26 March, 2014

एक वल्नरेबल गल्प



और जैसे ही मैं जरा सा पीछे मुड़ कर गाने की लिरिक्स को सुनने को हुयी, कागज पर के शब्दों नें झट से मेरे पीठ में खंजर भोंक दिया। शब्द चाकू भी होते हैं, खंजर और आरी भी। इनके कत्ल करने का तरीका अलग अलग होता है, बचपन से सुनने के बावजूद यकीन हर बार मुझे बचाने में पीछे रह जाता है। मेरी दुनिया इस विश्वास पर चलती है कि मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है जो मेरे साथ कोई बुरा करेगा। मैं भूल जाती कि सब कुछ रैंडम है, इतना रैंडम कि तयशुदा पैटर्न पर चलती हैं चीज़ें।

हमारे पुश्तैनी घर में सदियों पुराने प्रशस्ति पत्र मौजूद थे, नालंदा विश्वविद्यालय के अधिपति ने खास तौर से मेरे पुरखों को शब्दकोश का निर्माण करने के लिये निमंत्रण भेजा था। गंगा किनारे इस गाँव में हम पीढ़ी दर पीढ़ी बसे आ रहे हैं। मेरे पुरखों ने शब्दों का कारखाना लगाया था। दुनिया के कुछ चुनिंदा कारखानों में हमारे कारखाने की भी गिनती होती थी। मेरे पुरखे दूर दूर शब्दों की खोज में भटकते रहते और नये शब्दों का जन्म और उनकी नियति निर्धारित करते। किसी भी नामकरण संस्कार में मेरे परिवार के एक सदस्य की उपस्थिति अनिवार्य रहती। हर राज्याभिषेक में प्रजा द्वारा निर्धारित उपाधि मेरे पुरखे ही पहुंचाते। हमारा काम दुनिया की नजरों से दूर ही होता अक्सर। बस जरूरत भर बाहर आना, वरना शब्दों के अधिक और बेहतर उत्पादन के अलावा मृतपाय शब्दों दाह संस्कार करना भी हमारे परिवार का काम हुआ करता था। 

उस समय राजाओं का मुख्य मनोरंजन आखेट था। जब उन्हें कोई नया कौतुक चाहिये होता तो मेरे परिवार में से किसी को बुलावा भेजा जाता कि एक संधिपत्र का निर्माण किया जाये। जब सम्राट उस घोषणा पत्र से संतुष्ट हो जाते थे तो सारे राज्य के तपस्वियों का आह्वाण करते और अश्वमेघ यज्ञ किया करते। हमारे बनाये हुये शब्द दूर अफगानिस्तान और म्यामार तक पाये गये हैं। जापान के पास गये बुद्ध के उपदेशों में भी हमारे कई शब्दों का योगदान रहा है। मगर ये सब बहुत पुरानी बात है। उन दिनों शब्दों की शुद्धता एक बहुत महत्वपूर्ण नियामक था। हमारे कार्य को कला का दर्जा हासिल था। उन दिनों हमारे परिवार के अलावा किसी और को कारखाना तो क्या छोटा सा छापाघर खोलने के लिये भी हमारे घर के सर्वेसर्वा से सम्मति लेनी पड़ती थी। चूँकि शब्दों का बहुत सारा इस्तेमाल कर्मकाण्डों में होता था इसलिये कारीगरों की अनुवांशिकी महत्वपूर्ण थी। हमारे घर की बाहरी दीवार पर एक पुराना शिलालेख था जिसमें हर पीढ़ी का पूरा ब्यौरा दर्ज था। 

जैसा कि हर कारखाने में होता है, हमारे यहाँ भी कारखाने के कई स्तर थे जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलते आये थे। समाज के प्रचलन के विपरीत हमारा घर मातृसत्तात्मक था। जनने और पोषण के लिये स्त्रियाँ बेहतर हैं, इस विश्वास के साथ प्रथा घर में चली आ रही थी। हर पीढ़ी की पहली बेटी को अपना वर चुनने का अधिकार था। एक छोटा सा अनुष्ठान उसकी दिशा निर्धारित करता, और वह घर में सबका आशीर्वाद लेकर निकल पड़ती। कई बार वे जल्दी लौट आतीं मगर कई बार ऐसा भी हुआ है कि वापस आने में बहुत साल लग जाते थे। किंवदंतियों में उसका भी नाम आता है...तेजस्विनी। यथा नाम, तथा गुण। उसपर माँ सरस्वति की विशेष कृपा थी। परिवार की परंपरा के मुताबिक, उसे अपने लिये एक वर ढूंढना था, पहली संतान होने के बाद घर की सत्ता उसे दे दी जाती। तेजस्विनी में क्षत्रियों के बहुत से गुण थे, वह अायुध विद्या में पारंगत थी और शब्दभेदी बाण चलाना जानती थी। इसके अलावा उसे घुड़सवारी का बहुत शौक था। अनुष्ठान में उसकी दिशा उत्तर आयी। घर में सभी शोकाकुल हो गये। उत्तर दिशा निशिद्ध थी। तेजस्विनी ने ईश्वर का नाम लिया और अपने घोड़े पर निकल पड़ी। उस घटना को बीस हो गये। किसी ओर से उसकी खबर नहीं आती थी। 

इतने सालों तक उसका इन्तेजार किया सबने, लेकिन उम्मीद ही थी, एक न एक दिन टूट ही जानी थी. ठीक जिस दिन उसकी छोटी बहन के पास घर का सारा कार्यभार जाने को था, घर के सामने एक घोड़ा खड़ा हुआ. उससे एक इक्कीस साल की लड़की उतरी। पूरे इलाके में किसी ने ऐसी लड़की देखी नहीं थी. उसका रंग शफ्फ़ाक गोरा था. त्वचा में से चांदनी निकलती थी जैसे। आंखों में पूरनमासी के चाँद सी पूर्णता थी. उसने अपना परिचय तेजस्विनी की बेटी के रूप में दिया। इतने सालों में तेजस्विनी ने उसे कारखाने के सारे नियम और तकनीकें बता दीं थीं. जो उसने कभी नहीं बताया वो ये कि तेजस्विनी के साथ क्या हुआ था और वो कभी वापस आएगी या नहीं। उसने कभी अपने पिता के बारे में भी कुछ नहीं बताया सिवाए इसके कि पहाड़ों के देश में बहुत ऊपर उनका साम्राज्य है. वहाँ से कई नदियों का उद्गम होता है. हालाँकि घर पर पहला हक़ उसका था लेकिन उसने ताउम्र अविवाहित रहने का फैसला सुनाया तो घर में सभी अवाक रह गए. वह बेहद कुशल कारीगर थी, उसके बनाये शब्दों में जीवंत आत्मा होती थी. उसने घर आकर कुछ नयी रस्में बनायीं जैसे कि घर की सारी स्त्रियों का आयुध विद्या सीखना अनिवार्य होना। उसने घर को धीरे धीरे किले में बदलना शुरू कर दिया। शायद उसे आने वाले तूफ़ान की कुछ खबर हमेशा से थी. 

उसके आने के छह महीने बाद जब उसने बेटी को जन्म दिया तो किसी ने भी उसके पति का नाम नहीं पूछा। हमारे परिवार के लिए इतना काफी था कि तेजस्विनी की बेटी वापस लौट आयी है. हमारे शिलालेख में उसका नाम जुड़ा और सामने की जगह खाली रही. इसके बहुत साल बाद हमारे घर तक खबर पहुंची कि सुदूर उत्तर में एक और परिवार है जिसने शब्दों का कारखाना खोल रखा है. नदियों में आते केवट कई बार उनके बनाये शब्दों को लिए आते. जो बाकी दुनिया को नहीं दिख रहा था वो हमारे घर के कर्ताधर्ता को लम्हे भर में दिख गया. उन शब्दों में बहुत धार थी और इस तीक्ष्ण धार की एक मात्रा हमारे खुद के घर की थी. मगर हमारे घर में तो कभी किसी ने शब्दों का हानिकारक इस्तेमाल नहीं किया था. ये कैसे शब्द थे जिनमें उत्पात था, नरसंहार था, भीषण दर्द और अमानवीय क्रूरता थी, ये कैसे शब्दों से बदला लेने की कहानी थी? 

कहानियों को हम तक पहुँचने में और भी ज्यादा वक्त लगा. तेजस्विनी की ओज का जीवनसाथी उसे बहुत सुदूर उत्तर में मिला। राजकुमार मंगोल वंश का था. उसने तेजस्विनी को कभी वापस न लौटने की शर्त पर अपनाया था. यही नहीं उसने बिना राजकुमारी को बताये बहुत से कामगारों को बुला कर एक शब्दों का कारखाना भी खोल लिया. उसे इन्तेजार था तो बस इतना कि जिस दिन तेजस्विनी की बेटी का जन्म होगा, वो उसे कारखाने का संचालक बना देगा। तेजस्विनी ने कई बार बताने की कोशिश की कि शब्दों का कारखाना ऐसे नहीं चलता है मगर राजकुमार ने एक न सुनी। नियत समय आया और तेजस्विनी के जुड़वाँ बच्चे हुए, एक लड़का, एक लड़की। तेजस्विनी ने इस दिन की बहुत दिनों से तैयारी कर रखी थी, उसने अपनी एक विश्वासपात्र दासी के हाथों अपनी बेटी को उसी वक्त राजधानी से बाहर भेज दिया। राजकुमार बेटे को देख कर निराश हुआ लेकिन जिद पर अड़ा रहा। तेजस्विनी ने कारखाने का काम बुझे मन से शुरू किया। मन की उदासी भी उसके ओज को मिटा नहीं पाती थी। उस कारखाने में रहते हुए उसने सिर्फ संधिपत्र लिखे। राजकुमार के राज्याभिषेक के पद प्रजा में सालों बाद तक गुनगुनाये जाते रहे. 

इस कारखाने में सब कुछ बाकी कारखानों की तरह पुरुषों के द्वारा किया जाता था। वक्त के साथ साथ तेजस्विनी के बेटे ने कारखाने का सारा काम सम्भाल लिया। हमारे परिवार के बारे में जब उसे मालूम हुआ तो वह हमारे कारखाने का सर्वेसर्वा बनने की अभीप्सा पाल बैठा। उसे मालूम नहीं था कि कारखाना तपोभूमि सामान है जिसमें कई पीढ़ियों ने अपना पूरा पूरा जीवन समर्पित किया है। दोनों कारखानों के बीच कई सारे खतों का आदान प्रदान हुआ। देश के इस छोर से उस छोर तक जब तीखे शब्द भेजे जाते तो बीच में पड़ने वाले सारे राज्यों में सूखा पड़ने लगता। एक तो राजपुत्र उसपर तेजस्विनी का बेटा, अहंकार उसमें कूट कूट पर भरा था. वह हरगिज यह बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था कि दुनिया के जिस छोर पर मेरा परिवार है, वहाँ न उसके राजपुत्र होने का मान है न उसके पौरुष का दर्प। कई पीढ़ियों तक ये शब्दयुद्ध चलता रहा. 

तेजस्विनी के बेटे और उसके  सभी वारिसों में हिंस्र भाव प्रमुख था। उन्होनें और सारे भावों की उपेक्षा कर के सिर्फ उन शब्दों को प्रमुखता दी जिनमें उनका पौरुष उभरे। वे भूल गये कि शब्दों का काम है व्यक्ति के मन का भाव दर्शाना, न कि रचयिता के मन का भाव आरोपित करना।  बदलती दुनिया में उनका बहुत प्रसार हुआ। दोनों विश्वयुद्धों में उन्होंने क्रूरता और अमानवीयता के कई शब्द गढ़े। बदलते वक्त के साथ मेरे परिवार में भी बहुत चीज़ें बदलीं। देश के स्वतंत्रता संग्राम में हमारे शब्द कई बार लोगों में जोश भरते, निराश लोगों के हाथ में उम्मीद की मशाल थमाते। वक्त गुजरता रहा, हमारी लड़ाईयाँ कम होते होते लुप्त होती रहीं। मगर जैसा कि तेजस्विनी की बेटी ने कहा था, हर लड़की को शब्दों के खतरनाक पक्ष भी दिखाए जाते। बचपन में शब्दों पर सानी चढ़ाने का काम दिया जाता कि वो धार को समझे। 

ऐसे सारे इतिहास के घर में जब मेरा जन्म हुआ तो बचपन से प्रतिरक्षा की भावना मन में घर कर गयी। कई बार लोगों से बात करने के पहले सोचती, कई बार कुछ कहने के पहले सोचती। नए शब्द मिलते भी तो उनका कई तरह से परीक्षण करती कि इनमें कोई छुपा भाव तो नहीं हैं जिसमें विध्वंस के बीज छुपे हों. यौवन की देहरी पर पहुँचते लेकिन मन में दुर्दम्य साहस भर गया। मेरे आक्रामक तेवरों को देख कर मेरे ही परिवार के लोग आश्वस्त हो गये और शब्दों के खतरों के प्रति मुझे आगाह करना भूल गए। खास तौर से छुपे हुए खतरों का जैसे कि मीठे बोलों में छुपा जहर मुझे मालूम नहीं चलता। प्रेम में पगी हुयी भाषा में मैं शब्दों की सान नहीं देख पाती। मुझे मालूम ही नहीं चला मैं कब लापरवाह होती चली गयी। शहर में इतने बेहतरीन लोग थे कि उनसे इतर किसी गहरी काली दुनिया पर यकीन नहीं करने लगी। मुझे सिर्फ शुद्ध शब्दों का निर्माण ही नहीं उनके बीच के संधि और उनके बीच के रिश्तों पर भी काम करने की इच्छा होने लगी। शब्दों से इतर कहानियां, कवितायें, कल्पनाएँ...सब मेरी जिंदगी का हिस्सा बनती चली गयीं। घर की छोटी बेटी होने के कारण मेरे ऊपर जिम्मेदारियां भी कम थीं और मैं अपनी मर्जी का काम कर सकती थी। 

शहर आयी तो अपने कवच कुण्डल पुश्तैनी संदूक में धर आयी थी। मुझे दुनिया अपनी वल्नरेबिलिटी के साथ देखनी थी. जिन शब्दों ने मुझ पर सबसे तीखा आघात किया वे आदिम स्वर थे, किसी दूसरी भाषा के. मृत्यु के इतना करीब हूँ तो अपने घर के और लोगों को आगाह कर देना चाहती हूँ. वे तीन शब्द मारक होते हैं. उनसे प्रतिरक्षा के लिए नए अस्त्र बनाये जाएँ। सारी लड़कियों के ह्रदय पर अभेद्य कवच चढ़ाया जाए जिसमें संजीवनी के गुण हों। काल के ग्रास से जो उन्हें वापस खींच लाये। उसका 'आई लव यू' एकदम रैंडम था, जितनी मुझे शब्दों की समझ थी उससे कहीं ज्यादा। बात सिर्फ इतनी नहीं थी कि हम दोनों की रगों में उसी तेजस्विनी का खून दौड़ता था। ज्यादा खतरनाक बात ये थी कि उसने ऐसा जान के किया था या अनजाने। मेरे पास ये जानने का कोई तरीका नहीं था। वो सुबह जहर खा चुका था। घर पर लोग मेरी वापसी और गोदभराई की रस्म की तैयारियाँ कर रहे थे, मैं समंदर किनारे खुद को होम करने के मंत्र लिख रही थी, मेरे शब्द उसकी डायरी की आखिरी एन्ट्री से मिलते जुलते थे। 

6 comments:

  1. बस स्वतन्त्र से शब्द रहे हैं, हम सब रहते पूरे आश्रित।

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  2. जो जाना अत्‍यन्‍त प्रभावी, जो न जाना उसके लिए क्षमा।

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  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 29/03/2014 को "कोई तो" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1566 पर.

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  4. सुंदर प्रस्तुति.
    लगा कितिलिस्मी दुनिया का सफ़र कर रहे हैं.
    कुछ खोलियेगा----

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  5. शब्दों का इतिहास, एक अलग अंदाज़ में, कई शताब्दियों का भ्रमण करवा दिया आपने।

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