09 April, 2014

उसकी गर्दन का नीला आर्किड आँसुओं के इंतज़ार में प्यासा था

वे शब्द बड़े जिद्दी थे. उस लड़की की ही तरह. अपनी ही चाल चलते, मनमानी। कलम की निब के साथ भी दिक्कत थी थोड़ी, जरा सी बस उत्तर अक्षांश की ओर झुकी थी, जैसे धरती चलती है न डगमग डगमग, वैसे ही कलम भी चलती थी उसकी, जरा सी नशे में झूमती। कलम में समंदर का पानी भरा हुआ था कि जिससे लड़की कहानियां लिखा करती थी. लिखते हुए उसे कुछ मालूम न होता कि वो क्या लिख रही है. कई दिनों बाद सूखे हुए कागज़ पर ब्रेल लिपि जैसा कुछ लिखा रहता जिसे बस वो लड़का पढ़ सकता था जिसकी कलम से पहली बार लड़की ने कहानी लिखी थी.

लड़का भी जिद्दी था अजीब, ये नहीं कि रोज मिल कर कहानियां पूरी कर जाए. कभी सदियों में एक बार आता. लड़की भी वैसी ही पागल, इंतज़ार के आँसुओं को बचा कर रखती। लड़की की गर्दन के पास फूलों की बेल उगने लगती जिसमें वॉयलेट रंग के ऑर्किड खिलते। लड़के को आर्किड बहुत पसंद थे, वो जाने के पहले लड़की को गले लगाता तो खुश्बू में डूबे ऑर्किड्स उसके होटों को छू जाते। लेकिन ऑर्किड्स में खुद की कोई खुशबू नहीं होती, वे लड़की की गंध से पलते बढ़ते थे. लड़के को मालूम नहीं था कि आर्किड परजीवी होते हैं, उनका स्वतंत्र कोई वजूद नहीं होता। इश्क़ भी ऐसा ही होता है न कुछ.

पिछली बरसातों में जब लड़का उससे मिलने आया था तो खपरैल वाली छत से पानी लगातार बह रहा था. लड़की के लिखे हुए कागज़ों में सीलन लगने लगी थी. नमक यूँ भी पानी बहुत सोखता है.  लड़की को वैसे तो कहानियां सुनाना पसंद नहीं था और वो अक्सर लिख कर भूल भी जाती थी किरदारों को. लड़का इस बार लैपटॉप लेकर आया था कि ये लिखने पढ़ने के झमेले से हमेशा के लिए निजात मिल जाए. लड़की की कहानियां मगर हुस्नबानो को टक्कर देतीं। हर रात उसकी कहानी के किरदार बदल जाते। कभी कोई नया किरदार उग आता. लड़का एकदम हैरान परेशान हो जाता कि उसे कोई उपाय ही नहीं सूझता। लड़की बंजारन थी, हवाओं पर थिरकती, लड़का उसके साथ देश देश घूमता। हर  किस्सा लिखता। उसे मालूम नहीं चला कब लड़की उसका हाथ  पकड़ कर सड़कों पर चलने लगी, कब लड़की की कलम ने लड़के की आँखों के काले रंग से किरदार रचने शुरू कर दिए. ये किरदार मायावी होते थे, लड़के के जानी दुश्मन। ईर्ष्या और डाह में जलते हुए ये नित काला जादू करते थे. उनका उद्देश्य था लड़के की कलम में इत्र भर देना कि वो जो भी लिखे लड़की की खुश्बू में डूबा लिखे। वे चाहते थे वो लड़की का गुलाम बन कर ताउम्र उनके साथ समंदर किनारे उस छोटे से एक कमरे के घर में रहे. एक तरह से देखा जाए तो उनका डाह प्यार का ही एक रूप था. उस प्यार का जो लड़की कभी उससे कर नहीं पायी, कह नहीं पायी। ये अधूरे, प्यासे किरदार थे मगर उनमें लेशमात्र भी डर नहीं था. 

लड़के की घड़ी में वक्त और दिन दोनों दिखते थे मगर लड़का भूल गया था कि उसने दाहिने हाथ में घड़ी पहन ली है. इक शाम साथ टहलते हुए उनके हाथ हौले से आपस में छू जा रहे थे. लड़की दाहिने हाथ में घड़ी पहनती थी, लड़का बाएं। हाथ टकराने से घड़ियों के ख़राब हो जाने का अंदेशा था. उस लम्हे से लड़का वक्त की सारी गिनती भूल गया था. उसकी सुबहें लड़की की मुस्कुराहटों से होती और शामें गुमे हुए पन्नों से धुंधलाये शब्द तलाशते गुजरतीं। लड़की की कहानियां लिखते लिखते उसकी उँगलियों में भी आर्किड उगने लगे थे. उसके नाखून नीले पड़ने लगे और आँखों का रंग भी काले से नीले में परावर्तित होने लगा.

उसे मालूम नहीं चला कब वो नीले रंग के आर्किड में पूरी तरह परिवर्तित हो गया. लड़की के लिखे में अब इश्क़ नहीं होता, उसके आंसू जब गालों से ढुलक कर कभी गर्दन पर गिर पड़ते तो उस इकलौते नीले आर्किड से समंदर की खुशबू आती.

5 comments:

  1. आपको
    पढ़ कर अमृता प्रीतम बहुत याद आती हैं। अमृता इश्क जीती थीं और इश्क ही
    रचती थीं, आप के साथ भी शायद कुछ ऐसा ही है। इतना ख़ूबसूरत लिखने और पढ़ने
    का मौका देने, दोनों के लिए शुक्रिया।

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  2. एक दूजे से पोषित उनकी प्रकृति।

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  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 12/04/2014 को "जंगली धूप" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1580 पर.

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  4. खूबसूरत प्रस्तुति...

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  5. गरदन में खिलते आर्किड वाह :) वो भी जिद्दी होंगे शायद ? बहुत खूब !

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