09 January, 2013

इश्क क़यामत जानां...क़ुबूल?

उसके चारों ओर निर्वात बन रहा था...खुद को महसूस करने के लिए उसने गहरी सांस ली...मगर जाने क्या था कि सांस लेने का भाव था मगर सांस जैसी कोई चीज़ उसे खुद के अन्दर महसूस नहीं हुयी...खुद के होने की जांच के लिए और बढ़ते निर्वात को रोकने के लिए उसे तीन सिगरेटें लगातार पीनी पड़ीं. खुले में होने के बावजूद उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसके इर्द गिर्द दबाव बढ़ता जा रहा है. क्या वो किसी ब्लैक होल में आ गयी थी? ब्लैक होल ग्रेविटी का सघन रूप होता है...उसने एक नाम पुकारने की कोशिश की...कहीं से कोई आवाज़ नहीं आई...धुएं में आवाज़ की तरंगें दिख रही थीं मगर उसका नाम लौट कर नहीं आया.

उसने याद करने की कोशिश की मगर कहीं कोई तसवीरें नहीं उभरीं...हाथ में थमी हुयी चौथी सिगरेट थी...मगर उसे ऐसा लगा जैसे संख्याएँ लुप्त हो रही हैं. उसके होने के सारे निशान मिट रहे थे. टाइमलाइन नहीं थी वहां...अतीत, वर्त्तमान और भविष्य की परिभाषाएं ख़त्म हो गयीं थी. उसे अचानक याद आया कि साल की आखिरी इकाई जब उसने गिनी थी वो मर चुकी थी. एक पल को उसे ये सोच कर अच्छा लगा कि मरने के बाद भी उसे सिगरेट मिल सकती है.

सिर्फ सिगरेट से कैसा ताना-बाना बुना जा सकता है. उसने उँगलियों में पकड़ी सिगरेट को गौर से देखना शुरू किया. आँखों के सामने धुआं था...क्या धुएं के मोलिक्यूल सॉलिड होकर उसकी आँखों पर तीखा वार कर सकते हैं? ये उसकी जानी हुयी दुनिया नहीं थी तो यहाँ कुछ भी हो सकता था...उसे सब कुछ धुएं से ही बनाना था...उसने धुएं को अपनी साइड में रखने का निर्णय लिया...हाथ बढ़ा कर धुएं में एक लकीर बनायी...लकीर के इस तरफ उसकी दुनिया थी...लकीर के उस तरफ धुआं इस जगह का था और वो अपनी मर्जी से बिहेव कर सकता था.

उसने सिगरेट की डिब्बी पर किसी और उँगलियों का स्पर्श तलाशा...दायीं ओर कवर के पास जरा सा किन्हीं होठों की मुस्कराहट मिली. सिगरेट की डिब्बी पर प्लास्टिक का बेहद पतला कवर होता है. एक हाथ में लाईटर पकड़े हुए उसने दांतों से कवर के कोने को खींच कर निकाला था. उसने एक गहरा कश लिया और धुएं को सधी हुयी उँगलियों में लपेट लिया. धीरे धीरे कश मारते हुयी वो धुएं की डोरियाँ बनाती गयी. जब दायें हाथ की सारी उँगलियों में बहुत सी डोरियाँ इकट्ठी हो गयीं तो उसने धुएं की डोरी के मुहाने को अंगूठे और तर्जनी के बीच में पकड़ा और इससे पहले कि किसी का भी ध्यान जाये एक समुराई योद्धा की सी चपलता से उसने एक वार में उसके नाम का पहला अक्षर लिख दिया.

उसके नाम का पहला अक्षर बहुत उर्वर था...निर्वात में उस अक्षर की रोपनी होने से जमीन उगनी शुरू हो गयी. लड़की ने धुएं की लकीरों से कोपी के दो लाइन वाले पन्ने बनाने शुरू किये. तभी धुएं का दूसरा हिस्सा जो था उसे लड़की के इरादों की भनक पड़ गयी. उसे लड़की की क्षमताओं का अंदाजा था. जैसे ही लड़की को लिखने भर का कागज़ मिलता वो उसपर एक नयी दुनिया बना कर खुद को उसका ईश्वर घोषित कर देती. इश्वर के खिलाफ गुरुत्वाकर्षण बल भी काम नहीं करता...भले ही वो एक छोटी दुनिया की ईश्वर हो...धुंआ लड़की की बनायीं लकीरों के परपेन्डिकुलर लकीरें बनाने लगा. धुएं को पता था लड़की को मैथ से डर लगता है. उसे ये भी पता था कि संख्याएँ विभाजित करती हैं...शब्द जोड़ते हैं.

धुएं के चौकोर खानों में लड़की के बनाये शब्द अलग अलग होने लगे. लड़की ने बुझी हुयी सिगरेट के टुकड़े तलाशने शुरू किये...उसे मालूम था यहीं कहीं वो सिगरेट पड़ी होगी जिसपर इब्लीस की उँगलियों के निशान होंगे. उसने धुएं के छल्ले बना कर फेंके...और जल्दी ही एक सियाह सिगरेट मिली...इस सिगरेट से हर लकीर को मिटाया जा सकता था. लड़की कमाल थी. इब्लीस की उँगलियों के लम्स का सही इस्तेमाल जानती थी. इब्लीस उसकी फितरत पहचानता तो हरगिज़ उसके साथ बैठ कर सिगरेट नहीं पीता. वो तो बस उसके मन के अँधेरे से खिंचा आया था. उसे लगा था लड़की की दुनिया में उसे पनाह मिल सकती है. उसने कभी लड़की की आँखों में नहीं देखा वरना अपने पीछे इस सियाह दुनिया में उसके होने की दुआ नहीं करता.

लड़की को इब्लीस और अंधेरों से बहुत प्यार था. उसकी आँखों में बहुत सी रौशनी थी और इसी रोशनी के बीच काली पुतलियाँ थीं...वो रौशनी में अँधेरा और अँधेरे में रौशनी देख लेती थी. वो ऐसी आफत थी कि खुदा और शैतान दोनों की आँखों का तारा थी. धुएं की दो लकीरों वाले अनगिन पन्ने सामने थे...सिगरेट की कभी न ख़त्म होने वाली डिब्बी. ऐशट्रे भर मुस्कानें. जलती माचिस की तीलियाँ. धुएं की दुनिया. फानी. भंगुर. तिलिस्मी. नशीली...सम्मोहक. जिंदगी.

इश्क क़यामत जानां...क़ुबूल? 

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