसे तो लेते हो तुम ये नाम...जैसे मैं सदियों इसी नाम से सुनती आई हूँ खुद को...तुम हमेशा से तो यहाँ नहीं थे न?

गूगल ट्रांसलेट तोस्का का मतलब हिंदी में एक ही शब्द लिखता है 'तड़प'...अंग्रेजी में 'यर्निंग' मगर जब तक तुमने पुकारा नहीं था ये सिर्फ एक शब्द था...अब इस शब्द में जान आ गयी है. ये शब्द हमारे रिश्ते को भी तो परिभाषित करता है न...कुछ भी तो और नहीं है हमारे बीच...इस खिंचाव...इस तड़प के सिवा...सुबह से शाम की ये हरारत...ये इंतज़ार...फोन से व्हाट्सएप्प से लेकर फेसबुक तक...तुम्हारी एक झलक का...तुम्हारे एक स्माइली का...आवाज़ के ज़रा से एक कतरे का...कि बस यही है न. वरना कौन करता है किसी से यूँ निंदाये बात कि बाद में पूछो...'हम सुबह तुमसे क्या बात किये...नींद में थे...कुछ याद नहीं है'. कोई तो है इगोर इबोनोव...सोचो न...जाने कैसा होगा...कैसा दिखता होगा...स्क्रीनशॉट लेकर रखा है. हम जायेंगे यहाँ कभी. और इगोर को थैंक यू बोलेंगे.'
'तुम एकदम ही पागल हो. गूगल मैप पर किसी ने तस्वीर डाली है तो अब मिल लोगी जा कर उससे!'
'न रे...सोचो इगोर एकदम प्योर वोडका पीता होगा. खालिस. असली. जैसे हमारे यहाँ ताड़ी होता है वैसा कोई लोकल ड्रिंक वहां भी मिलेगा. उसके साथ बैठ के पीने में कितना मज़ा आएगा.'
'ए. तोस्का की बच्ची. अब मुझे जलन हो रही इगोर से...तुझे कोई भी अच्छा लग जाता है...किसी के भी साथ दारू पीने बैठ जायेगी कमबख्त. कोई पसंद नापसंद है कि नहीं तेरी?'
'माहौल होता है बस...पानी देख रहे हो कितना नीला है...जो ऐसी जगह रहता होगा...अच्छा ही इंसान होगा. इसमें सोचना क्या है. दोस्त, परिवार और कलीग्स से बढ़ कर हम हमारे शहर के होते हैं...बहुत बहुत बहुत. तुम भी तो बहुत पहाड़ घूमे हो, किसी बुरे पहाड़ी से मिले हो कभी? नहीं न...वे इतने साफ़ और निर्मल इसलिए होते हैं कि कि उनका माहौल ऐसा होता है.'
'तू बहुत जिद्दी है रे. अच्छा चल. तेरे इगोर के साथ वोडका पी लूँगा. खुश.' 

'सच्ची. तुम मुझे ले चलोगे ये जगह? मैंने यहाँ के कौरडिनेट्स नोट कर लिए हैं. बस जीपिएस में डाल देने की बात है. आजकल तो सिंपल है एकदम. सुनो, तुम्हारी म्यूजिक पर पकड़ तो अच्छी है न? जिनको कोई एक इंस्ट्रूमेंट बजाना आता है वो अक्सर कोई और भी बजा लेते हैं...तुम तो गिटार जानते हो...जरा सा बलालाइका से कुछ धुन निकाल पाओगे क्या?'

'तुमने कहा कि ये मेरी कहानी है...तुम तोस्का हो...अगर यहाँ अमलतास का पेड़ उग सकता है तो मैं बलालाईका तो बजा ही लूँगा.' 
'अब मेरा कुछ करने को जी नहीं कर रहा...मैं थक गयी.'
'ya lyublyu vas toska'
'येलो ब्लू बस...क्या क्या बोल रहे हो तुम अब.'
'पगली...मैंने तुझे राशियन में आई लव यू कहा. ठीक से प्रैक्टिस कर...जब मिलूंगा तो सुनूंगा तुमसे.'
'किस पर प्रैक्टिस करूँ? 'टी' को बोलूं? येल्लो ब्लू बस.'
'कमबख्त की बच्ची...किसी को बोल कर प्रैक्टिस करने की जरूरत नहीं है. यहाँ हम आई लव यू बोल रहे हैं और मैडम को खुराफात सूझ रहा है.'
'तोस्का मेरी जान...मेरा नाम तोस्का है...मैं तड़प हूँ...उँगलियों में सुलगती...आँखों में हहराती हुयी...मैं तुम्हारी जिंदगी में पा लेने का सुकून नहीं खो जाने का खौफ़ लेकर आई हूँ...लौन्गिंग...तड़प...आह...तकलीफ...कि मैं नहीं करती तुमसे प्यार'
'सुनो...तोस्का...मेरी तोस्का...'
'सुनो...सोंयिसको...'
'आहा...तुम सीख रही हो...जरा जरा...तुम्हारे इस टूटे फूटे उच्चारण से कैसी गुदगुदी सी होती है कि उफ़.'
'हाँ...मेरी जिंदगी की धूप हो तुम...मेरी आँखों का रंग...मेरी हथेलियों की सूखती लकीरें...छत पर पसारे हुए कपास के दुपट्टे में खनखनाती धूप हो तुम...सोंयिसको. सनशाइन. मेरा अपना सूर्य.'
'तुम प्यार करती हो ना मुझसे?'
'मालूम नहीं. तुम्हें क्या लगता है?'
'तोस्का...मेरी तोस्का...मेरी हो. इतना लगता है. बस.'

--- 
मैं वोल्गा किनारे हूँ सुबह से. तुम्हारे साथ. तुम्हारी बांहों में. बहुत सी वोडका पी रखी है. झूम रही हूँ. कोई राशियन लोकगीत बज रहा है. शायद कोई चरवाहों का झुण्ड होगा दूर के किसी पहाड़ पर. हवा पर पैर धरते बलालाइका की धुन आई है. तुम्हारे होठों का स्वाद चेरी फ्लेवर्ड सिगार जैसा है.
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वोडका की बोटल शिकायत मोड में है. ये कैसी रात है कि सील तक नहीं तोड़ी है. चेरी जूस भी वैसा का वैसा धरा है फ्रिज में. फिर ये सब क्या था? उफ्फ्फ...तुम न. जान ले लो मेरी.

28 January, 2015

उसकी नाभि से नाभिकीय विखंडन की शुरूआत होती थी



हाई बाउंसिंग बॉल होती है न...वैसे ही छोटे छोटे गोले हैं. मेटल के. उनकी परिधि पर छोटी छोटी आरियाँ लगी हुयी हैं. बचपन में एक प्रोजेक्ट हुआ करता था जिसमें रबर की गेंद के हर इंच पर पिनें चुभायीं जाती थीं न...बस समझ लो उल्टा केस है. छोटी छोटी गेंदें हैं. बेहद खतरनाक. त्वचा से जिस्म में अन्दर उतर आई हैं और अन्दर से मिक्सी के ब्लेड्स की तरह चलती जा रही हैं...दिमाग...चेहरा...गर्दन...सीना...नाभि...बदन में अन्दर बिलकुल तेजी से रिवोल्व करती जा रही हैं. कुछ नहीं बचता है. जहाँ ह्रदय हुआ करता था...लंग्स...किडनी...जिगर...सारे पुर्जे कटते जा रहे हैं...जिस्म सिर्फ एक आवरण रह गया है...अन्दर का सब कुछ जैसे महीन पीस दिया गया है...दर्द दर्द दर्द...इतना कि मैं चीख नहीं सकती कि जुबान भी कहाँ बची है. और अब मैं खून की उल्टी करना चाहती हूँ...कि जिसमें मैं जितनी हूँ पूरी की पूरी बाहर निकल जाऊं. सिर्फ खोल बचे बाहर. त्वचा. चाँद रंग की त्वचा. संगमरमरी.

अन्दर का सब कुछ यूँ निकलने के बाद भी रूह का क्या होता है? रूह क्या कोशिकाओं में छुप कर रहती है नाभिकीय ऊर्जा की तरह? मेरे अणु आपस में टकरायेंगे तो कितनी ऊर्जा निकलेगी? 

मैं पूरी तरह खाली होने के बावजूद शब्दों से कैसी भरी हूँ. शब्द भी क्या रूह की तरह अणुओं में रहते हैं? चारों तरफ सिर्फ खून ही खून बिखरा देखती हूँ...कुछ पता नहीं चलता इसमें दिल का हिस्सा किधर है और दिमाग का किधर. मुझे खून से वितृष्णा नहीं होती है. मगर इस तरह खाली होने के बाद मैं ज्यादा देर बची रह पाऊँगी इस पर भरोसा नहीं है. ऊपरवाला इस सिस्टम रीहौल के बाद कुछ नया भरने के लिए रचेगा क्या या फिर हंसेगा मेरे ऊपर सिर्फ कि शब्द बहुत पसंद हैं न तुझे. अब शब्दों से ही बना अपनेआप को दुबारा. रच अक्षर अक्षर खुद को. मैं कर सकती हूँ ऐसा. मगर सवाल ये होगा कि क्या मैं ऐसा करना चाहती हूँ. यूँ सिर्फ जिस्म का छिलका रह गया है तो जल्द ही मर भी जाउंगी. शब्दों से खुद को रच लिया तो सदियों अभिशप्त हो जाउंगी कि शब्द कभी नहीं मरते. मुझे नश्वर जिंदगी चाहिए. मुझे खुदा नहीं बनना. 

होता है न...सारा कुछ उल्टी हो जाने के बावजूद भी लगता है कुछ बचा रह गया है...अगली बार कोशिश करने पर आँतों में मरोड़ होती है बस...चक्कर आता है...मैं भी वैसी ही बैठी हूँ. बदन से सारा कुछ निकल गया है. कोई धड़कन नहीं...सांस आने पर कोई ऊपर नीचे होते फेफड़े नहीं...सब स्थिर है. शांत. मगर इस खोखलेपन के बावजूद मौत आसपास क्यूँ नहीं दिखती. मेरी त्वचा क्या जिजीविषा से बनी है? 

इस खून में उँगलियाँ डुबो कर लोग कविता क्यूँ लिखना चाहते हैं. इस खून में उँगलियाँ डुबो कर तुम मेरा नाम लिखना चाहते हो कि मेरा नाम भर रह जाए. खून का कतरा कतरा रेडियोएक्टिव है. बेहद संक्रामक. जिधर जाएगा. जिसे छुएगा बर्बाद करेगा. या खुदा. तुझे ऐसा कोई काण्ड कहीं दूर थार के रेगिस्तान में करना था या बहुत गहरे समंदर में. मेरा कतरा कतरा जमीन में ज़ज्ब होना चाहता है. हवा में घुलना चाहता है. बिखरना चाहता है. बर्बाद करना चाहता है. नाम लिखना चाहता है. चीखना चाहता है. इश्क़ इश्क़ इश्क़.
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रात से रुलाई अटकी है सीने में. मगर अकेले रोने में डर लगता है. लगना भी चाहिये.

21 January, 2015

इश्क़ सियाही है और मेरा बदन कलम...जरा थाम अपनी उँगलियों में जानम...जरा करार की दरकार है

लिखना. पागलपन है.

मैं वो कहानियां नहीं लिखतीं जो मेरे रीडर्स सुनना चाहते हैं...नहीं...कोई नहीं जानता कि वो कैसी कहानियां सुनना चाहते हैं...मैं वो लिखती हूँ जो मैं लिखना चाहती हूँ...मैं वैसी कहानियां लिखती हूँ जो मेरे अन्दर उथल पुथल मचाये रहती हैं...वैसे किरदार जो चलते फिरते जिंदगी में दाखिल हो जाते हैं और जिद पकड़ के बैठ जाते हैं कि हमारी कहानी लिखो. मैं जब उस अजीब से ट्रांस में होती हूँ तो ना मुझे सामने कुछ दिखता है, न कुछ और सूझता है...कोई खिड़की खुलती है और मैं उस पूरे सीन में उतर जाती हूँ. वहां के रंग, धूप...खुशबुयें...सब महसूस होती हैं. मैं वैसे में फिर और कुछ नहीं कर सकती लिखने के सिवा कि अगर लिखा नहीं तो मेरा माथा फट जाएगा. 

हाँ...मुझे लगता है कि मैं इश्वर की कलम हूँ...वरना मेरे अन्दर इतना सारा कुछ लिखने को और कहने को क्यूँ है? मुझे क्यूँ हर हमेशा इतनी बात करनी होती है? मैं फोन पर बात करती हूँ...लोग जो मिलते हैं उनसे बात करती हूँ...मेरे अन्दर शब्द जैसे हमेशा ओवरफ्लो करते रहते हैं कि बहुत कुछ कह देने के बावजूद भी मुझे बहुत कुछ लिखना होता है. IIMC में एक बार पोएट्री कम्पटीशन में हिस्सा लिया था तो दोस्तों ने आश्चर्य किया था कि इतना बोलने के बाद भी तुम्हारे पास लिखने को शब्द कैसे बच जाते हैं. मैं शब्दों की बनी हूँ...पूरी की पूरी? और क्या है मेरे अन्दर...खंगालती हूँ तो कुछ नहीं मिलता. गुनगुनाहट है...गीत हैं...सीटियाँ हैं...सब कुछ कहने को...आवाजें...खिलखिलाहटें...शोर...बहुत सारा केओस. 

मैंने बहुत कम पढ़ा है...अक्सर मैं इतनी छलकी हुयी होती हूँ कि पैमाने में और कुछ डालने को जगह ही नहीं बचती. किसी और से भी बात करती हूँ तो देखती हूँ कि लोग कितना कुछ पढ़ रहे हैं...कितना कुछ गुन रहे हैं...सीख रहे हैं. मैं फिल्में फिर भी बहुत सारी देख जाती हूँ मगर वो भी मूड होने पर. मेरे लिए कुछ भी बस गुज़र जाने जैसा नहीं होता आजकल...हर कुछ बसता जाता है मेरे अन्दर. कोई सीन. कोई डायलाग. कोई बैकग्राउंड स्कोर. मैं चाहती हूँ कि पढूं...मैं चाहती हूँ कि कुछ नए शब्द, कुछ नए राइटर्स को पसंद करूँ, कुछ क्लासिक्स में तलाशूँ किसी और समय के चिन्ह...मगर हो नहीं पाता...एक तो मुझे बहुत कम चीज़ें बाँध के रख पाती हैं. मेरे अच्छे बुरे के अपने पैमाने हैं...अगर नहीं पसंद आ रही है तो मैं मेहनत करके नहीं पढ़ सकती. शायद मेरे में यही कमी है. सब कुछ नैचुरली नहीं होता. लिखना भी मेहनत का काम है. इसके लिए बैकग्राउंड वर्क करना चाहिए. अच्छे राइटर्स को पढ़ना आदत होनी चाहिए. 

अब मैं क्या करूँ. एक समय था कि बिना रात को एक किताब ख़त्म किये नींद नहीं आती थी. एक समय मैं सिर्फ तीन घंटे सोती थी लेकिन रोज़ की एक किताब का कोटा हमेशा ख़त्म करती थी. एक समय मुझे पढ़ने से ज्यादा अच्छा कुछ नहीं लगता था. एक समय मेरे लिए अच्छा दिन का मतलब होता था ख़ूब सारी धूप...भीगे हुए बाल...गले में लिपटा स्कार्फ और एक अच्छी किताब. एक समय मुझे वे लोग बहुत आकर्षित करते थे जिन्होंने बहुत पढ़ रखा हो...जो घड़ी घड़ी रेफरेंस दे सकते थे. उन दिनों मैं भी तो वैसी ही हुआ करती थी...कितने कवि...कितने सारे नोवेल्स के कोट्स याद हुआ करते थे. उन दिनों गूगल नहीं था. किसी को लवलेटर लिखना है तो याद से लिखना होता था. तभी तो मैं दोस्तों की फेवरिट हुआ करती थी चिट्ठियां लिखने के मामले में. ये और बदनसीबी रही कि कमबख्त जिंदगी में एक भी...एक भी...लव लेटर किसी को भी नहीं लिखा. इस हादसे पे साला, डूब मरने को जी चाहता है. बहरहाल...जिंदगी बाकी है. 

एक समय मेरे लिए परफेक्ट जगह सिर्फ लाइब्रेरी हुआ करती थी. मैं अपने आइडियल घर में एक ऊंची सी लाइब्रेरी बनाना चाहती थी जिस तक पहुँचने के लिए सीढ़ी हो और मैं अपने दिन किसी कम्फर्टेबल सोफे में धंसी हुयी किताबें पढ़ती रहूँ. किताबों को पढ़ना भी मजाक नहीं था...मुझे आज तक की पढ़ी हुए फेवरिट किताबों के पन्ने पन्ने फोटोग्राफ की तरह याद हैं कुछ यूँ भी कि उन्हें कहाँ पढ़ा था...किस समय पढ़ा था. लालटेन में पढ़ा था या ट्यूबलाईट में पढ़ा था. वगैरह. नयी किताब के पन्नों की खुशबू पागल कर देती थी उन दिनों. मगर अब बदल गयी हैं चीज़ें. 

अब मुझे किताबों से वैसा पागलपन वाला प्यार नहीं रहा...अब मुझे जिंदगी से प्यार है. अब मैं लाइब्रेरी में बैठ कर पढ़ना नहीं बाईक लेकर घूमना चाहती हूँ. अब मैं संगीत लाइव सुनना चाहती हूँ. अब मैं लोगों को ख़त नहीं लिखना चाहती. मिलना चाहती हूँ उनसे. गले लगाना चाहती हूँ उनको. उनके साथ शहर शहर भटकना चाहती हूँ. अब मुझे वो लोग अच्छे लगते हैं जिनकी जिंदगी किसी कहानी जैसी इंट्रेस्टिंग है. जो मुझे अपनी बातों में बाँध के रख सकते हैं. मुझे. जो मुझे चुप करा सकते हैं. जो मुझे हंसा और रुला सकते हैं. अब मुझे वे लोग अच्छे लगते हैं जो अलाव के इर्द गिर्द बैठे हुए मुझे अपनी जिंदगी के छोटे छोटे वाकये सुना सकते हैं कि सबकी जिंदगी एकदम अलग होती है. एकदम अलग. अब मेरे ख्वाबों के घर में किताबें ही नहीं बहुत सी रोड ट्रिप्स के फोटोग्राफ्स भी होते हैं. बहुत से अनजान सिंगर्स के कैसेट्स भी होते हैं. बहुत से महबूब लोगों के हाथों साइन की हुयी पर्चियां भी होती हैं. मैं जिन्दा हूँ. जिंदगी को सांस सांस खींचती हूँ अन्दर और लफ्ज़ लफ्ज़ बिखेरती हूँ बाहर. अब मैं हवाओं में चीखती हूँ उसका नाम कि मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हिचकियों से उसका जीना मुहाल हो जायेगा. 

देखा जाए तो इश्क़ बहुत कुछ सिखा देता है आपको बहुत बार. बस डूबने की दरकार होनी चाहिए. तबियत से. इश्क़ हर चीज़ से होना चाहिए. कर्ट कोबेन से. गुरुदत्त से. मंटो से. शहर के मौसम से. दिलरुबा दिल्ली से. रॉयल एनफील्ड बुलेट से. हर चीज़ से इश्क़ होना चाहिए...ये क्या कि छू के गुज़र गए. मुझे जब भी होता है इश्क़ मुझे उसकी हर बात से इश्क़ होता है. उसके शहर. उसकी किताबों. उसकी कविताओं. उसकी पुरानी प्रेमिकाओं. उसकी माँ के पसंदीदा हरे रंग की साड़ी...उसकी बीवी के कानों में अटके गुलाबी बूंदे...सबसे इश्क़ हो जाता है मुझे. इस डूबने में कितना कुछ नया मिलता है. मैं जानती हूँ उसे चाय पसंद है तो जिंदगी में पहली बार चाय पीती हूँ...वो जानता है कि मुझे ब्लैक कॉफ़ी पसंद है तो वो ब्लैक कॉफ़ी पीता है. अब जनाब चाय सिर्फ एक दूध, चीनी, चायपत्ती वाली चीज़ नहीं रह जाती...चाय उस अहसास को कहते हैं कि सिप मारते हुए उसके होठों का स्वाद आये. तीखी बिना चीनी वाली ब्लैक कॉफ़ी पीते हुए कोई सोचे कि लड़की इतनी मीठी और टेस्ट इतना कड़वा...खुदा तेरी कायनात अजीब है. इश्क हो तो उसके बालों की चांदी से कान से झुमके बनवा लेना चाहे लड़की तो कभी गूगल मैप पर ज़ूम इन करके थ्री डी व्यू में देखे कि उसके शहर की जिन गलियों से वो गुज़रता है वहां के मकान किस रंग के हैं. इश्क़ होता है तो हर बार नए बिम्ब मिलते हैं...क्रॉसफेड होता है वो हर लम्हा...घुलता है रूह में...शब्द में ...सांस में.

I am my eternal muse. मुझे muse के लिए दूसरा शब्द नहीं आता. मेरे लिए हर बार इश्क़ में पड़ना खुद को उस दूसरे की नज़र से देखना और फिर से अपने ही प्यार में पड़ना है. मैं पूरी तरह सेल्फ ओब्सेस्स्ड हूँ. मुझे खुद के सिवा कुछ नहीं सूझता. मैं तेज़ कार चलाती हूँ...DDLJ के गाने सुनती हूँ. इस उदास फीकी धूप वाले शहर पर अपने मुस्कुराहटों की धूप बुरकती हूँ. आते जाते लोगों से बेखबर. खुद को देखती हूँ आईने में तो खुद पे प्यार आता है. हंसती हूँ. पागलों की तरह. सांस लेती हूँ गहरी. इतनी गहरी कि उसके हिस्से की ऑक्सीजन कम पड़ जाए और वो छटपटा कर मुझे फोन करे...जानम...मेरी सांस अटक रही है. तुम हो न कहीं आसपास. मैं फिर खिलखिलाते हुए उसके शहर में उड़ाती हूँ अपना नीला दुपट्टा और कहती हूँ उससे...तुम्हारे शहर में हूँ जानम...आ के मिल लो. मैं बुनती हूँ सुनहरी कल्पनाएँ और सतरंगी ख्वाब. मैं इश्क़ को सियाही की तरह इस्तेमाल करती हूँ. खुद को पूरा डुबो कर लिखती हूँ जिंदगी के सफ़ेद कागज़ पर एक ही महबूब का नाम. दास्तान हर बार नयी. शहर नया. सिगरेट नयी. परफ्यूम नया. ड्रिंक नयी. मिजाज़ नया. 

इश्क़. एक आदत है. बुरी आदत. मगर मेरा खुदा आसमान में नहीं, नीचे जहन्नुम में रहता है. मेरे गुनाहों की इबादत को क़ुबूल करता है. मैं जब भी इश्क़ में जान देने को उतारू हो जाती हूँ वो खुद आता है मुझे बांहों में थामने...सांस रुक जाने तक चूमता है और कहता है 'पुनः पुनर्नवा भवति:'. 

***

PS: मैं हर बार इश्वर से शुरू होकर शैतान तक कैसे पहुँच जाती हूँ मुझे नहीं मालूम. शायद मुझे दोनों से इश्क़ है.

20 January, 2015

टूट जाने का हासिल होना भी क्या था...

उसका सारा बदन बना है शीशे का
काँच के होठ, काँच बाँहें 
उससे बेहद सम्हल के मिलती हूँ
फिर भी चुभ ही जाता है 
माथे पर कोई आवारा बोसा

कभी काँधे पे टूट जाती हैं 
उसकी नश्तर निगाहें 
और उंगलियों में फँसी रह जाती हैं 
उसकी काँच उंगलियाँ
फिर कितने दिन नहीं लिख पाती कोई भी कविता

उसके कमरे में सब कुछ है काँच का
वो उगाता है काँच के फूल
जिन्हें बालों में गूँथती हूँ
तो ख्वाब किरिच किरिच हो जाते हैं

ये जानते हुये कि एक दिन
मुझसे टूट जायेगा उसका काँच दिल
मैं करती हूँ उससे टूट कर प्यार
धीरे धीरे होने लगा है
मेरा दिल भी काँच का।

शायद हम दोनों के नसीब में
साथ टूटना लिखा हो।

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