24 April, 2015

के भगवान भी सर पीट कर कहता है, 'हे भगवान, क्या करेंगे हम इस लड़की का!'


भगवान बैठा है सामने. हथेली पर ठुड्डी टिकाये.
'लतखोर हो तुम, आँख में नींद भरा हुआ है...खुद तुमको मालूम नहीं है क्या अलाय बलाय लिख रही हो...किरमिच किरमिच लग रहा है आँख में नींद लेकिन सोओगी नहीं. अब क्या लोरी सुनाएं तुमको? भारी बदमाश हो'
'ऑल योर फाल्ट, हमसे पूछ के बनाये हो हमको ऐसा. भुगतो. हुंह'
'तुमसे बक्थोथरी करने का कोई फायदा नहीं हैं और हमको इतना टाइम नहीं है...सीधे सीधे बताओ, अभी चुप चाप सोने का क्या लोगी?'
'उसकी आवाज़?'
'किसकी?'
'अच्छा...रियली...तुम ये सवाल पूछोगे...तुमको तो सब मालूम है'
'बाबू, नारी के मन की बात एंड ऑल दैट...तुमको मज़ाक लगता है...उसमें भी तुम...बाबा रे...ब्रम्हा के बाबूजी भी नहीं जानें कि तुम को क्या चाहिए...सीधे सीधे नाम लो उसका...फिरि फ़ोकट में हम एक ठो वरदान बर्बाद नहीं करेंगे'
'इतने नखरे हैं तो आये काहे हो...जाओ न...कौन सा हमारे फेसबुक पोस्ट से इंद्र का सिंघासन डोलने लगता है'
'अब तुमको क्या क्या एक्सप्लेन करें अभी...कहर मचाये रक्खी हो...सो जाओ बे'
'उसकी आवाज़'
'नाम क्या है उसका'
'वो नहीं बताएँगे'
'ट्रायल एंड एरर?'
'आई एम गेम'
'गेम की बच्ची...तुम्हारे तरह लुक्खा बैठे हैं हम...भोर के तीन बज रहे हैं...नरक का सब छौड़ा लोग फेसबुक खोल के गलगली दिए जा रहा है...न कहीं जाएगा, न खुराफात करेगा...इन्टरनेट का बिल बेसी आएगा सो कौन भरेगा बे'
'तुम्हारी भाषा को क्या हो रहा है...हे भगवान! कैसे बोलने लगे हो आजकल?'
'तुम न...हमको भी सलाह दे मारोगी लड़की...अब जल्दी बताओ क्या जुगाड़ लगायें तुम्हारा?'
'जैसे ब्लैंक चेक होता है वैसे तुम ब्लैंक सिम जैसा कुछ दे दो न हमको...कि हमारा जिसकी आवाज़ सुनने का मन करे...जब भी...हम उसे फोन करें और वो हमेशा मेरा कौल पिक कर ले'
'तुमको अपना जिंदगी कॉम्प्लीकेट करने में कितना मन लगता है. ऐसा कुछ न दे रहे हम तुमको. किसी एक के नाम का कालिंग कार्ड दे सकते हैं. चाहिए?'
'अच्छा चलो...आई विल मैनेज...कार्ड इशु करो'
'नाम?'
'ओफ्फोह...वी आर डेफिनिटली नॉट गोइंग इन दैट लूप अगेन, तुम कार्ड दे दो, हम नाम लिख लेंगे'
'वैलिडिटी कितनी?'
'जिंदगी भर'
'इतना नहीं हो पायेगा'
'कैसे यूजलेस भगवान् हो...चलो कमसे कम दस साल'
'तुम जिन्दा रहोगी दस साल? मर गयी तो? कार्ड कौन यूज करेगा?'
'न न न न...चलो एक साल'
'ओके. एक साल. एक कार्ड. एक आवाज. ठीक है?'
'डन, वो मेरा कॉल उठाएगा न कल?'
'कौन सा कल? तुम्हारे सो के उठ जाने तक उसका आज ही चल रहा होगा'
'ओफ्फोह...तुम जाओ...कार्ड दे दिए न...माथा मत खाओ मेरा'

वो जरा झुकता और कनमोचड़ी दिए जाता है...

'बदमाश, उसको ज्यादा परेशान मत करना'
'नहीं करेंगे. प्रॉमिस'
'ओके. आई लव यू'
'आई नो'
'बहुत बदमाश हो बाबा रे...आई लव यू टू बोलो'
'तुम कहते हो तो कह देते हैं, आई लव यू टू'

और इसके बाद भगवन अंतर्ध्यान हो गए. हम सोच रहे हैं कि सो जायें. और सोच रहे हैं कि कल अगर उसको फोन करेंगे...कल...जो कि उसका आज ही होगा तो क्या वो वाकई फ़ोन उठाएगा...या ये सब सपना था और हम आलरेडी सोये हुए हैं.

22 April, 2015

सांस की जादुई चिड़िया कलम में रहती थी

मेरा एक गहरा, डार्क किरदार रचने का मन कर रहा है. मेरे अंदर उसकी करवटों से खरोंच पड़ती है. उसके इश्क़ से मेरी कलम को डर लगता है.


वो जादूगर है. उसकी सुन्दर कलाकार उँगलियों में न दिखने वाली ब्लेड्स छुपी रहती हैं. वो जब थामता है मेरा हाथ तो तीखी धार से कट जाती है मेरी हथेली. गिरते खून से वो लिखता है कवितायें. वो बांहों में भरता है तो पीठ पर उगती जाती हैं ज़ख्मों की क्यारियाँ...उनमें बिरवे उगते हैं तो मुहब्बत के नहीं इक अजीब जिस्मानी प्यास के उगते हैं. वो करना चाहता है मेरा क़त्ल. मगर क़त्ल के पहले उसे उघेड़ देना है मेरी आँखों से मुहब्बत के हर मासूम ख्वाब को. उसकी तकलीफों में मैं चीखती हूँ तुम्हारा नाम...इक तुम्हारा नाम...तुम्हें हिचकियाँ आती हैं मगर इतनी दूर देश तुम नहीं भेज सकते हो सैनिकों की पलटन कि मुझे निकाल लाये किसी तहखाने से. मैं दर्द की सलाखों के पार देखती हूँ तो सुनाई नहीं पड़ती तुम्हारी हँसी.

वो जानता है कि मेरी साँसों की जादुई चिड़िया मेरी कलम की सियाही में रहती है...वो डुबा डालता है मेरे शब्दों को मेरे ही रक्त में...मुझमें नहीं रहती इतनी शक्ति कि मैं लिख सकूँ इक तुम्हारा नाम भी. धीमी होती हैं सांसें. वो मुझे लाना चाहता है सात समंदर पार अपने देश भारत किसी ताबूत में बंद कर के...मेरी धड़कनों को लगाता है कोई इंजेक्शन कि जिससे हज़ार सालों में एक बार धड़कता है मेरा दिल और साल के बारह महीनों के नाम लिखी जाती है एक सांस...उस इक धड़कन के वक़्त कोई लेता है तुम्हारा नाम और मेरा जिस्म रगों में दौड़ते ज़हर से बेखबर दौड़ता चला जाता है फोन बूथ तक...तुमसे बात कर रही होती है तुम्हारी प्रेमिका...उसने ही भेजा है इस हत्यारे को. आह. जीवन इतना प्रेडिक्टेबल हो सकता है. मुझे लगता था यहाँ कहानियों से ज्यादा उलझे हुए मोड़ होंगे.

वो जानता है मैं तुम्हारी आवाज़ सुन भी लूंगी तो हो जाउंगी अगले कई हज़ार जन्मों के लिए अमर. कि मेरे जिस्म के टुकड़े कर के धरती के जितने छोरों पर फ़ेंक आये वो, हर टुकड़े से खुशबु उड़ेगी तुम्हारी और तुम तक खबर पहुँच जायेगी कि मैंने तुमसे इश्क किया था. वो तुमसे इतनी नफरत करता है जितनी तुम मुझसे मुहब्बत करते हो. उसकी आँखों में एक उन्माद है. मैंने जाने क्यूँ उसका दिल तोड़ा...अनजाने में किया होगा.

कलम के पहले उसे छीननी होती है मेरी आवाज़...उस कानफाडू शोर में मैं सुन नहीं सकती अपनी आवाज़ भी...मैं जब पुकारती हूँ तुम्हें तो मेरे कलेजे का पोर पोर दुखता है...मेरी चीख से सिर्फ मेरी अंतरात्मा को तकलीफ होती है. बताओ. इश्क कितना यूजलेस है अगर उसके पार जीपीएस ट्रेकिंग का कोई जुगाड़ न हो. हिचकियाँ वन वे लेटर होती हैं. तुम्हें तो सबने दिल में बसा रखा है...हिचकियों का कोई मोर्स कोड तो होता नहीं कि मालूम चल जाए कि मैं तुम्हें याद कर रही हूँ.

मैं भूल गयी हूँ कैसा है मेरा नाम...ट्रांस म्यूजिक के अंतराल पर पड़ने वाले ड्रम बीट्स और आर्टिफिसियल वाद्ययंत्रों ने भुला दिया है मेरे दिल और साँसों का रिदम. मैं वो लम्हा भूलने लगी हूँ जब पहली बार तुम्हें देखा था...स्लो मोशन में...वक्त की सारी इकाइयां झूठी होने लगी हैं. वो मुझे खाने के साथ रोज़ पांच लोहे की जंग लगी कीलें देता है. मैं उन्हें निगलने की जितनी कोशिश करती हूँ उतना ही मेरा गला छिलता जाता है. जाने कितने दिन हुए हैं. शायद आँतों में इंटरनल ब्लीडिंग शुरू हो गयी हो. चलती हूँ तो भारी भारी सा लगता है. मैं कहीं भाग नहीं सकती हूँ. उसने राइटिंग पैड जैसे बना रखे हैं लकड़ी के फट्टे, छोटे छोटे. हर रोज़ मेरी एक ऊँगली में एक छोटा सा स्केल्नुमा फट्टा ड्रिल कर देता है. मैं अब तुम्हारा नाम कभी लिख नहीं पाऊँगी. कलम पकड़ने के लिए कोई उँगलियाँ नहीं हैं.

जैसे जैसे मरने के दिन पास आते जा रहे हैं...चीज़ें और मुश्किल होती जा रही हैं. कमरे में पानी का एक कतरा भी नहीं है. मैं सांस भी सम्हल के लेती हूँ...कि हर सांस के साथ पानी बाहर जाता है. गला यूँ सूखता है जैसे कीलें अभी भी गले में अटकी हुयी हों. मैं सोचती हूँ...तुम हुए हो इतने प्यासे कभी? कि लगे रेत में चमकती मृगतृष्णा को उठा कर पी जाऊं?

बहुत दिन हो गए इस शहर आये हुए...अफ़सोस कितने सारे हैं...सोचो...कभी एक और बार तुम्हें देखना था...तुम्हारे गले लगना था. तुम्हें फोन करके कहना था 'सरकार' और सुननी थी तुम्हारी हँसी. अभी खींचनी थी तुम्हारी तसवीरें कि तुम्हें मेरा कैमरा जब देखता है तो महबूब की नज़र से देखता है. मगर जल्दी ही आखिरी सांस ख़त्म और एक नया रास्ता शुरू. तुम्हें रूहों के बंधन पर यकीन है? पुनर्जन्म पर?

मुझे मर जाने का अफ़सोस नहीं है. अफ़सोस बस इतना कि जाते हुए तुम्हें विदा नहीं कह पायी. के तुम चूम नहीं पाये मेरा माथा. के मैं लौट कर नहीं आयी इक बार और तुम्हें गले लगाने को.

सुनो. आई लव यू.
मुझे याद रखोगे न. मेरे मर जाने पर भी?

28 March, 2015

दिल की कब्रगाह में इश्क़ का सुनहला पत्थर


मेरा दिल एक कब्रगाह है. इसके बाहर इक लाल रंग के बोर्ड पर बड़े बड़े शब्दों में चेतावनी लिखी हुयी है 'सावधान, आगे ख़तरा है!'. कुछ साल पहले की बात है इक मासूम सा लड़का इश्क़ में मर मिटा था. मैं जानती हूँ कि वो लड़का मुझे माफ़ कर देता...उसकी फितरत ही थी कुछ जान दे देने की...मुझपर न मिटता तो किसी वाहियात से इन्किलाब जिंदाबाद वाले आन्दोलन में भाग लेकर पुलिस की गोली खाता और मर जाता. वो मिला भी तो था मुझे आरक्षण के खिलाफ निकलने वाले जलसे में. बमुश्किल अट्ठारह साल की उम्र और दुनिया बदल देने के तेवर. क्रांतिकारी था. नेता था. लोग उसे सिर आँखों पर बिठाते थे. उसका बात करने का ढंग बहुत प्रभावी था. जिधर से गुज़रता लोग बात करने को लालायित रहते. फिर ऐसा क्या हुआ कि उसे बंद कमरे और बंद खिड़कियाँ रास आने लगीं? उसके दोस्तों को मैं डायन लगती थी...मैंने उसे उन सबसे छीन कर अपने आँचल के अंधेरों में पनाह दे दी थी...अब दिन की रौशनी में उसकी आँखें चुंधियाती थीं. उसके चेहरे का तेज़ अब मेरे शब्दों में उतरने लगा था...मैंने पहली बार जाना कि शब्दों में जान डालने के लिए किसी की जान लेनी पड़ती है. उनका अपना कुछ नहीं होता. जैसे जैसे मेरे शब्दों में रौशनी आने लगी, उसकी सांसें बुझने लगीं...उस वक़्त किसी को मुझे बता देना था कि इस तिलिस्म से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं आएगा मुझे. कि शब्दों की ऐसी तंत्र साधना मुझे ही नहीं मेरे इर्द गिर्द के सारे वातावरण को सियाह कर देगी. मगर ऐसे शब्दों के लिए जान देने वाला कोई न शब्दों को मिला था...न इश्क़ को...न लड़के को. वो मेरे दिल के कब्रगाह बनने का नींव का पत्थर था...वो जो कि मैंने उसकी कब्र पर लगाया था...मैंने उसपर अपनी पहली कविता खुदवाई थी. उस इकलौती कब्र के पत्थर को देखने लोग पहुँचने लगे थे. दिल की गलियां बहुत पेंचदार थीं मगर वहां कोई गहरा निर्वात था जो लोगों को अपनी ओर खींचता था...जिंदगी बहुत आकर्षक होती है...जिन्दा शब्द भी. 

उस लड़के की लाश मेरे दुस्वप्नों में कई दिनों तक आती रही. उसके बदन की गंध से मेरी उँगलियाँ छिलती थीं. कोई एंटीसेप्टिक सी गंध थी...डेटोल जैसी. बचपन के घाव जैसी दुखती थी. मुझे उसकी मासूमियत का पता नहीं था. मैं उसे चूमते हुए भूल गयी थी कि ये उसके जीवन का पहला चुम्बन है...खून का तीखा स्वाद मेरी प्यास में आग लगा रहा था...मैं उसे अपनी रूह में कहीं उतार लेना चाहती थी...उसकी दीवानी चीख में अपना नाम सुनकर पहली बार अपने इश्वर होने का अहसास हुआ था...उसने पहली बार में अपनी जिंदगी मुझे सौंप दी थी. पूर्ण समर्पण पर स्त्रियों का ही अधिकार नहीं है...पुरुष चाहे तो अपना सर्वस्व समर्पित कर सकता है. बिना चाहना के. मगर लड़के ने इक गलत आदत डाल दी थी. उस बार के बाद मैंने पाया कि मेरे शब्द आदमखोर हो गए हैं. कि मेरी कलम सियाही नहीं खून मांगती है...मेरी कल्पना कातिल हो गयी है. मैंने उस लड़के को अपनी कहानी के लिए जिया...अपने डायलॉग्स के लिए तकलीफें दीं...अपने क्लाइमेक्स के लिए तड़पाया और कहानी के अंत के लिए एक दिन मैंने उसकी सांसें माँग लीं. मुझे जानना था कि दुखांत कहानी कैसे लिखी जाती है. ट्रेजेडी को लिखने के लिए उसे जीना जरूरी था. लड़के ने कोई प्रतिरोध नहीं किया. मैं उसकी चिता की रौशनी में कवितायें लिखती रही. उसका बलिदान लेकिन मेरे दिल को कहीं छू गया था. मैं उसकी आखरी निशानी को गंगा में नहीं बहा पायी. 

उस दिन मेरे दिल में कब्रगाह उगनी शुरू हो गयी. वो मेरा पहला आशिक था. मुझ पर जान देने वाला. मेरे शब्दों के लिए मर जाने वाला. उसकी कब्र ख़ास होनी थी. मैंने खुद जैसलमेर जा कर सुनहला पीला पत्थर चुना. मेरी कई शामें उस पत्थर के नाम हो गयीं. जब उसके नाम का पहला अक्षर खोदा तभी से दिल की किनारी पर लगे पौधे मुरझा गए. बोगनविला के फूल तो रातों रात काले रंग में तब्दील हो गए. काले जादू की शुरुआत हो चुकी थी. कविता में चमक के लिए मैंने ऊँट की हड्डियों का प्रयोग किया. सुनहले पत्थर पर जड़े चमकीले टुकड़ों से उसकी बुझती आँखों की याद आती थी. उसकी कब्र पर काम करते हुए तो महीनों मुझे किसी काम की सुध नहीं थी. दिन भर उपन्यास लिखती और लड़के को लम्हा लम्हा सकेरती और रात को कब्र के पत्थर पर काम करती. नींद. भूख. प्यास. दारू. सिगरेट. सब बंद हो गयी थी. जादू था सब. मैं इश्क़ में थी. मुझे दुनिया से कोई वास्ता नहीं था. 

पहला उपन्यास भेजा था एडिटर को. उसे पूरा यकीन था कि ये बहुत बिकेगा. मार्केट में अभी भी वीभत्स रस की कमी थी. इस खाली जगह को भरने के लिए उसे एक ऐसा राइटर मिल गया था जिसके लिए कोई सियाही पर्याप्त काली नहीं थी. लड़की यूँ तो धूप के उजले रंग सी दिखती थी मगर उसकी आँखों में गहरा अन्धकार था. एडिटर ने लड़की को काला चश्मा पहनने की सलाह दी ताकि उसकी आँखों की सियाही से बाकी लोगों को डर न लगे. वो अपने कॉन्ट्रैक्ट पर साइन करने लौट रही थी जब लड़के के दोस्त उसे मिले. उनकी नज़रों में लड़की गुनाहगार थी. उनकी आँखों में गोलाबारूद था. वे लड़की के दिल में बनी उस इकलौती कब्र के पत्थर को नेस्तनाबूद कर देना चाहते थे. लड़की को मगर उस लड़के से इश्क़ था. जरूरी था कि कब्रगाह की हिफाज़त की जाए. उसने मन्त्रों से दिल के बाहर रेखा खींचनी शुरू की...इस रेखा को सिर्फ वोही पार कर सकता था जिसे लड़की से इश्क़ हो. इतने पर भी लड़की को संतोष नहीं हुआ तो उसने एक बड़ा सा लाल रंग का बोर्ड बनाया और उसपर चेतावनी लिखी 'आगे ख़तरा है'.

दिल के कब्रगाह में मौत और मुहब्बत का खतरनाक कॉम्बिनेशन था जो लोगों को बेतरह अपनी ओर खींचता था. लोग वार्निंग बोर्ड को इनविटेशन की तरह ले लेते थे. चूँकि उनके दिल में मेरे लिए बेपनाह मुहब्बत होती थी तो वे अभिमंत्रित रेखा के पार आराम से आ जाते थे. इस रेखा से वापस जाने की कोई जगह नहीं होती लेकिन. वे पूरी दुनिया के लिए गुम हो जाते थे. न परिवार न दोस्त उनके लिए मायने रखते थे. वे मेरे जैसे होने लगते थे. इश्क़ में पूरी तरह डूबे हुए. मैंने कब्रगाह पर एक गेट बना दिया कि जिससे एक बार में सिर्फ एक दाखिल हो सके मगर ये थ्रिल की तलाश में आये हुए लोग थे. इन्हें दीवार फांद कर अन्दर आने में अलग ही मज़ा आता था. इश्क़ उसपर खुमार की तरह चढ़ता था. अक्सर इक हैंगोवर उतरने के पहले दूसरी शराब होठों तक आ लगती थी. ये अजीब सी दुनिया थी जिसमें कहीं के कोई नियम काम नहीं करते. मुझे कभी कभी लगता था कि मैं पागल हो रही हूँ. वो रेखा जो मैंने दुनिया की रक्षा के लिए खींची थी उसमें जान आने लगी थी. अब वो मुझे बाहर नहीं जाने देती. सारे आशिक भी इमोशनल ब्लैकमेल करके मुझे दुनिया से अलग ही रखने लगे थे.

इक दुनिया में यूँ भी कई दुनियाओं का तिलिस्म खुलता है. ऐसा ही एक तिलिस्म मेरे दिल में है...ये कब्र के पत्थर नहीं प्रेमगीत हैं...प्रेमपत्र हैं...आखिरी...के इश्क का इतना ही अहसान था कि किसी के जाने के बाद उसकी कब्र पर के अक्षर मेरी कलम से निकले होते थे. हर याद को बुन कर, गुन कर मैं लिखती थी...इश्क़ को बार बार जिलाती थी...उन लम्हों को...उन जगहों को...सिगरेट के हर कश को जीती थी दुबारा. तिबारा. कई कई कई बार तक.

तुम्हें लगता होगा कि तुम अपनी अगली किताब के लिए प्रेरणा की तलाश में आये हो...मगर मेरी जान, मैं कैसे बता दूं तुम्हें कि तुम यहाँ अपनी कब्र का पत्थर पसंद करने आये हो...अपनी आयतों के शब्द चुनने...तुम मुझे किस नाम से बुलाओगे?

डार्लिंग...हनी...स्वीटहार्ट...क्या...कौन सा नाम?

और मैं क्या बुलाऊं तुम्हें? जानां...
काला जादू...तिलिस्म...क्या?

12 March, 2015

उसके घर का नाम था 'अलविदा'


इक खोया हुआ देश है जिसके सारे बाशिंदे शरणार्थी हो गए हैं. कहीं कोई टेंट नहीं है कि लोगों को जरा भी ठहराव का अंदाज़ हो. मैदान में दूर दूर तक कतार लगी है. सब लोग बिखरे हुए पड़े हैं. जैसे अचानक से गिर पड़ी हो कोई सलीके से बनायी गयी लाइब्रेरी और सारी किताबें बेतरतीब हो जाएँ. 

अचानक से उग आये इस देश में कुछ भी अपनी जगह पर नहीं है. स्कूल की जगह हथियार बनाने की फैक्ट्री, बेकरी की जगह ईंटों की भट्ठी और बंदरगाह की जगह ज्वालामुखी उगे हुए हैं. इसी जगह वे अपना जरा सा आसमान तलाशने चले आये थे. उन्हें क्या पता वहां आसमान की जगह एक खारे पानी का झरना था. वे घंटों भीगे हुए इन्द्रधनुष का कोना तलाशते रहते कि जिसे थाम कर वे इस देश से बाहर निकल सकें. 

उन्हें कोई तलाशता नहीं था. वहां कोई लिस्ट नहीं थी कि जिसमें गुमशुदा लोगों की रिपोर्ट दर्ज हो. भीगे हुए उन्हें सर्दी लगनी चाहिए थी मगर उन्होंने देखा एक दूसरे की आँखों में और हँस पड़े. जहाँ बुखार होना था वहां इश्क होने लगा. वे नमकीन झरने में भीगते हुए छुप्पम छुपायी खेलने लगे. लड़के ने सूरज का टॉर्च बनाया और गहरे गोता मार गया...जब उसकी सांस ख़त्म हुयी तो लड़की की आँखें चाँद जैसी चमक रही थी. 

उनके बीच बस खारे पानी का झरना था. धीरे धीरे वे दोनों गोता मारने लगे. आजकल वे महीनों गुम हो जाते. उस नए देश में फरवरी के दी छोटे होते होते एक दिन गायब हो गए. अब वहां ग्यारह महीने का साल होने लगा. अब लड़की परेशान थी कि उसे अब इन्द्रधनुष ही नहीं फरवरी की भी तलाश करनी थी. उसे गुम होती चीज़ों से डर लगता था. वो लड़के को लगाती थी भींच कर गले...उसे लगता था लड़का गुम हो जाएगा. वो खारे पानी से लिखती थी इबारतें. अब लड़की उसे अपने दुपट्टे की छोर में बाँध कर रख लेना चाहती थी. ऐसे ही किसी रोज़ उसने दुपट्टे की छोर में एक चाभी बाँध ली. उस दिन से वो एक घर की तलाश भी करने लगी. बराई सी घूमती थी और खाली जमीन के प्लाट पर टिक लगाती फिरती थी. घर की तलाश में वो दोतरफा बंट जाती और टूटने लगती. एक मन लड़के के साथ आसमान के खारे, उथले झरने में भीगता हुआ इन्द्रधनुष तलाशता तो एक मन बार बार दुपट्टे में बंधी चाभी पर खुरच कर घर का नाम लिखना चाहता 'अलविदा'.

लड़का उससे झगड़ता. कौन रखता है घर का नाम अलविदा. तुम कुछ स्वतं जैसा लिखो वरना इस घर आने को किसका दिल चाहेगा. लड़की मगर उलटबांसी चलती थी. उसने अलविदा कह कर लोगों को दिल में और गहरे बस जाते देखा था. यह नया बना देश था...यहाँ कुछ भी अपनी जगह पर नहीं था. लोग लड़की के घर को सराय की तरह इस्तेमाल करने लगे. वहां दस दिशाओं से आती थी...हवा...मुहब्बत...और कहानियां भी. 

इक रोज़ लड़की के दुपट्टे से चाभी गुम हो गयी. वो अपने घर के बाहर खड़ी टुकुर टुकुर ताकती. सोचती अपने घर में मुसाफिर की तरह जाना कैसा होगा. और क्या घर उसे पहचानेगा भी? घर की दीवारें मगर इश्क की बनीं थीं, वे लड़की की उँगलियों की खुशबू पहचानती थीं. लड़की ने कितनी बार बनायी थी अप्लाना और चौखट पर लिखा था स्वागतम. फिर उसने फेंके सारे गैरजरूरी लोग बाहर. वो घर के बाहर आई तो उसने देखा कि इन्द्रधनुष दहलीज़ पर टिका था, शरारत से झांकता हुआ. 


अब बस लड़के का इंतज़ार था. उसकी बाँहों में भी एक घर था. घर जो हमेशा से होता है. लड़की इस घर की चाह में मिट रही थी. लड़का राह भूल गया था. लड़की अलविदा में ठहरी थी. 

04 March, 2015

इक आखिरी कहानी का इश़्क

उसे किताबों से डर लगता था. किताबों में प्रेत होते थे. लम्बी दाढ़ियों, बिखरी जटाओं और बढ़े लम्बे नाखूनों वाले. वे उसे किताब में बंद कर देना चाहते थे. 

लड़की शब्दों से भागते चलती मगर किताबें उसे नहीं बख्शतीं. उन्होंने उसपर निशान लगा दिया था. लड़की जहाँ भी जाती, किताबें उसका पीछा करते हुए पहुँच जातीं. किताबों में तिलिस्म हुआ करते...तिलिस्मों के दरवाजे...दरवाजों के पहरेदार कि जो लड़की के दुपट्टे की गंध सूंघते पहुँच जाते और उसके दुपट्टे का छोर पकड़े उसे पीछे पीछे चलते. 

शब्द उसे कभी भी दबोच लेते. पुरानी किताबों के पुराने प्रेतों को उसके दिमाग का पूरा नक्शा मालूम रहता. वो कितना भी किसी शहर की भूलभुलैया में छुपी बैठी रहती वे उस तक पहुँच जाते. पुरानी बावलियों...स्टेशनों...गुम हुए पुराने गाँवों में उसे जा धरते.

लड़की भागती फिरती...किसी शहर. गाँव. ठांव. नहीं ठहरती. मगर किताबें उसे चैन से जीने नहीं देती. बूढ़े बरगदों में रखे कोटरों से उग आतीं प्रेतों की लम्बी उँगलियाँ और लड़की की रातों को जकड़ लेतीं. घुप शहरों के गुम अंधेरों में उड़ने लगती छपे हुए पन्नों की ताज़ा गंध और लड़की उन कातिल बांहों में जाने के लिए बेताब हो उठती. फड़फड़ाने लगता मजार पर बंधा चूनर का टुकडा कि लड़की के पैर बाँधने को बस एक वही दुआ काम करती थी. लड़की बेबस हो जाती. उसके पैर रुनझुन रुनझुन थिरकने लगते. उसकी उँगलियाँ उसके बदन का पन्ना पन्ना पलटने लगतीं. उसकी छटपटाहट दुनिया की सारी लाइब्रेरीज में भूकंप के झटके ले आती...कभी कभी तो ऐसा भी होता कि धरती फट जाती और सारी किताबें उसमें दफ्न हो जातीं. कभी कभी रेत का अंधड़ उसके शहर की सारी किताबें उड़ा कर ले आता और अगली सुबह शहर में पश्चिम की ओर एक ऊंचा टीला बन जाता. लोग कभी न समझ पाते कि शहर की किताबों के गुम होने और रेत के टीले के उग आने के बीच क्या रहस्य है. बहुत सालों बाद जब दीमकों ने सारी किताबों को धूल कर दिया होता एक दिन रेत का टीला गायब हो जाता. वैसे ही जैसे कि आया था. लोग बरसों किताबों को ढूंढते फिरते. यूँ लोग बरसों उस लड़की को भी ढूँढा करते थे. मिलता मगर कोई न था. 

किताबें जादू हुआ करती थीं. एक ज़माने में किताबों का हर पन्ना मरहम का एक फाहा था जो उसके छिले घुटने और नील पड़ी कोहनियों को ठीक कर दिया करता था. नए पन्नों की गंध एनेस्थीसिया का काम करती और वो नन्ही, मासूम लड़की अपनी सारी तकलीफें भूल जाती. उन दिनों किताबों में हुआ करते थे दिलफरेब किरदार कि जो उसकी तन्हाइयों की दवा करते. लड़की दिन रात उसी दुनिया में रहना चाहती. वो पढ़ने का वक़्त अपनी नींद से, खाने के समय से और अपनी साँसों से चुरा लेना चाहती थी. 

जैसे जैसे उसकी उम्र बढ़ी लड़की ने छिली कोहनियों और घुटनों के दर्द में अलग ही सुख तलाशना शुरू कर दिया. ये दिल टूटने के दिन थे. ये मुहब्बत में होने के दिन थे. लड़की को किताबों से ज्यादा उन हाथों का इंतज़ार रहने लगा जो उसके लिए दुनिया भर की किताबें लाया करते थे. उस लम्बे, गोरे लड़के के हाथ बेतरह खूबसूरत थे. अनामिका ऊँगली में एक नीले पत्थर की अंगूठी थी. ये अंगूठी उन दोनों की किताबों के तिलिस्म से रक्षा करती थी. लड़की ने उस साल अपनी जिंदगी में सबसे ज्यादा किताबें पढ़ीं जिनका एक अक्षर भी उसे याद नहीं है. याद है तो सिर्फ अंगूठी के उस नीले पत्थर की ठंढी छुअन. 

धीरे धीरे उन हाथों में आने वाली किताबें कम होती गयीं और एक शाम ऐसी भी आई कि लड़के के हाथ में सिर्फ लड़की का हाथ रह गया. उसने बड़ी नजाकत से लड़की की उँगलियाँ चूम लीं और फिर बड़ी बेरहमी से लड़की के होठ. वे लड़के के घर की लाइब्रेरी में गए और उन्हों एक दूसरे की जिल्दें उघाड़ डालीं और चिन्दियाँ बिखेर दीं. किताबों ने उनकी इस बेवफाई के कारण उन पर उम्र भर की सजा मुक़र्रर कर दी.

उस कमसिन उम्र में उन्हें किताबों के बीच चली साजिशों का पता तक नहीं चला. वे अपनी पहली मुहब्बत में थे. उन्हें मालूम नहीं था कि किताबें बेरहमी की हद तक पजेसिव भी हो सकती हैं. लड़की किताबों की सिर्फ जिल्द देखती. हर्फों की जगह उसे लड़के के हाथ दिखते. उसके बदन में किसी नयी किताब के पन्नों की फड़फड़ाहट भर गयी थी. वो हर लम्हा चाहती थी कि लड़का उसे खोले, सहलाए, सूंघे...बदन की पसंदीदा जगहों को गहरा लाल अंडरलाइन करे. लड़का भी दीवाना हुआ करता. बुकमार्क्स तलाशता. लड़की के बदन पर जगह जगह लौट आने के निशान रखता जाता. काँधे का काला तिल. पीठ पर लगा टूटी चूड़ी के ज़ख्म का निशान. नाभि पर चमकती नग. लड़का उसके बदन में कहीं रह जाना चाहता कि जैसे किताब के पहले पन्ने पर लिख दिया करता था अपना नाम और तारीख. 

लड़के को मालूम था उन दिनों भी कि अच्छी किताबें और अच्छी लड़कियां किसी एक की नहीं होतीं. उनपर सबका बराबर हक होता है. कोई भी उसे माँग कर ले जा सकता है...न कहने पर चुरा कर ले जा सकता है…या कि छीन कर भी ले जा सकता है. उस सांवली सी लाल रंग की जिल्द वाली किताब को इक रोज़ उसकी अनुपस्थिति में उसका पड़ोसी उठा ले गया. लड़का जानता था कि किताब अब बहुत साल बाद कभी लौट कर वापस आएगी और उस पर जगह जगह अनजान लोगों के बनाये हुए निशान होंगे...मुड़े हुए पन्ने होंगे और वाहियात किस्म की बातें लिखी होंगी. लड़के ने किसी नयी किताब से दिल लगाने को लाइब्रेरी की सीढ़ी उठायी और सबसे ऊपर वाली रैक में रखी जिल्द वाली काली किताबों को देखने लगा. ये घर का सबसे सुदूर कोना था जहाँ तक पहुँच नामुमकिन तो नहीं पर इतना मुश्किल था कि उसने कभी उन किताबों को पढ़ने को सोचा भी नहीं था. 

पहली किताब की काली जिल्द छूते ही उसे काले जादू का अहसास हुआ था. कि इन किताबों में कुछ वर्जित सुख हैं जिन तक शायद उसे नहीं पहुंचना चाहिए. मन का एक हिस्सा भी कोरा होता तो शायद वह उस किताब को बंद कर के रख पाता मगर मन के सारे सफहों पर लड़की के लगाए लाल निशान थे. उसने पहला पन्ना पलटा तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गयीं. किताबों का बदला यूँ कहर ढाएगा ये उसने कब सोचा था. दुनिया की नज़रों से दूर, बंद लाइब्रेरी में उसके और लड़की के बीच जो कुछ पहली बार घटित हुआ था, ये इतना व्यापक और पुरातन है उसे अंदाज़ नहीं था. वात्सायन के सचित्र कामसूत्र के पन्ने पलटते हुए उसे महसूस भी नहीं हुआ कि उसकी उँगलियाँ छिल रही हैं. वे पन्ने सरेस पेपर के बने थे. उनका आकर्षण छिलने के दर्द से और बढ़ता ही जा रहा था. 

लड़की की तकलीफ दूसरे किस्म की थी. वो मुस्कुराते हुए उस लड़के के साथ उस शाम चली तो आई थी मगर उसके दुस्वप्नों में वही नीली अंगूठी की ठंढी छुवन आती रहती. इस लड़के का नाम विसाल था. विसाल के घर में सारी सेकेंड हैण्ड किताबें थीं. मुड़ी तुड़ी. हजारों बार इस्तेमाल की गयीं और बेपरवाही से फेंकी गयीं. यूँ लड़की भी नयी नहीं थी मगर उसे लड़के ने इतना सहेज के रखा था कि उसके कुछ पन्नों से अभी भी नयेपन की खुशबू आती थी. लड़की को विसाल से डर लगता. वो वापस लड़के की लाइब्रेरी में लौट जाना चाहती लेकिन विसाल ने उसके पहले पन्ने पर अपना नाम लिख दिया था. होठों से बहता खून पोंछती हुयी लड़की जानती थी कि अब वो शायद कभी उस लाइब्रेरी की जिल्द लगी किताबों के पास नहीं जा पाएगी. उसकी जिंदगी किसी कबाड़ी के पास २० रुपये किलो में बिकने वाली किताबों जैसी ही होने वाली है. किसी को फर्क नहीं पड़ेगा कि उसके अन्दर क्या लिखा है...सिर्फ बाहरी आवरण...उसकी फिगर...उसकी आँखें और उसके कटाव का वजन होगा. 

उस रात लड़की फूट फूट कर रोई. लौट कर वापस जाने को न किताबें थी. न लड़का. बहुत देर रात उसने आँसू पोछे और पैकिंग शुरू कर दी. अगली सुबह वो किसी नए शहर में किसी नए दर्द की दुनिया तलाशने निकल पड़ी थी. बचपन से पढ़ी किताबों ने उसे इतना सिखाया था कि इस बड़ी दुनिया में उसे रहने को न छत की कमी होती न कभी पैसों की किल्लत. उसे तकलीफ सिर्फ अपनी उस दुनिया के छिन जाने की थी जिसने उसे बचपन से बड़ा सहेज और सम्हाल के रखा था. लड़की को लगा था कि एक बड़ा शहर शायद किताबों के न होने के स्पेस को भर सके और उसे जीने की और वजहें दे सकेगा. उसका झुकाव संगीत की तरफ होता गया. उसने जाना कि संगीत की भी एक अलग दुनिया है जहाँ तकलीफों को नदी में बहाया जा सकता है. वो हौले हौले बहने लगी. वक़्त गुज़रते उस मद्धम नदी के साथ रिषभ उसकी जिंदगी में आया. संगीत का दूसरा स्वर. जीवन का दूसरा प्रेम.

किताबों ने लड़की के धोखे को मगर अपनी जिल्द में उम्रकैद दी. लड़की गश खा कर गिरी जिस दिन उसने पड़ोस की बुक स्टाल पर से किताबें खरीदते वक़्त अपनी नग्न तस्वीर एक किताब के कवर पर देखी. एक कमजोर लम्हे का विसाल उसकी जिंदगी का ऐसा सियाह चैप्टर लिख जाएगा उसने कहाँ सोचा था. कम उम्र की अपनी बेवकूफियां होती हैं जिनकी सजाएं अक्सर गुनाहों से कहीं ज्यादा बड़ी होती हैं. लड़की का दिल विसाल ने नहीं किताबों ने तोड़ा था. उसकी बचपन से की गयी मुहब्बत को दरकिनार करके किताबों ने उसकी एक लम्हे की बेवफाई चुनी. 

उस रोज़ से लड़की ने किताबों से अपना उम्र भर का नाता तोड़ दिया...दूसरी मुहब्बत...दूसरा शहर और दूसरा स्वर दरकिनार करके फिर एक नए शहर को निकल पड़ी लड़की. वो बचपन से किताब बन कर एक खूबसूरत लाइब्रेरी में रहना चाहती थी मगर अब उसे अपने लिए नया मकान तलाशना था. उसने नील नदी किनारे बसा एक गाँव चुना जहाँ के शब्द उसे समझ नहीं आते. जहाँ की भाषा उसे समझ नहीं आती. जहाँ की किताबें उससे बदला लेने का ख्वाब नहीं बुनतीं. 

मगर फिर भी बिजनेस के सिलसिले में जब भी उसका कहीं बाहर आना होता है किताबें उसे घेर कर मारने के प्लान्स बनाती हैं...लड़की को किताबों से डर लगता है लेकिन कभी कभी किसी खूबसूरत कवर वाली किताब को देखती है तो लेखक के नाम पर हौले से फिराती है उँगलियाँ और याद करती है उसी लड़के को...नीले पत्थर की ठंढी छुअन को और पढ़ती है दुआ कि किसी को उससे कभी इतना प्यार हो कि अपनी कहानी में उसका खून लिख सके. वो मांगती है खुदा से एक कहानी का इश्क कि जिसके आखिर में वो डूब कर मर सके कि उसकी मुक्ति किसी कहानी में मर जाने में ही है. 

किसी लड़के में नहीं है ऐसी ताब कि कर सके उससे इश्क और लिख सके उसकी कहानी और क़त्ल कर सके उसका अपनी बांहों में भर कर. इसलिए मैं डूबती गयी हूँ उसके इश्क़ में...अब मुझे कहीं लौट कर नहीं जाना...कि ख़त्म हो गयी है कहानी...लड़की और मैं...

जरा उस लड़के से जा गुजारिश कर दो...आईने में देखो अपनी आँखें...चूमो अपनी उँगलियाँ...और कहो आमीन...

20 February, 2015

उन्निस फरवरी सन् दो हजार पंद्रह। दिल्ली।

जिंदगी की अपनी हैरतें हैं. आड़ी तिरछी गलियों से गुज़रती हुयी लड़की अक्सर सोचती कि इन मकानों में कैसे लोग रहते होंगे. इन जाली लगी खिड़कियों के पीछे वो कौन सा खजाना छुपा रहता होगा कि दिन भर खोजी आँखें रखने वाली बूढ़ी औरतें इन खिड़कियों से सटे हुए बरामदों में ताक झाँक करती रहती हैं. वहां की बालकनियों में दम घुटता था. लड़की अब इन सब से दूर खुली हवा वाले अपने शहर तक लौट जाना चाहती थी. 

उसे कहीं जाना न था. न किसी शहर. न किसी की बांहों में. फिर भी जब वो पास होता तो एक शहर उगने लगता उसकी आँखों में. इस शहर का तिलिस्म सब लड़की के दिल में था. लड़की की कल्पनाओं में बड़े चमकीले रंग थे. बड़े सुहाने लोग. यहाँ इंतज़ार सी रातें नहीं थीं. सब चाहना पर मिल जाने वाला हुआ करता था. इस शहर में कभी बिछड़ना नहीं होता था. मगर ये शहर दुनिया को रास नहीं आता था. जब भी वे इस शहर की निशानियाँ पाते, वहां दंगा करवा देने की साजिशें बुनते. सटे हुए मकानों में चुपके चुपके बनाये हुए घरेलू बम फेंका करते. सिर्फ जरा से केरोसीन और कुछ और तत्वों को मिला कर एक शीशे की बोतल में डाल देना होता था बस. ये वो बोतलें हुआ करती थीं जिनमें आला दर्जे की शराब रखी होती थी. लड़की की ख्वाहिशों में इन खाली बोतलों में लिखने को चिट्ठियां थीं. दंगे में लगी आग में सारी चिट्ठियों के पते जल गए थे. आग बुझाने के लिए नदी से पानी लाना पड़ता था मगर नदी का सारा पानी लड़की की आँखों ने सोख लिया था. यूँ आग तो रेत से भी मिट जाती मगर उसमें बहुत वक़्त लग जाता. लड़की ने किताब बंद की और शहर को हमेशा के लिए भुला दिया. 

मगर जिंदगी. घेर कर मारने की साजिशें रचती है. इक रोज़ इक सादा सी दिखने वाली किताब में उस शहर का दरवाजा खुल गया. लड़की बेख्याली में चल रही थी उसने ठीक ठीक देखा नहीं कि वो किस शहर में दाखिल हो रही है. यूँ भी ख़त्म तो कुछ भी कभी भी नहीं होता. अब शहर में कुछ नहीं बचा था. लेकिन फिर भी धुआं बदस्तूर उठ रहा था. फूलों की क्यारियों में किसी के जले हुए दिल की गंध उग रही थी. चाह से आ जाने वाले लोगों के पैर काट दिए गए थे और वे घिसट रहे थे. राहों में चीखें थीं मगर हवा में बिखरती हुयी नहीं हेडफोन से सीधे कान और दिल में उतरती हुयी. लड़की के इर्द गिर्द शोर एकदम नहीं था इसलिए उसे साफ़ सुनाई पड़ता था जब वो देर रात के नशे में उसका नाम पुकारता. लड़की उसके लिखे हर शब्द, हर वाक्य, हर किरदार को तोड़ कर अपना नाम ढूंढती और जब उसे नहीं मिलता कोई भी दिलासा तो वो कान से हेड फोन निकाल देती और बहुत तेज़ तेज़ स्केटिंग करती. रोलर ब्लेड्स वाले स्केट्स काले रंग के हुआ करते और खुदा के सिवा किसी को दिखाई नहीं पड़ता कि वो क्या कर रही है. खुदा के क्लोज्ड सर्किट कैमरा में हाई ऐंगिल शॉट में दिखता कि वो फिर से उसका नाम लिख रही है...नृत्य की हर थाप में...तेज़ और तेज़ गुज़रते हुए शहर के मलबे को विभक्त करती लड़की खुद नहीं जानती थी कि उसे क्या चाहिए. 

उसके सिरहाने सूखे गुलाबों की किरमिच किरमिच गंध थी जो पीले रंग के इत्र में डूबे हुए थे. लड़की का दिल मगर खाली था कि उसे सारे दोस्त उसे ठुकरा के चले गए थे इश्क वाले किसी शहर. वो रोना चाहती थी बहुत तेज़ तेज़ मगर उसे अकेले रोने से डर लगता था. 

वो उसे सिर्फ एक बार देखना चाहती थी. मगर खुदा के स्पाईकैम से दूर...वो ये भी चाहती थी कि उससे मिलना कुछ ऐसे हो कि वो खुदा को उलाहना दे सके कि ये मुलाकात तुमने नहीं मैंने खुद लिखी है. लड़की जब भी क्वाइन टॉस करती तो हमेशा हेड्स चुनती कि हेड्स पर लिखा होता 'सत्यमेव जयते'. उसे लगा जिंदगी मे न सही कमसे कम किस्मत में तो सच की जीत हो. तो उसने कहा हेड्स और सिक्के को उछाल दिया. सिक्का गिरा तो उसपर १ लिखा हुआ था और थम्स अप का निशान था. लड़की ने भी ऊपर वाले को ठेंगा दिखाया और उससे मिलने चली गयी. 

तकलीफों को गले लगाने वाले लोग होते हैं. बेचैनियों से इश्क करने वाले भी. घबराहट में डूबे. साँस साँस अटकते. किसी शहर के इश्क में पागल होते. उनकी आँखों में सियाह मौसम रहते हैं. बस उनकी हँसी बड़ी बेपरवाह होती है. वे दिन भर खुद को बाँट देते हैं पूरे शहर शहर...घर लौटते हुए रीत जाते हैं. फिर उनकी सुनसान रातों में ऐसा ही संगीत होता है कि खुद को जान देने से बचा लेना हर दिन का अचीवमेंट होता है. 

लड़की सुबह के नीम अँधेरे में बहुत फूट फूट कर रोना चाहती है कि उसे डर लगता है. सियाह अँधेरे से. खालीपन से. इश्क से. नीम बेहोशी से. उसके नाम से. उसकी आँखों से. उसके हाथों से. उसके काँधे में गुमसी हुयी खुशबू से. उसकी जेब में अटकी रह आई आपनी साँसों से. उसकी बांहों में रहते हुए कहे झूठमूठ के आई लव यू से. सियाह रंग से. उससे मिलने से. अलविदा कहने से. डरती है वो. बहुत. बहुत. बहुत. न तो खुदा न शैतान ही उसे अपनी बांहों में भर कर कहता है कि सब ठीक हो जाएगा. 

हम जी कहीं भी सकते हैं मगर हम कहाँ जिन्दा रहते हैं वो शहर हमें खुद चुनना पड़ता है और जब ये शहर मौजूद नहीं होता तो इस शहर को हमें खुद बनाना पड़ता है. कतरा कतरा जोड़ कर मकान. नदी. समंदर. लोग. दोस्तियाँ. मुहब्बत. मयखाने. जाम. बारिश. सब.

जब ये सब बन जाता है और वो शहर हमारे लिए परफेक्ट हो जाता है. तब हम किसी अजनबी शहर में जा कर आत्महत्या करना चाहते हैं. 

उसने मेरी आँखों में देख कर कहा मुझसे. ही नेवर लव्ड मी. मुझे उसके सच कहने की अदा पर उससे फिर से प्यार हो आया.
 
शहर खतरनाक था. उस तक लौट कर जाना भी. बुरी आदतों की तरह. सिगरेट का कश उसने अन्दर खींचा तो रूह का कतरा कतरा सुलग उठा. लड़की तड़प उठी. तकलीफों की आदत ख़त्म हो गयी थी पिछले कई सालों में. 

जाते हुए लड़की ने शहर के दरवाजे पर पासवर्ड लगा दिया और खुद को भरोसा दिलाया कि पासवर्ड भूल जायेगी. नाइंटीन फेब्रुअरी टू थाउजेंड फिफ्टीन. 

उसने खुद को कहीं भुला देना चाहा. कई सारे नक्शों को फाड़ देने के बाद उसे याद आया कि सब बेमानी है कि उसे उसका फोन नंबर याद था. 

उसका सुसाइड नोट उसके स्वभाव से एकदम इतर था. छोटा सा. सिर्फ एक लाइन का.  'तुम कोई अपराध बोध मत पालना. मैंने तुम्हें सिर्फ अपने लिए चाहा था'. 

12 February, 2015

किसकी हँसी का अबरख है...मेरी शामों को चमकाता हुआ


उसकी ख़ुशी लोगों की आँखों में चुभती थी जैसे जेठ की धूप. वे उमस और पसीने से भरे दिन थे कि जिसे मेहनतकश लोग अपने अपने वातानुकूलित दफ्तरों में बैठ कर बड़ी मुश्किल काटा करते थे. वे बॉस के डांट खा कर खिसियाये हुए घर लौटने के दिन थे. उन दिनों उनकी महँगी कारों में धूप से बचने के लिए परदे नहीं लगे थे. उसपर वो लड़की की चौंधियाने वाली हंसी जैसे हाई बीम पर हाइवे में आती गाड़ी...आँखें बंद बंद हुयी जाती थीं कि नहीं देखा जाता था इस तरह किसी का सुख.

उसमें शर्म नाम की कोई चीज़ नहीं थी...उसे बचपन में नहीं सिखाया गया था कि लड़कियों को ठहाके नहीं मारने चाहिए. बचपन में उसे ये भी नहीं बताया गया था कि दिलों से खेलना एक बुरा खेल है. इस खेल के खतरनाक खतरे हैं. वो बेपरवाह थी. अल्हड़ और बेलौस. छत पर बैठ जाती हाथों में आइना लिए और गली से जाते सारे लड़कों की आँखों में चौंधती रहती धूप. ऐसे ही में एक दिन वो लड़का मोड़ पर तेज़ रफ़्तार बाईक उड़ाता आ रहा था कि टर्न पर जैसे ही बाईक घूमी कि धूप के टुकड़े से उसकी आंखें बंद हो गयीं...तीखे मुड़ कर बाइक गिरी और स्किड करती हुयी ठीक उसके घर के दरवाजे पर जा टकराई. शोर बहुत ज्यादा था मगर लड़की का ठहाका इस सब के बावजूद सबके कानों में चुभ रहा था. वे उसके हँसते चेहरे पर एसिड फ़ेंक देना चाहते थे कि लड़की के जिंदगी के इसी हिस्से पर उनकी पकड़ थी...उसका शरीर...उसकी रूह तक वे पहुँचने की सोच भी नहीं सकते थे. मोहल्ले के लड़के उसे घेर कर रगेद देने के दुस्वप्नों में जीते थे. मोहल्ले के अधेड़ उसे किसी अँधेरे कोने में फुसला कर घर ले आने के बहकावे में. बची मोहल्ले की औरतें. वे बस चाहती थीं कि जल्दी से किसी ऊपर से रईस दिखने वाले घर में इसका ब्याह हो जाए, मगर असल में उसका ससुराल इतना गरीब हो कि उससे बर्तन मंजवाये जायें, चादरें धुलवाई जायें और सुबह शाम कमसे कम सौ रोटियां गिन कर बनवाई जायें. फिर वे उसके मायके की हमदर्द बन कर उसे संदेसा भेजें..क्या हुआ पारो अब तुम्हारी हंसी नहीं गूंजती. सारी औरतें मन्नत मांगें कि ससुराल वाले उसे आग लगा कर मार डालें ताकि उसके पति की दूसरी शादी में भर भर प्लेट खाना खाते हुए वे उस मरी हुयी को कुलच्छनी और बाँझ कहते हुए अपने कलेजे की आग को ठंढा कर सकें. किसी की बेख़ौफ़ हंसी में बहुत धाह होती है. उससे पड़े हुए छाले ऐसे ही फ्री की शादी की पार्टी में खाए अनगिनत आइसक्रीम के कप्स से ठंढक पाते हैं.

गड़बड़ ये थी कि उसके पूरे मोहल्ले में किसी ने पिछले कई सारे जन्मों तक कोई पुण्य नहीं किया था कि उनके ऐसे भाग खुलते. ऐसे लड़की तो जिस मिट्टी में पैदा होती है वहाँ अगले पच्चीस सालों तक कुछ ढंग का नहीं उगता. खलिहानों में पाला पड़ जाता है. उसके लड़कपन तक पहुँचते पहुँचते गाँव मोहल्ले के लड़के उसके इश्क में पागल हो कर एक दूसरे को मार काट डालते हैं मगर उसकी हँसी तक लहू का एक कतरा भी नहीं पहुँचता. दुखियारी माएँ उसे सरापते सरापते उम्र से पहले बुड्ढी खूसट हो जाती हैं.

वो कोरी सड़कों पर अपनी हंसी बिखेरती चलती. उसके अल्हड़पने पर सिर्फ सड़क और पेड़ों को प्यार आता. आता जाता हर कोई उसे कौतुहल से देखता था. उदास चेहरों वाली इस दुनिया में इस तरह बेवजह खिलखिलाने वाले लोगों को पागल कहा जाता था. सब उसके चेहरे पर से ये हँसी मटियामेट कर देना चाहते थे. मगर उसकी हँसी में धाह थी इसलिए सब डरते थे उससे. लड़की अपनी ही दुनिया में रहती. न किसी की सुनती...न कुछ देखती जिससे तकलीफ हो. शाम के रंग चुनती और टांक लेती दुपट्टे में उसके नाम का शीशा कोई...देखती चाँद को और भेजती फ्लाइंग किस...छत पर खड़े लड़के खुद को चाँद समझते. अमावस की रात को कोसते. उसकी हँसी की चांदनी में भीगते हुए भी वे उसकी हँसी छीन कर अपने होठों पर चिपका लेना चाहते थे...किसी तस्वीर में धर देना चाहते थे...किसी रेडियो के ऐड में बजा देना चाहते थे. उसकी हँसी कहीं और होनी चाहिए थी. उसके होटों पर नहीं. कोई इतना सारा बेवजह हंसता है भला.

तो क्या हुआ अगर उसे मुहब्बत हुयी थी. तो क्या हुआ अगर महबूब की आवाज़ सुन कर उसे गुदगुदी होती थी. बात बस इतनी ही तो नहीं थी. वो क्यूँ छलकी छलकी पड़ती थी. वो क्यूँ खुद को बिखेरती चलती थी. वो सिमट कर क्यूँ नहीं रहती थी? आखिर उसका दुपट्टा किसी बाजारू औरत की आबरू तो नहीं था कि कोई भी हाथ दे...फिर वो राह चलते दुपट्टा क्यूँ लहराती थी...बाकी लड़कियों की तरह कानी ऊँगली में एक कोना लपेट कर जमीन की ओर ताकती हुयी...करीने से दुपट्टे को सीने के इर्द गिर्द कस कर लपेटे हुए क्यूँ नहीं चलती थी. गले में इतनी बेपरवाही से डालते हैं दुपट्टा? उसपर उसकी हंसी का अबरख...किरमिच किरमिच आँखों में चुभता था. उसके उड़ते दुपट्टे से जरा जरा गिरती अबरख और सड़क दुल्हन की चूनर जैसी चमकती. आँखें तरेरती हर लड़के को उसे यूँ देखता जाता था जैसे आँखें कान हो गयी हों और उसकी हंसी को रिकोर्ड कर लेंगी. बार बार प्ले कर के घिस देने के लिए.

आइना उसे बार बार समझाता. इतना हँसना अच्छी बात नहीं है. मान लो हँसना ही है तो अकेले में हँस लो. ऐसे सबके सामने हँसोगी तो नज़र लग जायेगी सबकी. चुपचाप एक कोने में बैठो और जितना जी करे ठहाके लगाओ. यूँ हँसने का वक़्त तय करो. नियत समय पर हँसो. चूरन की तरह दो चम्मच सुबह, दो चम्मच शाम. जिंदगी में बस गिन के मिलती हैं मुस्कुराहटें. तुम जो इतनी हंसती हो, लोगों को लगता है तुम उनके हिस्से की हँसी चुरा कर हँस रही हो. तुम्हें वे जेल में डाल देंगे. ज़माने से डरो री लड़की. 

पहले सारी लड़कियां ऐसी ही हुआ करती थीं...बेपरवाह....खुल कर हंसने वालीं...फिर उनकी जिंदगी में इश्क दाखिल होता था...बड़े हौले से...नन्हे नन्हे कदम बढ़ाता...और बस, लड़कियां हँसना छोड़ कर इंतज़ार करना शुरू कर देतीं...उनकी हंसी खुद के लिए न होकर सिर्फ उस एक महबूब के लिए होने लगतीं...वे अपनी हँसी से ज्यादा उसकी आँखों का ख्वाब बनना चाहतीं. फिर आँखों का ख्वाब कब बरसातों में घुलने लगता कोई नहीं जानता. और दुनिया की नज़र तो होती ही इतनी बुरी है कि चुभनी ही थी एक न एक रोज़.

बस तब से चुप है लड़की...अब नियम से हंसती है. एक छटांक सुबह. एक छटांक शाम. शहर. मोहल्ले. के लोग चैन से सोते हैं. मगर बूढी औरतों के सीने में उसकी चुप्पी चुभती है और वे रात रात उसकी हँसी वापस लौट आने की दुआएँ मांगती हैं. 

आमीन.

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