19 December, 2012

ब्लू डनहिल्स- द कोनियैक क्लॉक

शामें हमेशा सिंगल माल्ट के नाम होती थीं...मगर आज उसकी जिद पर हम कोनियाक पी रहे थे. मुझे याद भी नहीं मैंने शैम्पेन ग्लासेस कब ख़रीदे थे...आज पहली बार इस्तेमाल हुए थे लेकिन. उसका वादा था...सिर्फ एक ड्रिंक और फिर वो अपने घर चला जाएगा...छत पर मेरी रोकिंग चेयर थी और उसकी नार्मल चेयर फिर भी दुनिया उसकी ज्यादा घूम रही थी. साइड टेबल पर एक पैकेट ब्लू डनहिल्स, मेरी मार्लबोरो और बहुत से किस्से रखे थे. 
---
'आई डोंट नो एनीथिंग अबाउट यू'
'यु लिव इन अ वर्ल्ड इन व्हिच आई डोंट एक्जिस्ट स्वीटहार्ट'
'यू जस्ट कॉल्ड मी स्वीटहार्ट'
'क्या कहूं, जान के दुश्मन? बिना बताये आ जाते हो, सदमे से मर जाऊं मैं'
'मैं इतना बुरा लगता हूँ तुम्हें?'

उसमें कुछ तो चार्मिंग लगता है मुझे, एक्जैक्टली क्या...मालूम नहीं. वो पतझड़ की शामों की खुशबू जैसा है...सूखे पत्तों पर चलते हुए एक गंध आती है...ख़त लिखते हुए जो अनगिन कागज़ फेंके जाते हैं वैसा रफ ड्राफ्ट सा है कुछ मेरे और उसके बीच.

कोनियाक मुझे कभी पसंद नहीं था...कभी कभी कुछ स्पेशल लोगों के लिए मुझे वो चीज़ें करनी अच्छी लगती हैं जो मैं कभी नहीं करती. एक तो कोनियाक पीने का सोफिस्टीकेशन बिलकुल मैच नहीं करता. फ्लूट ग्लासेस को तमीज से पकड़ो...हमेशा किसी ईवनिंग गाउन पहने हौले हौले डांस करती किसी युवती की छवि बनती है...कहाँ मैं शॉर्ट्स और टी शर्ट् में रोकिंग चेयर पर बैठी हूँ...व्हिस्की कितना सही होता है...ग्लास भी सॉलिड...फ़्लैट सर्फेस, गिरने का चांस कम. तो वो इतना स्पेशल हो गया मेरे लिए? कब?

'व्हाय डु आई लाईक यू सो मच?'
वो मुझसे कह रहा था या अपने आप से. मुझे मालूम नहीं. जब मैं ऐसी किसी सिचुएशन में होती हूँ तो दिमाग बहुत अजीब तरह के सवालों में अटक जाता है. जैसे मैं अभी याद करने की कोशिश कर रही थी कि ब्लू लाईट का वेवलेंथ ज्यादा होता है या रेड का...शायद अल्ट्रावायलेट रे वैसी होती हैं जिनका वेवलेंथ सबसे ज्यादा होता है. ग्रेविटेशनल फ़ोर्स कैलकुलेट करने के कौन सा फार्मूला था...कुछ तो एम वन एम टू टाईप याद आ रहा था. मैं हरगिज़ ये नहीं सोचना चाहती थी कि ऐसी कोई शाम आई है जिसमें मैं उसके साथ बैठी हूँ और वो वाकई मुझसे कह रहा है कि मैं उसे अच्छी लगती हूँ.

मुझे एक ड्रिंक ख़त्म करने में लगभग घंटे भर का वक़्त लगता है...मैं या तो बहुत बोलती हूँ और कम पीती हूँ या किताब पढ़ने में भूल जाती हूँ कि ड्रिंक भी रखा है. हाँ एक चीज़ जो मैं रेगुलरली हर चीज़ के साथ रिदम में कर सकती हूँ वो है सिगरेट पीना...चाहे लिखना हो, ड्राइव करना हो, किताब पढ़नी हो...मूड है तो सिगरेट हर काम के बीच एडजस्ट कर सकती हूँ. आज शाम उसकी शर्ट ने आसमान के सारे रंग सोख लिए हैं...ऐसा लगता है हम किसी ब्राज़ील के बीच पर बैठे हैं और कहीं से समंदर का शोर आ रहा है. आजकल कोहरा गिरने लगा है...उसकी आवाज़ होती है...बेहद बेहद फीकी...पर जैसे खामोश रात में घड़ी की टिक टिक भी सुनाई देती है, वैसे ही मुझे धुंध की पदचाप सुनाई देती है.

अपनी शामें बांटने की आदत ख़त्म हुए बहुत वक़्त हुआ...पता नहीं कैसे आज के प्रोग्राम में एक ड्रिंक की बात हो गयी...डज ही रियली इवन एक्जिस्ट, या मेरी फ्रैगमेंट ऑफ़ इमैजिनेशन है...उसकी ओर देखती हूँ तो वो वैसा ही है जैसे जिंदगी में दिखता है...इमैजिन करती तो थोड़ा तो अलग होता. कुछ तो गलती हो ही जाती...किसी मास्टरपीस की कोपी करने वाला आर्टिस्ट जानता है कि वो कितनी भी कोशिश कर ले, कभी परफेक्ट कॉपी नहीं बना सकता. ओरिजिनल में गलतियाँ होती हैं...उन्हें रेप्लीकेट करना इम्पोसिबल है. मैं फिर से उसे गौर से देखती हूँ...दायें आइब्रो के ऊपर कट का निशान है...बचपन में भी भारी बदमाश रहा होगा. ऐसे मास्टरपीसेस खुदा ही बना सकता है...मैं चाहूं भी तो इतनी डीटेल में सोच नहीं पाउंगी.

पुराने जमाने में जब घड़ियाँ नहीं होती थीं समय नापने के कुछ तरीके हुआ करते थे...जलघड़ी ऐसा ही एक इन्वेंशन था...एक बर्तन के तले में एक छोटा सा छेद होता था जिससे बूँद बूँद पानी टपकता था...नीचे एक और बर्तन होता था जो पानी के गिरने को नापने के लिए होता था. उससे पता चलता था कि वक़्त कितना बीत गया है. व्हिस्की के मामले में मेरा विस्की ग्लास और जलघड़ी में कोई अंतर नहीं था. ग्लास आधा यानी आधा घंटा बीत गया है. पर आज तो समय का कुछ पता ही नहीं चल रहा...हम कितनी देर से एक ही ड्रिंक लिए बैठे हैं. आसमान का रंग गहराते हुए सियाह हो गया है.

मुझे लैवेंडर टीलाइट्स बहुत पसंद हैं. पत्थर का जालीदार कैंडिलस्टैंड है जिससे रौशनी की कुछ फांकें बाहर गिरती हैं. उसे भी रौशनी से रिलेटेड कोई भी चीज़ बेहद पसंद आती है, मेरे कैंडिल स्टैंड पर उसकी बुरी नज़र है मैं देख सकती हूँ.
'सोचना भी मत, ये मेरा फेवरिट है, कैंडिलस्टैंड तुम्हें नहीं ले जाने दूँगी'
'कैंडिलस्टैंड समेत तुम्हें उठा ले जाऊँगा...छोटी मोटी चीज़ों में मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं है'
अब उसके रहते मैं थोड़ी कम्फर्टेबल होने लगी थी...जैसे बहुत दिन से जानती हूँ उसको...हालाँकि जानती तो हूँ मगर ग्रुप में. हमारे कोमन फ्रेंड्स थे तो अक्सर हम मिलते रहते थे मगर ख़ास उससे कभी बात की हो ऐसा याद नहीं. यूँ देखा जाए तो आज पूरे वक़्त हमने कोई बात ही नहीं की थी. सिर्फ उसके होने से अच्छा लग रहा था. खालीपन भी अजीब होता है...यूँ महसूस नहीं होता. पर किसी के साथ वक़्त गुज़ार रहे हो तब उगने लगता है. अचानक से लगता है कि कितनी सारी खाली जगह थी कि एक पूरी शाम समा गयी और मालूम भी नहीं चला.


मालूम नहीं कितना वक़्त गुज़रा मगर हमारी कोनियाक-घड़ी कह रही थी, मिलने का वक़्त ख़त्म हुआ मुसाफिर...अब इस जेलखाने से दूसरे जेलखाने चलो. मैं कब उठी, मैंने कैसे घर पर ताला लगाया मालूम नहीं...सड़क पर उसके घर की ओर चलते हुए हमने एक दूसरे का हाथ पकड़ा हुआ था. मालूम नहीं कौन किसको थाम रहा था मगर इतना मालूम था कि नशा कोनियाक का नहीं है...कुछ और ही है. उसके हाथ बेहद खूबसूरत थे...नर्म और हलकी सी गर्माहट लिए हुए...कभी मैंने एक एंजिल की कहानी लिखी थी, उसके हाथ कुछ वैसे ही थे. ऐसा लगता था कि जब तक वो साथ है, कोई अनहोनी नहीं घट सकती है.

उसे किस मोड़ पर छोड़ कर आई मुझे याद नहीं. फ़्लैट की सारी लाइट्स ऑफ कर दी...अपने हिसाब का ड्रिंक बनाया. पांच आइस क्यूब. सिंगल माल्ट. व्हिस्की ग्लास. होम थियेटर में पैसे लगा के अच्छा किया...ऐसा कुछ सोच रही थी...कोई विदेशी वायलिन की धुन थी. शाम के ताने बाने से मेरे लिए दुशाला तैयार कर रही थी. हम कितने अकेले होते हैं. जिसके दोस्त जितने ज्यादा होते हैं मैंने उसे उतना ही अकेला देखा है. जरूरत होने पर किसी एक को बताया नहीं जा सकता है कि तुम्हारी जरूरत है...आ जाओ. क्या घर जा कर उसने भी ऐसे किसी की जरूरत महसूस की होगी?
...
क्यूँ लिख रही हूँ मैं ये कहानी...मालूम नहीं...मगर इत्मीनान से फुर्सत मिलती नहीं...ऑफिस में बहुत बहुत सारा काम है और अक्सर जब मुझे बहुत सारा काम होता है तो मेरा सबसे ज्यादा लिखने का मन करता है. आज के फिर से साढ़े दस बज गए...कहानी कमबख्त ख़त्म ही नहीं होती...कभी कभी होता है, अपने किरदारों से प्यार हो जाता है...फिर उनकी कहानी को जल्दी ख़त्म करने का मन नहीं करता...अचानक से कैसे ख़त्म कर दूं...
शेष. फिर. कभी. 

5 comments:

  1. कहानी परत दर परत प्याज के छिलके सी बढ़िया रही है। हर नई पहली से ज्यादा मुलायम, सुर्ख और खूबसूरत।

    ReplyDelete
  2. रुपहला नशा, न उतरने के लिये चढ़ता हुआ।

    ReplyDelete
  3. इन्‍हीं कहानियों के सहारे निभती जिंदगी.

    ReplyDelete
  4. मुझे ऐसी कहानियां अच्छी लगती हैं....और वैसे कोनयाक के जिक्र से एक बात याद आई....वो दिसंबर का ही एक सर्द दिन था जब बैंगलोर के एक पार्क में बैठे हुए "वे दिन" ख़त्म किया था....और फिर प्राग और कोनयाक याद सा रह गया!! :)

    ReplyDelete

Related posts

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...