17 August, 2014

जिसने सफ्हों में जिलाए रक्खा है, उस तक हमारा सलाम पहुंचे


ओ कवि,

तुम्हारा शुक्रिया. कि तुम्हारे बनाये बिम्बों में उलझ जाती है लड़की और कर देती है आत्महत्या का इरादा मुल्तवी. कि उसे कई बार लगता है कि तुमने उसके लिए ही रची हैं बेतरह खूबसूरत उपमाएं...चाहे किसी और को उसकी जरूरत हो न हो, तुम्हें नयी कवितायें लिखने के लिए उसकी जरूरत है. ये सोचते हुए उसका चोर मन उसे ये भी कहता है कि दुनिया की सबसे खूबसूरत कवितायें विरह में लिखी गयी हैं...तो अगर वाकई तुम्हें दुनिया के साहित्य की परवाह है तो जान दे दो. तुम्हारे गम में कवि की लेखनी में ऐसी धार आ जायेगी कि देखने वाले चमत्कृत हो जायेंगे.

लड़की मगर अपने चोर मन को धमकाती है और कहती है कि वो अपने कवि को बेहतर जानती है. अगर वो जान दे देगी तो कवि अवसाद में चला जाएगा. उसकी कवितायें पढ़ कर भले दुनिया उसपर जान छिड़कती हो...भले दूर देश की औरतें उसके लिए प्रेम पत्र लिखती हों...अगर वो उसकी कविता नहीं पढ़ेगी तो कवि लिखना बंद कर देगा. कवि वैसे ही हिसाबी है हर चीज़ में...सब कुछ फायदे के लिए करता है. उसके लिखने से जब फायदा होना बंद हो जाएगा तो क्यूँ लिखेगा.

आज की रात क़यामत की रात थी. लड़की अपने साँसों का गट्ठर गाँव के बाहर के पुराने पीपल पर छोड़ आई थी और पोखर किनारे चली गयी थी. गले में चाँद बाँध कर वही डूब कर जान दे देती कि तुम्हारा एक ख़त मिल गया वहीं कोटर में रखा हुआ. तुम्हारी आदत भी न, एक तो इतनी लम्बी चिट्ठी लिखते हो उसपर इतनी मुश्किल...हर वाक्य पढ़ने के साथ उस दौर में पढ़े हुए लेखकों की याद आती रही...तो कहीं तुम्हारे लिखे में किसी गायिका की खुशबू. उलझनों का एक ऐसा जंजाल बनता जा रहा था कि कहीं छूट कर जाने की गुंजाईश नहीं रही.

तुम्हें पढ़ कर महसूस हुआ कि जिंदगी कितनी खूबसूरत है...सिर्फ चाँद तारों में नहीं, पकी धान की बालियों में, होली में गए गए गीत में और औरतों के रचे हुए कोहबर में भी. तुम्हारी आँखों से देर तक दुनिया देखती रही...तुम्हारे ज़ख्मों के निशान मेरे जिस्म पर उभरने लगे हैं. मगर लड़की तुम्हारे ज़ज्बे को सलाम करती है...अगर तुम दर्द की इस दुनिया को महसूसते हुए जीने की वजहें खोज पाने में कामयाब रहे हो तो लड़की हार क्यूँ माने?

रात भर कैसे तो ख्याल दबोच लेने को तैयार थे. दर्द आँखों से बहता रहा मगर धुला धुला सा महसूस नहीं होता. तुम्हारी कविताओं की पहाड़ी नदी में देर तक उतराती रही...उनकी मुस्कुराहट...उनका शोर...झरने पर से उनकी उछलकूद. इन्द्रधनुष भी बन रहा था. तुम्हारी आँखों को छूने पर ऐसा ही इन्द्रधनुष उगता होगा न उँगलियों में. रात फिर अपने गाँव गयी थी, सोचा तुम्हारे गाँव भी हो आऊँ. कुछ भी पहले की तरह नहीं रहा. अब हर मौसम में गिल्ला गुड़ और गम्कौउआ चूड़ा नहीं मिलता. दीदी प्लेट में डाल के बिस्कुट मिक्सचर दे दी हमको. आजकल तो पेप्सी भी रखने लगा है सब लोग. पहले तो घर जाते ही निम्बू का शरबत मिलता था. तुम्हारा गाँव मगर अब भी जरा बचा हुआ है. तुम्हारी माँ तुलसी चौरा पर बैठी चावल चुन रही थी. पता नहीं कैसे तो एक बार में पहचान गयी हमको. तुम्हारी कविता में इतना साफ़ चेहरा दिखता है क्या हमारा?

क्या मिला बड़े शहर आके? दिन भर नौकरी करो और फिर भी पैसा जोड़ जोड़ के घर चलाओ. बाबा ठीक ही न कहते हैं कि यहाँ पैसा कम मिलेगा मगर यहाँ कम पैसा में जिया भी तो जा सकता है. सब छोड़ छाड़ के चलते हैं रे. आम के बगान के पास छप्पर टाप लेंगे. कोई न कोई काम धंधा मिल ही जाएगा करने को. वैसे भी आजकल गाँव में रहता कौन है. तुम कविता लिखना, हम तुम्हारे सिरहाने पंखा झलेंगे. तुम भात दाल खाना हम लोटा लिए खड़े रहेंगे. तुम हाथ धोना...हम अपना दुपट्टा बढ़ा देंगे हाथ पोंछने को. गोहाल के पास वाला कुआँ के मुंडेर पर से दूर डूबते सूरज को देखेंगे. पैसा कम होगा, लेकिन संतोष बहुत रहेगा. तुम जितना कमा कर लाओगे, मैं उतने में ही घर चला दूँगी.

मैंने नौकरी छोड़ दी है. अगले हफ्ते गाँव जा रही हूँ. तुम्हारा टिकेट कटाऊं? चलोगे?

प्यार,
तुम्हारी...

16 August, 2014

समंदर के सीने में एक रेगिस्तान रहता था

तुम्हें लगता है न कि समंदर का जी नहीं होता...कि उसके दिल नहीं होता...धड़कन नहीं होती...सांसें नहीं होतीं...कि समंदर सदियों से यूँ ही बेजान लहर लहर किनारे पर सर पटक रहा है...

कभी कभी समंदर की हूक किसी गीत में घुल जाती है...उसके सीने में उगते विशाल रेगिस्तान का गीत हो जाता है कोई संगीत का टुकडा...उसे सुनते हुए बदन का रेशा रेशा धूल की तरह उड़ता जाता है...बिखरता जाता है...नमक पानी की तलाश में बाँहें खोलता है कि कभी कभी रेत को भी अपने मिट्टी होने का गुमान हो जाता है...तब उसे लगता है कि खारे पानी से कोई गूंथ दे जिस्म के सारे पोरों को और गीली मिट्टी से कोई मूरत बनाये...ऐसी मूरत जिसकी आँखें हमेशा अब-डब रहे.

समंदर चीखता है उसका नाम तो दूर चाँद पर सोयी हुयी लड़की को आते हैं बुरे सपने...ज्वार भाटा उसकी नींदों में रिसने लगता है...डूबती हुई लड़की उबरने की कोशिश करती है तो उसके हाथों में आ जाती है किसी दूर की गैलेक्सी के कॉमेट की भागती रौशनी...वो उभरने की कोशिश करती है मगर ख्वाबों की ज़मीं दलदली है, उसे तेजी से गहरे खींचती है.

उसके पांवों में उलझ जाती हैं सदियों पुरानी लहरें...हर लहर में लिखा होता है उसके रकीबों का नाम...समंदर की अनगिन प्रेमिकाओं ने बोतल में भर के फेंके थे ख़त ऊंचे पानियों में...रेतीले किनारे पर बिखरे हुए टूटे हुए कांच के टुकड़े भी. लड़की के पैरों से रिसता है खून...गहरे लाल रंग से शाम का सूरज खींचता है उर्जा...ओढ़ लेता है उसके बदन का एक हिस्सा...

लड़की मगर ले नहीं सकती है समंदर का नाम कि पानी के अन्दर गहरे उसके पास बची है सिर्फ एक ही साँस...पूरी जिंदगी गुज़रती है आँखों के सामने से. दूर चाँद पर घुलती जाती है वो नमक पानी में रेशा रेशा...धरती पर समंदर का पानी जहरीला होता जाता है....जैसे जैसे उसकी सांस खींचता है समंदर वैसे वैसे उसको आने लगती है हिचकियाँ...वैसे वैसे थकने लगता है समंदर...लहरें धीमी होती जाती है...कई बार तो किनारे तक जाती ही नहीं, समंदर के सीने में ही ज़ज्ब होने लगती हैं. लड़की का श्राप लगा है समंदर को. ठहर जाने का.

एक रोज़ लड़की की आखिरी सांस अंतरिक्ष में बिखर गयी...उस रोज़ समंदर ऐसा बिखरा कि बिलकुल ही ठहर गया. सारी की सारी लहरें चुप हो गयीं. धरती पर के सारे शहर उल्काओं की पीठ चढ़ कर दूर मंगल गृह पर पलायन कर गए. समंदर की ठहरी हुयी उदासी पूरी धरती को जमाती जा रही थी. समंदर बिलकुल बंद पड़ गया था. सूरज की रौशनी वापस कर देता. किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि लहरों को गुदगुदी करे कि समंदर को फिर से कुछ महसूस होना शुरू करे. समंदर धीरे धीरे बहुत खूंखार होता जा रहा था. वो जितना ही रोता, उसके पानी में नमक उतना ही बढ़ता...इस सान्द्र नमक से सारी मछलियों को भी तकलीफ होने लगी...उन्होंने भी आसमान में उड़ना सीख लिया...एक रोज़ उधर से गुजरती एक उल्का से उन्होंने भी लिफ्ट मांगी और दूर ठंढे गृह युरेनस पे जाने की राह निर्धारित कर ली. समंदर ने उनको रोका नहीं.

समंदर के ह्रदय में एक विशाल तूफ़ान उगने लगा...अब कोई था भी नहीं जिससे बात की जा सके...अपनी चुप्पी, अपने ठहराव से समंदर में ठंढापन आने लगा था. सूरज की किरनें आतीं तो थीं मगर समंदर उन्हें बेरंग लौटा देता था. कहीं कोई रौशनी नहीं. कोई आहट नहीं. लड़की की यादों में घुलता. मिटता. समंदर अब सिर्फ एक गहरा ताबूत हो गया था. जिसमें से किसी जीवन की आशंका बेमानी थी. एक रोज़ सूरज की किरणों ने भी अपना रास्ता बदल लिया. गहरे सियाह समंदर ने विदा कहने को अपने अन्दर का सारा प्रेम समेटा...पृथ्वी से उसकी बूँद बूँद उड़ी और सारे ग्रहों पर जरा जरा मीठे पानी की बारिश हुयी...अनगिन ग्रहों पर जीवन का अंकुर फूटा...

जहाँ खुदा का दरबार लगा था वहाँ अपराधी समंदर सर झुकाए खड़ा था...उसे प्रेम करने के जुर्म में सारे ग्रहों से निष्काषित कर दिया...मगर उसकी निर्दोष आँखें देख कर लड़की का दिल पिघल गया था. उसने दुपट्टे की एक नन्ही गाँठ खोली और समंदर की रूह को आँख की एक गीली कोर में सलामत रख लिया.

13 August, 2014

याद की उलटबांसी...हम जैसे खुराफाती...तुमको मिली रे हमरी पाती? लिखना कम समझना बेसी, बूझे?


उनके शहर एक ही हार्टलाइन के दो छोरों पर बसे हुए थे. वो जब भी उसे फोन करती, दोनों शहरों का मौसम एक जैसा होने लगता...जरा जरा बादल हुमक कर लड़के के शहर चल देते...फुहारों में उसे भिगा भिगा छेड़ते...जरा सी लड़के के शहर की धूप लड़की के शहर पहुँच जाती, उसके गालों पर सूरजमुखी खिलाती...सुनहले रंग से उसकी आँखों के ऊपर आईशैडो लगाती.

जरा जरा सरफिरे ही थे ये दोनों बाशिंदे...अक्सर पागलपन में एक दूसरे से ही कम्पटीशन कर बैठते थे...फिर पूरी कायनात परेशान हो जाती थी इनके झगड़े सुलझाते सुलझाते. कभी सूरज दूसरे हेमिस्फेयर में देर से उगता तो कभी औरोरा बोरियालिस वोल्गा किनारे वोडका की बोतल मांगता नज़र आता...कभी गंगा का मटमैला पानी बाँध तोड़ कर दौड़ता तो पेरिस में आशिकों को एफिल टावर पर चढ़ कर अपनी जान बचानी पड़ती.

बड़े खतरनाक थे दोनों...दुनिया के कुछ शायर टाइप के लोग इनपर पीएचडी भी कर रहे थे कि आखिर दोनों के बीच चलता क्या है...दोस्त से बहुत ज्यादा, आशिक से जरा कम...मंटो के दीवाने...ग़ालिब पर फ़िदा...फैज़ से इश्क को लेकर तो दोनों में रकीबों का हिसाब चलता था...और ऐसा ही कुछ मेहंदी हसन को लेकर भी था...वो कभी उमराव की अदाओं पर जान देकर उर्दू सीखने लगता तो लड़की कर्ट कोबेन की आवाज़ में इतना गहरा डूब जाती कि अगले कई रोज़ तक हलक से आवाज़ नहीं निकलती...फिर लड़का ही गरारे करने को नमक पानी का इन्तेजाम करता...ब्लैक मार्केट से उसके लिए विस्की लेकर आता और बिना आइस के उसे पीने को देता...लड़की मुंह बनाती तो धमकाता...समंदर में फ़ेंक आने के किस्से सुनाता...लड़की कागज़ में रोल हुयी चिट्ठी बन जाती...विस्की की खाली बोतल में डूबती उतराती...

लड़की हंसती तो लड़का उसकी हँसी को रिकॉर्ड कर के रखने की कोशिश करता...हर बार रिप्ले करने पर भी वो खनक मिसिंग सी लगती जो उसकी जिन्दा आवाज़ में घुली होती थी. उसके हंसने से लड़के के शहर का बैलेंस गड़बड़ा जाता था...फिर वहां की इमारतें भी डगमग डगमग चलती थीं. लड़की की आवाज़ जैसे इत्र थी...मोबाइल में होती तो उसके होने की खुशबू आती. लड़की बेसुध सी हुआ करती थी, खुद को जहाँ तहां भूल आती...लड़का उसके पीछे उसकी छूटी चीज़ें सकेरता चलता. कभी दुपट्टा, कभी कलम, कभी नोटबुक, कभी मुस्कुराहटें, कभी ज़ख्म, कभी बारिश, कभी गुस्सा. लड़की भी कुछ ऐसी ही थी लड़के के लिए...उसकी सनक, उसका आलस, उसकी दारू की बोतलें, उसके टूटे हुए ऐशट्रे, बीड़ी का पैकेट, लाइटर, उसके बचपन के दोस्त, उसकी जवानी के रकीब, उसकी वीकेंड की प्रेमिकाएं...सब सकेरती रहती. दोनों एक दुसरे का डिपाजिट बॉक्स हुआ करते...जैसे बैंक में होता है न...सेफ...लॉकर जैसा कुछ. पहला जहाँ से बिखरता, दूसरा वहां से उसे सहेजता. एक दूसरे के होने से उन्हें खुद के खोने का डर कभी नहीं लगता और वे उन्मुक्त होकर जिंदगी के हर लम्हे को जीते जाते कि सहेज के रखने लायक हर चीज़ कोई और रख रहा है उनके हिस्से की.

एक दूसरे के बिना अधूरे थे वे...खुदा की लिखी एक कहानी का आधा आधा हिस्सा. जब साथ होते थे तो सारे डायलाग सही लगते थे...हर बेसिरपैर के पैराग्राफ का मतलब होता था...हर गीत की सही जगह होती थी. उनकी जिंदगी के कट्स भी सही जगह पर आते थे. उन्हें यकीन था कि एक दूसरे की जिंदगी में उनकी जो जगह है वो कोई और नहीं ले सकता...तो वे निश्चिंत होकर एक दूसरे की प्रेमकहानियों का जायका लेते. दिल टूटने पर एक दूसरे को सम्हालते भी. खुदा उनपर ख़ास नज़र रखता था...यूँ कि इतनी बड़ी दुनिया को चलाये रखना बेहद मुश्किल काम था. खुदा बोर होने पर उनकी गप्पें सुनता था...उनके पास करने को कितनी बातें थीं...खुदा को कभी कभी रश्क होता था कि उसने ऐसे लोग बनाये हैं जो उसकी दुनिया में ऐसे डूब के जीते हैं...महसूसते हैं. दोनों खुराफाती जानते थे कि खुदा उनकी बातें छुप छुप के सुनता है...वे ऐसे किसी दिन मंटो का किस्सा छेड़ देते. वे जानते थे कि खुदा मंटो से अच्छा ख़ासा चिढ़ता है. मंटो की अफ्सनानिगारी के किस्से निकल गए तो वे खुदा और उसकी बनायी दुनिया तक भूल जाते थे. खुदा ऐसे में मौसम खराब कर देता...तूफानों को उनके शहर भेजने की धमकी देता...मगर दोनों नाशुक्रे मंटो की किसी कहानी में छुप जाते और खुदा परेशान होकर तूफ़ान को किसी और देश भेज देता. यूँ भी उनके शहर एक ही हार्टलाइन के दो छोर पर थे...उनके शहरों में तूफ़ान लाने के लिए पूरी हार्टलाइन को डुबाना पड़ता...फिर तो दुनिया भर के आशिक खुदा को इतना गरियाते कि उसे बुखार हो आता. ऐसे में फिर लड़की के सिवा कौन था जो चाँद की पतली महीन पट्टियां रख सके खुदा के माथे पर. इस सब आफत से बेहतर खुदा किसी नए प्लैनेट पर नयी दुनिया बनाने चला जाता.

फिर दोनों खुराफाती मिल कर खुदा के दफ्तर में सेंधमारी करने का प्लान बनाते. चित्रगुप्त को अपनी साइड मिलाते...उसे झांसा देते कि खुदा को बताये बिना एक सुपरकंप्यूटर स्मगल कर देंगे स्वर्ग में. बेचारा चित्रगुप्त इतने दिन से उँगलियों पे गिन गिन के परेशान हो गया है. इन फैक्ट शकुंतला देवी को इतनी जल्दी ऊपर भेजने में भी इन्ही खुराफातियों का हाथ रहा है. चित्रगुप्त तक पर इन्होने अहसानों का कर्जा चढ़ा रखा है.

खुदा भी लेकिन खुदा है...जब इनसे बहुत परेशान हो जाता तो इश्क को भेज देता...कुछ दिन दोनों कंफ्यूज रहते और दुनिया में शान्ति रहती. सुबह शाम हरारत कि आखिर एक दूसरे से प्यार तो नहीं हो गया. कभी हाँ कभी ना के चक्कर में एक दूसरे से मिलते ही नहीं. फिर खुदा इंतज़ार करते करते बोर हो जाता और इश्क को वापस बुला लेता, उसका डिमोशन कर देता कि 'बेटा, तुमसे न हो पायेगा'. लड़का और लड़की फिर दोस्तों जैसे हो जाते और इश्क की भर भर खिंचाई करते. इश्क बेचारा बोरिया बिस्तर बाँध कर किसी 'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे' जैसे निर्देशक के पास शरण मांगने भाग उठता. दुनिया में फिर से त्राहिमाम मचा रहता. नारद जी खुश रहते. खुदा खुश रहता. देश में जैसे अंग्रेजों भारत छोड़ो का आन्दोलन हुआ था वैसे ही इन दोनों से प्रेरित होकर देश भर में लड़के लड़कियां नारेबाजी करते 'एक लड़का और एक लड़की दोस्त हो सकते हैं'. फ्रेंडशिप डे चाहे राखी के दिन पड़ जाये कोई घबराये बिना अपना फ्रेंडशिप बैंड लेकर लड़की के पास चला जाता. इस तरह दुनिया को ठोकरों में रखते हुए, खुदा की एंटरटेनमेंट का पूरा इन्तेजाम करने वाले वो लड़का और लड़की उम्र भर दोस्तों की तरह ख़ुशी ख़ुशी हार्टलाइन के दो तरफ बने शहर में बेस्ट फ्रेंड बन के रहे.

बोलो सियावर राम चन्द्र की जय!

11 August, 2014

जिंदगी बीत जाती है मगर कितनी बाकी रह जाती है न?


कतरा कतरा दुस्वप्नों के तिलिस्म में फंसती, बड़ी ही खूंख्वार रात थी वो...बिस्तर की सलवटों में अजगर रेंगते...बुखार की हरारत सा बदन छटपटाता...मैं तुम्हारे नाम के मनके गिनती तो हमेशा कम पड़ जाते...ऐसे कैसे कटेगी रात...कि तुम्हारे आने में जाने कितने पहर बाकी हैं. प्यास हलक से उतरती तो पानी की हर बूँद जलाती...घबरा कर विस्की की बोतल उठाती तो याद आता कि फ्रीज़र में आइस ख़त्म है...नीट पी नहीं सकती, पानी की फितरत समझ नहीं आ रही...तो क्या अपना खून मिला कर विस्की पियूँ?

आजकल तो हिचकियों ने भी ख़त पहुँचाने बंद कर दिए हैं. तुम्हें मालूम भी होता कि तुमसे इतनी दूर इस शहर में याद कर रही हूँ तुमको? तुम्हारे आने का वादा तो कब का डिबरी की बत्ती में राख हुआ. लम्हे भर को आग चमकी थी...जैसे हुआ था इश्क तुमको. कभी सोचती हूँ तुमसे कह ही दूं वो सारी बातें जो मुझे जीने नहीं देती हैं. लम्हे भर को इश्क होता भी है क्या?

भोर उठी हूँ तो जाने किससे तो बातें करने का मन है. बहुत सारी बातें. या कि फिर एक लम्बी ड्राइव पर जाना और कुछ भी नहीं कहना. कुछ भी नहीं. जैसे एकदम चुप हो जाऊं. क्या फर्क पड़ता है कुछ भी कहने से. ऐसे कहने से न कहना बेहतर. तुम हो कहाँ मेरी जान? तुम्हारे शहर में भी बारिशें हुयीं क्या सारी रात? यहाँ तो ऐसा दर्दभरा मौसम है कि गर्म चाय से भी पिघलना मंजूर नहीं करता. तुलसी की पत्तियां तोड़ कर उबालने को रक्खी हैं...थोड़ी काली मिर्च, थोड़ी अदरक...काढ़ा पीने से शायद गले की खराश को थोड़ा आराम मिले...मेरे ख्याल से सपनों में देर तक आवाज़ देती रही हूँ तुम्हें...

तुम्हें मालूम है न मैं तुम्हें याद करती हूँ? जैसे दिल्ली के मौसम को याद करती हूँ...जैसे बर्न के अपनेपन को याद करती हूँ...जैसे अनजान देशों की गलियों में भटकते हुए कई रेस्टोरेंट्स के मेनू देखे और वहां लिखी हुयी ड्रिंक्स के नशे के बारे में सोचा. ख्यालों में अक्सर आती है कई दुपहरें जो तुमसे गप्पें मरते हुए काटी थीं...तुम्हारे ऑफिस के सीलिंग फैन की यादें भी हैं. तुम हँस रहे हो ये पढ़ कर जानती हूँ. सोचती ये भी हूँ कि तुम्हारे लायक कॉपी अब इस शहर में क्यूँ नहीं मिलती...सोचती ये भी हूँ कि तुम्हें ख़त लिखे बहुत बरस हो गए. अब भी कुछ अच्छा पढ़ती हूँ तो तुम्हें भेज देने का मन करता है. या कि कोई अच्छी फिल्म देखी तो लगता है तुम्हें देखने को कहती. जिंदगी के छोटे बड़े उत्सव तुम्हारे साथ बाँटने की ख्वाहिश अब भी बाकी है. तुम्हारे शहर के उस किले की खतरनाक मुंडेर पर पाँव झुलाते मंटो को गरियाने की ख्वाहिश भी मेरे दोस्त बाकी है. जिंदगी बीत जाती है मगर कितनी बाकी रह जाती है न?

कभी कभी सोचती हूँ तो लगता है हम एक जिगसा पजल हैं. मुझमें कितना कुछ बाकियों से आया है...जितनी बार प्यार हुआ, एक नए तरह का संगीत उसकी पहचान बनता गया...डूबते हुए हर बार किसी नए राग में सुकून तलाशा...किसी नए देश का संगीत सुना कि याद के ज़ख्म थोड़े कम टीसते थे कि संगीत में अनेस्थेटिक गुण होते हैं. वैसा ही कुछ लेखकों के साथ भी हुआ न. अगर मुझे जरा कम इश्क हुआ होता...या जरा कम दर्द हुआ होता तो मैं ऐसी नहीं होती.

वो कहता है मुझे अब बदलना चाहिए...जरा हम्बल होना चाहिए, जरा डिप्लोमेटिक. मगर मुझसे नहीं होगा. मैं ऐसी ही रही हूँ...अक्खड़, जिद्दी और इम्पल्सिव...बिना सोचे समझे कुछ भी करने वाली...बिना सोचे समझे कुछ भी बोल देने वाली. डिप्लोमेटिक होना न आया है न आएगा. जिद्दी भी बहुत हूँ. सुबह उठ कर जाने क्या क्या सोच रही हूँ. तुम होते तो इस परेशानी में कोई चिल्लर सा जोक मारते...या फिर अपनी घटिया आवाज में कोई सलमान खान का पुराना वाला गाना गा के सुनाते हमको...हम हँसते हँसते लोटपोट हो जाते और फिर अपनी किताब पर काम शुरू कर देते. जल्दी ही कहानियां फाइनल करनी हैं. कुछ नया नहीं लिख पाए हैं. अफ़सोस होता है...मगर फिर खुद को समझाते हैं. जिंदगी बहुत लम्बी है और ये मेरी आखिरी किताब नहीं होगी. अगर हुयी भी तो चैन से मर सकेंगे कि बकेट लिस्ट में बस एक ही किताब का नाम लिखे थे. बाकी तो बोनस है. कभी कभी अपने आप को जैसे हैं वैसा क़ुबूल लेना मुश्किल है...मुहब्बत तो दूर की बात है. फिर भी सुकून इतना ही है बस कि कोशिश में कमी नहीं की मैंने. अपना लिखा कभी परफेक्ट लगा ही नहीं है...न कभी लगेगा. आखिर डेडलाइन भी कोई चीज़ होती है. हाँ, जब फिल्में बनाउंगी तो वोंग कार वाई की तरह आखिरी लम्हे तक एडिट चालू रहेगा. शायद. बहुत कन्फ्यूजन है रे बाबा!

01 August, 2014

पगला गए होंगे जो ऐसा हरपट्टी किरदार सब लिखे हैं

मेरी बनायी दुनिया में आजकल हड़ताल चल रही है. मेरे सारे किरदार कहीं और चले गए हैं. कभी किसी फिल्म को देखते हुए मिलते हैं...कभी किसी किताब को पढ़ते हुए कविता की दो पंक्तियों के पीछे लुका छिपी खेलते हुए. कसम से, मैंने ऐसे गैर जिम्मेदार किरदार कहीं और नहीं देखे. जब मुझे उनकी जरूरत है तभी उनके नखरे चालू हुए बैठे हैं. बाकी किरदारों का तो चलो फिर भी समझ आता है...कौन नहीं चाहता कि उनका रोल थोड़ा लम्बा लिखा जाए मगर ऐसी टुच्ची हरकत जब कहानी के मुख्य किरदार करते हैं तो थप्पड़ मारने का मन करता है उनको...मैं आजकल बहुत वायलेंट हो गयी हूँ. किसी दिन एक ऐसी कहानी लिखनी है जिसमें सारे बस एक दूसरे की पिटाई ही करते रहें सारे वक़्त...इसका कोई ख़ास कारण न हो, बस उनका मूड खराब हो तो चालू हो जाएँ...मूड अच्छा हो तो कुटम्मस कर दें. इसी काबिल हैं ये कमबख्त. मैं खामखा इनके किरदार पर इतनी मेहनत कर रही हूँ...किसी काबिल ही नहीं हैं.

सोचो, अभी जब मुझे तुम्हारी जरूरत है तुम कहाँ फिरंट हो जी? ये कोई छुट्टी मनाने का टाइम है? मैंने कहा था न कि अगस्त तक सारी छुट्टियाँ कैंसिल...फिर ये क्या नया ड्रामा शुरू हुआ है. अरे गंगा में बाढ़ आएगी तो क्या उसमें डूब मरोगे? मैं अपनी हिरोइन के लिए फिर इतनी मेहनत करके तुम्हारा क्लोन बनाऊं...और कोई काम धंधा नहीं है मुझे...हैं...बताओ. चल देते हो टप्पर पारने. अपनाप को बड़का होशियार समझते हो. चुप चाप से सामने बैठो और हम जो डायलाग दे रहे हैं, भले आदमी की तरह बको...अगले चैप्टर में टांग तोड़ देंगे नहीं तो तुम्हारा फिर आधी किताब में पलस्तर लिए घूमते रहना, बहुत शौक़ पाले हो मैराथन दौड़ने का. मत भूलो, तुम्हारी जिंदगी में मेरे सिवा कोई और ईश्वर नहीं है...नहीं...जिस लड़की से तुम प्यार करते हो वो भी नहीं. वो भी मेरा रचा हुआ किरदार है...मेरा दिल करेगा मैं उसके प्रेम से बड़ी उसकी महत्वाकांक्षाएं रख दूँगी और वो तुम्हारी अंगूठी उतार कर पेरिस के किसी चिल्लर डिस्ट्रिक्ट में आर्ट की जरूरत समझने के लिए बैग पैक करके निकल जायेगी. तुम अपनी रेगुलर नौकरी से रिजाइन करने का सपना ही देखते रह जाना. वैसे भी तुम्हारी प्रेमिका एक जेब में रेजिग्नेशन लेटर लिए घूमती है. प्रेमपत्र बाद में लिखना सीखा उसने, रेजिग्नेशन लेटर लिखना पहले.

कौन सी किताब में पढ़ के आये हो कि मैंने तुम्हें लिखा है तो मुझे तुमसे प्यार नहीं हो सकता? पहले उस किताब में आग लगाते हैं. तुमको क्या लगता है, हीरो तुम ऐसे ही बन गए हो. अरे जिंदगी में आये बेहतरीन लोगों की विलक्षणता जरा जरा सी डाली है तुममें...तुम बस एक जिगसा पजल हो जब तक मैं तुममें प्राण नहीं फूँक देती...एक चिल्लर कोलाज. तुम्हें क्या लगता है ये जो परफ्यूम तुम लगाते हो, इस मेकर को मैंने खुद पैदा किया है? नहीं...ये उस लड़के की देहगंध से उभरा है जिसकी सूक्ष्म प्लानिंग की मैं कायल हूँ. शहर की लोड शेडिंग का सारा रूटीन उसके दिमाग में छपा रहता था...एक रोज पार्टी में कितने सारे लोग थे...सब अपनी अपनी गॉसिप में व्यस्त...इन सबके बीच ठीक दो मिनट के लिए जब लाईट गयी और जेनरेटर चालू नहीं हुआ था...उस आपाधापी और अँधेरे में उसने मुझे उतने लोगों के बावजूद बांहों में भर कर चूम लिया था...मुझे सिर्फ उसकी गंध याद रही थी...इर्द गिर्द के शोर में भोज के हर पकवान की गंध मिलीजुली थी मगर उस एक लम्हे उसके आफ्टरशेव की गंध...और उसके जाने के बाद उँगलियों में नीम्बू की गीली सी महक रह गयी थी, जैसे चाय बनाते हुए पत्तियां मसल दी हों चुटकियों में लेकर...कई बार मुझे लगता रहा था कि मुझे धोखा हुआ है...कि सरे महफ़िल मुझे चक्कर आया होगा...कि कोई इतना धीठ और इतना बहादुर नहीं हो सकता...मगर फिर मैंने उसकी ओर देखा था तो उसकी आँखों में जरा सी मेरी खुशबू बाकी दिखी थी. मुझे महसूस हुआ था कि सब कुछ सच था. मेरी कहानियों में लिखे किरदार से भी ज्यादा सच.

गुंडागर्दी कम करो, समझे...हम मूड में आ गए तो तीया पांचा कर देंगे तुम्हारा. अच्छे खासे हीरो से साइडकिक बना देंगे तुमको उठा के. सब काम तुम ही करोगे तो विलेन क्या अचार डालेगा?अपने औकात में रहो. ख़तम कैरेक्टर है जी तुमरा...लेकिन दोष किसको दें, सब तो अपने किया धरा है. सब बोल रहा था कि तुमको बेसी माथा पर नहीं चढ़ाएं लेकिन हमको तो भूत सवार था...सब कुछ तुम्हारी मर्जी का...अरे जिंदगी ऐसी नहीं होती तो कहानी ऐसे कैसे होगी. कल से अगस्त शुरू हो रहा है, समझे...चुपचाप से इमानदार हीरो की तरह साढ़े नौ बजे कागज़ पर रिपोर्ट करना. मूड अच्छा रहा तो हैप्पी एंडिंग वाली कहानी लिख देंगे. ठीक है. चलो चलो बेसी मस्का मत मारो. टेक केयर. बाय. यस आई नो यू लव मी...गुडनाईट फिर. कल मिलते हैं. लेट मत करना.

30 July, 2014

Je t'aime जानेमन


लड़की ने आजकल चश्मे के बिना दुनिया देखनी शुरू कर दी है जरा जरा सी. यूँ पहले पॉवर बहुत कम होने के कारण उसे चश्मा लगाने की आदत नहीं थी मगर जब से दिल्ली में गलत पॉवर लगी और माइनस टू पर पॉवर टिकी है उसका बिना चश्मे के काम नहीं चलता. यूँ भी चश्मा पहनना एक आदत ही है. जानते हुए भी कि हमें सब कुछ नहीं दिख सकता. मायोपिक लोगों को तो और भी ज्यादा मुश्किल है...आधे वक़्त पूछते रहेंगे किसी से...वो जो सामने लाइटहाउस जैसा कुछ है, तुम्हें साफ़ दिख रहा है क्या...अच्छा, क्या नहीं दिख रहा...ओह...मुझे लगा मेरी पॉवर फिर बढ़ गयी है या ऐसा ही कुछ. 

लड़की आजकल अपने को थर्ड परसन में ही लिखती और सोचती भी है. उसका दोष नहीं है, कुछ नयी भाषाएँ कभी कभार सोचने समझने के ढंग पर असर डाल सकती हैं. जैसे उसने हाल में फ्रेंच सीखना शुरू किया है...उसमें ये नहीं कहते कि मेरा नाम तृषा है, फ्रेंच में ऐसे कहते हैं je m'appele trisha...यानि कि मैं अपने आप को तृषा बुलाती हूँ...वैसे ही सोचना हुआ न...कि मेरे कई नाम है, वो मुझे हनी बुलाता है, घर वाले टिन्नी, दोस्त अक्सर रेडियो कहते हैं मगर अगर मुझसे पूछोगे तो मैं खुद को तृषा कहलाना पसंद करुँगी. हमें कभी कभी हर चीज़ के आप्शन मिलते हैं...जैसे आजकल उसने चश्मा पहनना लगभग छोड़ दिया है. इसलिए नहीं कि उसे स्पाइडरमैन की तरह सब साफ़ दिखने लगा है...बल्कि इसलिए कि अब उसे लगता है कि जब दुनिया एकदम साफ़ साफ़ नहीं दिखती, बेहतर होती है. जॉगिंग
 करने के लिए वैसे भी चश्मा उतारना जरूरी था. एक तो पसीने के कारण नाक पर रैशेज पड़ जाते थे उसपर दौड़ते हुए बार बार चश्मा ठीक करना बेहद मुश्किल का काम था...उससे रिदम में बाधा आ जाती थी. मगर इन बहानों के पीछे वो सही कारण खुद से भी कह नहीं पा रही है... जॉगिंग करते हुए आसपास के सारे लोग घूरते हैं...चाहे वो सब्जी बेचने वाले लोग हों...पार्क के सामने ऑटो वालों का हुजूम. सब्जी खरीदने आये अंकल टाइप के लोग या बगल के घर में काम करते हुए मजदूर. सड़क पर जॉगिंग करती लड़की जैसे खुला आमंत्रण है कि मुझे देखो. चश्मा नहीं पहनने के कारण उसे उनके चेहरे नहीं दिखते, उनकी आँखें नहीं दिखतीं...चाहने पर भी नहीं. बिना चश्मे के उसके सामने बस आगे की डेढ़ फुट जमीन होती है. उससे ज्यादा कुछ नहीं दिखता. ऐसे में वो बेफिक्री से दौड़ सकती है. उसके हैडफ़ोन भी दुनिया को यही छलावा देने के लिए हैं कि वो कुछ सुन नहीं रही...जबकि असलियत में वो कोई गीत नहीं बजा रही होती है.

जॉगिंग के वक़्त दिमाग में कुछ ही वाक्य आ सकते हैं...तुम कर सकती हो...बस ये राउंड भर...अगला कदम रखना है बस...अपनी रिदम को सुनो...एक निरंतर धम धम सी आवाज होती है लय में गिरते क़दमों की...तुम फ्लूइड हो...बिलकुल पानी...तुम हवा को काट सकती हो. सोचो मत. सोचो मत. लोग कहते हैं कि जॉगिंग करने से उनके दिमाग में लगे जाले साफ़ हो जाते हैं. उस एक वक़्त उनके दिमाग में बस एक ही ख्याल आता है कि अगला स्टेप कैसे रखा जाए. लड़की ने हालाँकि खुद की सारी इन्द्रियों को बंद कर दिया है मगर उसका दिमाग सोचना बंद ही नहीं करता. उसने अपने कोच से बात की तो कोच ने कहा तुम कम दौड़ रही हो...तुम्हें खुद को ज्यादा थकाने की जरूरत है. तब से लड़की इतनी तेज़ भागती है जितनी कि भाग सकती है...लोगों के बीच से वाकई हवा की तरह से गुजरती है मगर दिमाग है कि खाली नहीं होता. उसे अभी भी किसी की आँखें याद रह गयी हैं...अलविदा कहते हुए किसी का भींच कर गले लगाना...बारिशों के मौसम में किसी को देख कर चेहरे पर सूरज उग आना...कितनी सारी तस्वीरें दिमाग में घूमती रहती हैं. उसे अपनी सोच को बांधना शायद कभी नहीं आएगा.

फ्रेंच की कुछ चीज़ें बेहद खूबसूरत लगी उसे...कहते हैं...tu me manque...you are missing from my life...मैं तुम्हें मिस कर रही हूँ जैसी कोई चीज़ नहीं है वहां...इस का अर्थ है कि मेरी जिंदगी में तुम्हारी कमी है...जैसे कि मेरी जिंदगी में आजकल यकीन की कमी है...उम्मीद की कमी है...सुकून की कमी है...और हाँ...तुम्हारी कमी है. इतना सारा फ्रेंच में कहना सीख नहीं पायी लड़की. उसके लिए कुछ और फैसले ज्यादा जरूरी थे. देर रात पैरों में बहुत दर्द होता है. नए इश्क में जैसा मीठा दर्द होता है कुछ वैसा ही. मगर जिद्दी लड़की है...कल फिर सुबह उठ कर जॉगिंग जायेगी ही...याद और भी बहुत कुछ आता है न...चुंगकिंग एक्सप्रेस का वो लड़का...जो कहता है कि दिल टूटने पर वो दौड़ने चला जाता है...जब बहुत पसीना निकलता है तो शरीर में आंसुओं के उत्पादन के लिए पानी नहीं रहता. लड़की की हमेशा भाग जाने की इच्छा थोड़ी राहत पाती है इस रोज रोज के नियमपूर्वक भागने से. बिना चश्मे के दौड़ते हुए टनल विजन होता है. आगे जैसे रौशनी की एक कतार सी दिखती है...और वहां अंत में हमेशा कोई होता है. पागल सा कोई...शाहरुख़ खान की तरह बाँहें खोले बुलाता है, सरसों के खेत में...वो भागती रहती है मगर रौशनी के उस छोर तक कभी पहुँच नहीं पाती. कभी कभी लगता है कि किसी दिन थक कर गिरने वाली होगी तो शायद वो दौड़ कर बांहों में थाम लेगा.

भाषाएँ खो गयी हैं और शब्द भी. अब उसे सिर्फ आँखों की मुस्कराहट समझ आती है...सीने पर हाथ रख दिल का धड़कना समझ आता है या फिर बीपी मशीन की पिकपिक जो उससे बार बार कहती है कि दिल को आहिस्ता धड़कने के लिए कहना जरूरी है...इतना सारा खून पम्प करेगा तो जल्दी थक जाएगा...फिर किसी से प्यार होगा तो हाथ खड़े कर देगा कि मुझसे नहीं हो पायेगा...फिर उसे देख कर भी दिल हौले हौले ही धड़केगा...लड़की दौड़ती हुयी उसकी बांहों में नहीं जा सकेगी दुनिया का सारा दस्तूर पीछे छोड़ते हुए....लेकिन रुको...एक मिनट...उसने चश्मा नहीं पहना है...लड़की को मालूम भी नहीं चलेगा कि वो इधर से गुजर गया है...ऐसे में अगर लड़के को वाकई उससे इश्क है तो उसका हाथ पकड़ेगा और सीने से लगा कर कहेगा...आई मिस यू जान...Tu me manques. मेरी जिंदगी में तुम मिसिंग हो. हालाँकि लड़की की डेस्टिनी लिखने वाला खुदा थोड़ा सनकी है मगर कभी कभी उसके हिस्से ऐसी कोई शाम लिख देगा. मैं इसलिए तो लड़की को समझा रही हूँ...इट्स आलराईट...उसे जोर से हग करना और कहना उससे...आई मिस्ड यू टू. बाकी की कहानी के बारे में मैं खुदा से लड़ झगड़ लूंगी...फिलहाल...लिव इन द मोमेंट. कि ऐसे लम्हे सदियों में एक बार आते हैं.
*photo credit: George

29 July, 2014

दिल का डिफेन्स कमजोर है जरा और जरा सा खुदा बेईमान

चाहना...अभीप्सा जैसा कुछ. मन के कितने अंतरतम कोने से पुकारा होगा तुम्हें सोच रही हूँ...इतनी दूर दुनिया से मेरे लिए चले आना मुमकिन तो नहीं होगा. उफ़ इतनी शिद्दत से कुछ और ही मांग लिया होता. और माँगा भी क्या था. तकलीफ का एक गहरा समंदर था जिसे ज़ज्ब किये बैठी थी...आँखों में खारे पानी की झीलें अबडब कर रही थीं और मैं ज्वारभाटा को रोकने के लिए बाँध बना रही थी. मगर पागल चाँद कभी सुनेगा भी मेरी. मुझे तो मालूम भी नहीं था कि पूरे मोहल्ले में लोग झीने दुपट्टे ओढ़े चाँद का दीदार कर रहे हैं. चाँद भी मुआ भाव खाने की जगह बेशरम सा सारे बादल हटा कर झाँक रहा था. अरे तमीज तहजीब भी कोई चीज़ होती है कि नहीं. उसके आने से सैलाब उमड़ता है...फिर होश कहाँ रहता है कि नहीं देखना है उन आँखों में...नहीं कहना है तुमसे कि आई मिस यू...बस दूर ही रहना है तुमसे कि तुमसे तकलीफों की पूरी पूरी फ़ौज चली आती है मेरे दिल पर धावा बोलने...तुम बेहतरीन सिपहसलार हो...मैं हर बार हार जाती हूँ. इस बार लेकिन मेरे दिल ने हथियार डाल दिए थे कि मुझे इस बेरहम फ़ौज से बचाओ. मैं डिफेंस खेल रही थी तुम्हारे साथ कि तुमने अचानक सारा प्लान गड़बड़ कर दिया.

मान लो तुमने प्रोग्राम करके कुछ गलत किया होता तो मैं फिर भी झगड़ लेती तुमसे मगर उस इत्तिफकों वाले खुदा से कौन झगड़ा करे! उससे कुछ छिपता भी कहाँ है. मैं लाख दिल के ऊपर बाँध बनाऊं...तहखाने में अपने ज़ज्बात छुपाऊं, खुदा को तो मालूम था कि तुम्हारी आँखों को देखने के लिए मरी जा रही हूँ. हम दोनों के शहर से बहुत दूर एक मेला लगा था, मालूम...मैं तो बस वहां छुटकी के लिए झुनझुना खरीदने गयी थी. इत्तिफाक की बात है कि बच्चों ने घेवर खाने की जिद पकड़ ली...उसपर मेरा भी केसर वाला पेठा खाने को दिल कर रहा था. मुझे क्या मालूम होना था कि तुम्हारे घर में तुम्हारी दीदी को देखने के लिए लड़के वाले आयेंगे और तुम दूर मेले में उनके लिए ख़ास छेने की मिठाई के लिए साइकिल उड़ाते आओगे. मगर बताओ तो सही...ऐसे भागम भाग में कोई मेला देखने भी आता है. कैसे भुक्खड़ बर्तुहारी करते हो तुम लोग जी...ये नहीं कि मेहमान के आने के पहले से सब इन्तेजाम करके रख लें. किसी का तो ध्यान जायेगा ही अगर लड़की का भाई सबके सामने आँगन में से साइकिल निकाल कर कहीं जाएगा...और मान लो तो इतनी देर में चाची को कोई काम ही याद आ गया तो...घर में और कोई है भी या ऐसे ही चले आये हो बुड़बक जैसे? तुमरा बुद्धि पर बलिहारी रे...एक ठो काम नै होता है ढंग से.

हम भी लेकिन गज़ब हैं रे...ठीक से लजाना भी हमको कहाँ आया कभी. भरे बाजार में ऐसे लपके तुम्हारी ओर जैसे बच्चा चाँद की ओर मुट्ठी कर के उछलता है पूरनमासी की रात को. कितना साल हो गया था तुमको गाँव छोड़े हुए. इस बार आना भी तो अचानक हुआ था तुम्हारा...हालाँकि हमको थोड़ा उम्मीद तो था कि दिदिया को देखने लोग आयेंगे तो शायद तुम भी आ जाओगे कुछ दिनों के लिए मगर दिल इस तरह टूट गया है कि ऐसी कोई उम्मीद नहीं बांधना चाहता है तुमसे. मगर वो जो इत्तिफकों का खुदा है न...एकदम होपलेस रोमांटिक है. उसने DDLJ कोई डेढ़ सौ बार देखी है. एकदम यश चोपड़ा जैसे रोमांस में यकीन रखता है. ऊपर से उसके खोजी गुप्तचर गज़ब के होते हैं...आई हेट यू की अनगिन परतों के नीचे से सुलगता, बिसरता तुम्हारी आँखों को एक बार देखना खोज लेते हैं. आज शाम यही तो सोच रही थी न...कि मन की बात भी खुदा को मालूम होती है क्या...और फिर एक तुम्हें देख लेने के ख्याल को अनगिन उलूल जुलूल बातों से भर रही थी कि खुदा कमसे कम कन्फ्यूज तो हो जाये कि मुझे क्या चाहिए. खुदा लेकिन खुदा है...उसको बेवक़ूफ़ बनाना कोई इतनी आसान बात तो नहीं है. मैं झूठा गुस्सा कितना भी कर लूं...तुम्हें देखते दिल मोम हो जाता है...न न...मोम नहीं...ठाठें मरता विस्की का समंदर कि जिसकी घूँट घूँट में नशा होता है.

तुम तक पहुँच जाती है मेरे काँधे से उड़ती खुशबू...और कहाँ तो ड्रामा कर रहे थे कि हफ्ते भर से सर्दी, खांसी बुखार में पड़े हो...ऐसे कोई मानेगा भी तुम्हारा बात रे झूठे. खुशबू महसूस होती है भला? जैसे कि खुशबू मेरा सिग्नेचर हो...नाक बंद होने पर भी मालूम होने से महसूस हो कि मैं हूँ तो वही खुशबू होगी...हाँ मैं आज भी वही परफ्यूम लगाती हूँ...इतने सालों बाद भी. नहीं, मुझे कोई आईडिया नहीं था कि तुम आने वाले हो. इतने शौक़ से ईद के लिए मलमल की कुर्ती बनवाई थी और उसपर बारीक जरी का काम करवाया था. अब तो ख़ाक ही उसे पहनने का मन होगा. मैं तो मेले में लोगों का ज्यादा ध्यान न जाए इसलिए साधारण सी कुर्ती पहन कर आ गयी थी. फिर इतने हड़बड़ी में प्रोग्राम बना था कि ज्यादा सोचने की फुर्सत नहीं मिल पायी. तुम्हें तो मालूम है कि घर में कहीं बाहर जाने का प्रोग्राम कितनी मुश्किल से बनता है. जब तक तुम गाँव में थे कमसे कम कहीं भी जाने के लिए सोचना नहीं पड़ता था. तुम्हारी मोटरसाइकिल से कहीं भी पहुंचा देने के लिए तुम हमेशा तैयार रहते थे. जब से तुम्हारे आगे की पढ़ाई के लिए शहर गए हो कहीं आना जाना बंद है. मन मगर तुमसे कैसा तो प्यार करता है...तुम्हारी इस एवोन की साइकिल के कैरियर पर आराम से गुनगुनाती चली जाती मैं...शायद उतनी खुश कभी नहीं होती...या कि रुको, होती...अगर तुम आगे बिठाते और तुम्हारी बाँहें मेरे इर्द गिर्द रहतीं...साईकिल का रोमांस भी ऐसा है कि बचपन से कभी मरा नहीं है...गाँव की सड़कों पर जब साईकिल चलती है तो इधर उधर के पंजर कैसे मध्हम मद्धम टिन टिन करके बजते हैं न. तुमने कभी गौर किया है? नदी ऐसे ही हंसती है न, लजाये हुए...या तुम ऐसे ही देखते हो कनखियों से मुझे. मेरे दुपट्टे में तुम्हारी देहगंध घुलती जाए कि बहुत साल बाद भी मैं संदूक से तह किया हुआ नीला दुपट्टा निकालूँ तो तुम्हारी हंसी कमरे में धूप जैसी घुलती जाये.

तुमसे प्यार इतना करती हूँ...इतना ज्यादा कि तुमसे नाराज़ रहना ही नहीं आया कभी. पिछले साल बिना मुझे बताये शहर चले गए थे. मुझे रोना इतना आया कि गुस्सा ही नहीं हो पायी तुमसे. इतना तो दुश्मनी भी निभा जाते हमसे...ऐसे विरक्त जैसे हम लगते ही क्या हैं तुम्हारे. ग़लतफ़हमी से तकलीफ मेरे सिवा और किसे होनी थी. पिछले सावन लड़के वाले देख कर गए और सबको पसंद आ गयी मैं. छेका में आया हुआ टिकरी सब उछल उछल कर खा तो लिए लेकिन अब शादी के नाम पर घिग्घी बंध रहा है. सुनो न, तुम्हारी बात सब मानेंगे...एक बार बाउजी से बात कर लो न...हमरे बारे में. तुम हमको न भी प्यार करोगे तो चलेगा. हम अपने भरोसे जिंदगी बिता लेंगे...सिर्फ इतने में खुश हो लेंगे कि तुम्हारे हिस्से का खाना बनाना मेरे जिम्मे आता है...तुम हमें अपने साथ शहर न भी ले जाओ तो चलेगा. वहां कोई मेरी सौत रख लोगे तो भी हम तुमको उलाहना नहीं देंगे. बस इतना हमरा मान रखना कि हमारी जगह किसी और को मत देना मन में. बाकी तो तुम्हारा दिल इतना बड़ा है कि मेरे जैसे जाने कितनी औरत समा जाए उसमें और किसी को तकलीफ न हो.

सुनो, तुम्हारे बिना जिया नहीं जाता है हमको. चाँद कसम किसी और के नाम हमारा डोली उट्ठा तो जान दे देंगे. भगा के ले चलो हमको कहीं...बियाह करोगे हमसे?

Related posts

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...